Wednesday, February 24, 2010

छोटा होता कानपुर शहर

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छोटा होता कानपुर शहर



कानपुर जो की कभी प्रदेश की औद्योगिक नगरी के नाम से जाना जाता था लेकिन समय बदला और इस औद्योगिक शहर को लाल झंडे वाले और मतलबी नेताओ ने औंधे मुह गिरा दिया / साल बीते और शहर ने अपनी मजबूत नीव पर फिर से एक नई ईमारत बनाई / और नाम दिया उस इमारत को औद्योगिक की जगह शिक्षा का /आज कानपुर शहर शिक्षा के क्षेत्र में नित नये आयाम गड्ता जा रहा है और शिक्षा का हब बनता जा रहा है /


फिर क्यों यहाँ आने वाले लोग कहते है की कानपुर शहर छोटा होता जा रहा है
 कानपुर शहर एक महानगर है और 65 लाख की आबादी वाले और अपनी उम्र के करीब तीन सौ दस साल देख चुका यह शहर क्या छोटा है इसका जवाब "न" ही होगा फिर क्यों यहाँ आने वाले लोग कहते है की शहर छोटा हो रहा है ? कभी अंग्रेजो के राज्य में कोलकत्ता और मुंबई के बाद इस आद्योगिक शहर का नाम
आता था फिर क्यों आज वो बडे और अपना शहर छोटा होता जा रहा है क्या इस लिए की विश्व के सबसे गंदे प्रदूषित और बीमार लोगो का शहर है या फिर इसलिए की शहर की पवित्र पवन गंगा भी आज शहर से अपना मुह मोड़ चुकी है और शहर की हरियाली धीरे धीरे मिटती जा रही है या फिर इसलिए की शहर की बडे सड़के और फुट्पाथो पर कब्जे दर काबिज़ होते जा रहे है या फिर इसलिए की टेम्पो रिक्शे वाले और ढेले वाले बडे चौराहो को छोटा कर देते है / शायद जवाब हा में ही होंगा .......

क्योकि शहर की हर छोटे बडे चौराहो की बडे सड़के सिर्फ रात के अन्धेरे में ही नज़र आती है और सुबह सूर्य की रौशनी पड़ते पड़ते सिकुडने लगते है और रात का बड़ा शहर सुबह होते होते छोटा हो जाता है ..... और शायद इस लिए की 65 हज़ार से ज्यादा चार पहिया वहान 20 हज़ार बडे वहान और 04 लाख के करीब पहुच चुके चार पहिया वाहन शहर की बड़ी सडको को छोटा करने के लिए काफी है ....../
फिर क्यों नेता मंत्री और बडे अफसर इस बडे शहर के छोटे होते फूटपाथ और सडको में लगने वाले जाम में नहीं क्यों की उनके आवास लख्ननउ दिल्ली और नॉएडा जैसे बडे शहरो में है और यदि वो शहर आते भी है तो ट्राफिक के नियम और रूट उनके लिए बदल दिए जाते है और वो बडे आराम से फर्राटा भरकर उन सडको से निकल जाते है / इस लिए ही इस बडे शहर के छोटे होते स्वरूप पर उनकी नजर नहीं पड़ती ........./
छोटा होता शहर शायद मंच पर चड़कर कागज पर बने गई करोडो के प्रोजेक्ट को लाखो की जनता के सामने बखान करके और उन अनभिज्ञ लोगो के द्वार बजाई गई तालियों से खुश हो जाते है, ये नेता ! पर पर क्या कभी दर्द महसूस किया है उस इन्सान का जो की शहर की गन्दगी प्रदुषण और खस्ताहाल होती सडको में फस कर उसी माँ ( शहर ) को गाली देता है जिसकी कोख में (मिटटी) जन्म लिया है इसका जवाब हमेश में होगा और आकडे हजारो में की शहर में 15 हज़ार से ज्यादा लोग घातक बीमारी केंसर दमा और टीबी , मानसिक रोगों के चलते पिछले 0 से दस सालो में अपनी जिंदगी से हाथ धो चुके है / शायद वो लोग मेरी नज़र में सही है जो कहते है की शहर छोटा होता जा रहा है क्योकिं दिन के उजाले में शहर की सडको में खुशी खुशी कोई परदेशी जब शहर की बड़ी सडको के छोटे होते स्वरुप के कारन जाम में फ़सता है तो यही कहता है की पहले कैसे इन रहो में से 10-15 मिनट में अपने स्थान में पहुच जाते थे , और आज जाम में फस कर भी नहीं .....क्या शहर छोटा होता जा रहा है शहर की छोटी छोटीमारतो और हरे भरे पेडो की जगह आज मलटीपेल्कष प्लैटेस और माल्स ले चुके है लेकिन ये शहर की बाहर की सुन्दरता जरुर बडा रहे है पर कही कही उसकी वास्तविक सुन्दरता मिटाते जा रहे है ..........

शायद इस लिए ही ये बड़ा शहर कही न कही छोटा होता जा रहा है ............



Posted By Ashish TripathiWednesday, February 24, 2010