Friday, October 14, 2016

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Posted By Ashish TripathiFriday, October 14, 2016

सात का साथ पपीते के पत्ते एक फायदे अनेक

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डेंगू का उपचार: आजकल डेंगू एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरा है, पुरे भारत में ये बड़ी तेजी से बढ़ता ही जा रहा है जिससे कई लोगों की जान जा रही है l
यह एक ऐसा वायरल रोग है जिसका माडर्न मेडिकल चिकित्सा पद्धति में कोई इलाज नहीं है परन्तु आयुर्वेद में इसका इलाज है और वो इतना सरल और सस्ता है कि उसे कोई भी कर सकता है l
तीव्र ज्वर, सर में तेज़ दर्द, आँखों के पीछे दर्द होना, उल्टियाँ लगना, त्वचा का सुखना तथा खून के प्लेटलेट की मात्रा का तेज़ी से कम होना डेंगू के कुछ लक्षण हैं जिनका यदि समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी की मृत्यु भी सकती है l
यदि आपके आस-पास किसी को यह रोग हुआ हो और खून में प्लेटलेट की संख्या कम होती जा रही हो तो चित्र में दिखाई गयी चार चीज़ें रोगी को दें :
१) अनार जूस
२) गेहूं घास रस
३) पपीते के पत्तों का रस
४) गिलोय/अमृता/अमरबेल सत्व
अनार जूस तथा गेहूं घास रस नया खून बनाने तथा रोगी की रोग से लड़ने की शक्ति प्रदान करने के लिए है, अनार जूस आसानी से उपलब्ध है यदि गेहूं घास रस ना मिले तो रोगी को सेब का रस भी दिया जा सकता है l
- पपीते के पत्तों का रस सबसे महत्वपूर्ण है, पपीते का पेड़ आसानी से मिल जाता है उसकी ताज़ी पत्तियों का रस निकाल कर मरीज़ को दिन में २ से ३ बार दें , एक दिन की खुराक के बाद ही प्लेटलेट की संख्या बढ़ने लगेगी l
- गिलोय की बेल का सत्व मरीज़ को दिन में २-३ बार दें, इससे खून में प्लेटलेट की संख्या बढती है, रोग से लड़ने की शक्ति बढती है तथा कई रोगों का नाश होता है l यदि गिलोय की बेल आपको ना मिले तो किसी भी नजदीकी पतंजली चिकित्सालय में जाकर "गिलोय घनवटी" ले आयें जिसकी एक एक गोली रोगी को दिन में 3 बार दें l

यदि बुखार १ दिन से ज्यादा रहे तो खून की जांच अवश्य करवा लें l
यदि रोगी बार बार उलटी करे तो सेब के रस में थोडा नीम्बू मिला कर रोगी को दें, उल्टियाँ बंद हो जाएंगी l
ये रोगी को अंग्रेजी दवाइयां दी जा रही है तब भी यह चीज़ें रोगी को बिना किसी डर के दी जा सकती हैं l
डेंगू जितना जल्दी पकड़ में आये उतना जल्दी उपचार आसान हो जाता है और रोग जल्दी ख़त्म होता है l

Posted By Ashish TripathiFriday, October 14, 2016

कानपुर कभी चलती थी यहाँ ट्राम ( कभी थे आगे अब है पीछे )

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कानपुर कभी चलती थी यहाँ ट्राम 


अपने बिंदास अंदाज और दिलचस्प बोली के लिए मशहूर कानपुर अब बेतरतीब ट्रैफिक के जाना जाता है। मंगलवार को मेट्रो प्रॉजेक्ट के शिलान्यास के साथ ही कानपुर नए दौर में कदम रखेगा। हालांकि कम ही लोग जानते हैं कि स्वतंत्रता के पहले ही शहर में इंटिग्रेटिड ट्रांसपॉर्ट सिस्टम मौजूद था। 1933 तक शहर के एक बड़े हिस्से में ट्राम चलती थी। उस दौर में यह सेवा दिल्ली के पहले कानपुर में आई थी।
यह था रूट
कानपुर के पुराने रेलवे स्टेशन (वर्तमान में जीटी रोड पर) से सरसैया घाट तक डबल ट्रैक पर ट्राम चलती थी। वरिष्ठ इतिहासकार मनोज कपूर के मुताबिक, इसका रूट पुराने स्टेशन से शुरू होकर घंटाघर, हालसी रोड, बादशाही नाका, नई सड़क, हॉस्पिटल रोड, कोतवाली, बड़ा चौराहा और सरसैया घाट पर खत्म होता था। नई सड़क के आगे बीपी श्रीवास्तव मार्केट (मुर्गा मार्केट) में ट्राम के रखरखाव के लिए यार्ड बना था। उस काल में इस जगह को कारशेड चौराहा कहते थे, जो बाद में अपभ्रंश होकर कारसेट चौराहा हो गया।
नई सड़क पर ट्रैक रोड के दोनों तरफ बिछा हुआ था। यह सर्विस जून-1907 से शुरू होकर 16 मई, 1933 तक चली थी। यह दूरी करीब चार मील थी। इसके डिब्बों की कुछ विशेषताएं सिंगल डेक और खुली छत थी। ट्राम के गंगा किनारे टर्मिनेट होने की बड़ी वजह लोगों की नदी के प्रति अगाध श्रद्धा थी। इस इतिहास का गवाह बीपी श्रीवास्तव मार्केट अब भी पूरी शान से मौजूद है। अंदर से यह अब भी वैसा दिखता है।
मुंबई-दिल्ली से था मुकाबला
कपूर कहते हैं कि ब्रिटिश राज में शहर के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सन् 1900 में कोलकाता में ट्राम आने के बाद 1907 में कानपुर और मुंबई में ट्राम चलाई गई। बिजली भी यहां दिल्ली से पहले आई। दिल्ली में ट्राम 1908 में आई। ये सभी ट्राम बिजली से चलती थीं। मद्रास में घोड़े से खींची जाने वाली ट्राम चलती थी। 1933 में ट्राम बंद हो गई। तत्कालीन जिला प्रशासन ने बड़े चौराहे से सरसैया घाट जाने वाले ट्रैक (दाईं पट्टी) को महिलाओं के लिए रिजर्व कर दिया था। इसे गंगाजी की पट्टी कहा जाता था।

Posted By Ashish TripathiFriday, October 14, 2016