
ऐ थके हारे समंदर तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं .साहिलों को तोड़ के बाहर निकलता क्यों नहीं
तू मचलता क्यों नहींतू उछलता क्यों नहींतेरे साहिल पर सितम की बस्तियाँ आबाद हैं,
शहर के मेमार* सारे खानमाँ-बरबाद* हैं
ऐसी काली बस्तियों को तू निगलता क्यों नहींतू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहींतुझ में लहरें हैं न मौज न शोर..
जुल्म से बेजार दुनिया देखती है तेरी ओर
तू उबलता क्यों नहींतू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहींऐ थके हारे समंदरतू मचलता...