Wednesday, May 13, 2020

जिंदगी की रेल से मौत के सफर तक एक मजदूर की कहानी

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  जिंदगी की रेल से मौत के सफर तक एक मजदूर की कहानी

 बेशक जिंदगी चलती का नाम गाड़ी है लेकिन अगर यही गाड़ी किसी कारणवश कही जिंदगी गाड़ी रुक जाए तो जीना मुश्किल सा लगता है 
लेकिन कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है और समय को देख कर कौन आया है ।यह भी सब जानते हैं कि कब रुकी हुई सी गाड़ी है सरपट दौड़ने लगे और कब दौड़ती हुई गाड़ी अचानक बंद हो जाए ।
कहना गलत ना होगा कि सबको जीवन में एक मौका अपनी भूल सुधारने का जरूर मिलता है लेकिन कभी-कभी यही मोके कड़े अनुभव भी दे जाते हैं ।
रोती हुई मां को यह कहकर अकेले छोड़कर परदेस चले जाना कि मुझे अपने जीवन को बेहतर बनाना है इस गांव और घर से जो संभव नहीं है लेकिन समय पलटा और उसी जीवन को चलाते रहने के लिए वापस उसी माता-पिता और गांव ही एक मात्र जरिया रह गया ।
क्या यह प्रकृति द्वारा दिया गया संदेश है अगर है तो शायद जो समझ गया वह अपनी माटी से दूर ना जा पाए। लेकिन मानव स्वभाव ऐसा है कि कोई एक ठोकर खाकर देख कर चलने लगता है और कोई लाख ठोकरे खा कर उसको अपनी किस्मत मान लेता है ।
लेकिन सत्य वह होता है जिसे एक बार में ही पहचान लिया जाए औऱ उस पर फिर आगे ना चला जाए। मौजूदा समय में अगर कोई सबसे ज्यादा हैरान परेशान हुआ है तो वैसा मजदूर ,रोज कमाने खाने वाला वर्ग ।
लेकिन वक्त की मार जब पड़ती है तो ना गरीब न अमीर बल्कि सभी उसका शिकार हो जाते हैं ।
मौजूदा वक्त कुछ ऐसा आया कि सभी एक साथ उस कालचक्र के चक्रव्यूह में फंस गए । सबसे शक्तिशाली देश का दंभ भरने वाला देश भी घुटनों पर आ गया ।मौतों के नित नए आंकड़ों ने यह साबित कर दिया कि अब कमाना उतना जरूरी नहीं रहा जितना जरूरी है जीना।
 अगर इस काल चक्र के चक्कर से बाहर निकल आए तो जीवन वरना शायद मातम मनाने के लिए भी अपने ना आए ।यही सोचकर प्रवासी मजदूर जो ना जाने कितने सपने लेकर दूसरे राज्यों में गए और वहां रह कर जीवन यापन करने लगे अपनी जिंदगी गुजार रहे थे।
 लेकिन कोरोना महामारी के चलते जिंदगी रुक सी गई ।ऐसे मजदूर सड़कों और बाजारों के बंद होने पर जब थक कर सो जाते थे तो लोग यही कहते थे कि नींद सुकून की है। लेकिन वही मजदूर जब बेबस बेरोजगार और बेचैन हो गया तो उसके लिए अपनी माटी और अपने लोग ही याद आए और अपनों की याद में वह बेबस बेचैन मजदूर सैकड़ों किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करने लगा। सभी आश्चर्य में थे लेकिन को रोना महामारी किसी को भी मदद के लिए आगे भी नहीं आने दे रही थी। खाना तो सब खिला देते थे लेकिन उनकी तकलीफ कोई कम नहीं कर सकता था।सैकड़ों मील दूर बैठे अपना परिवार उसे चुंबक की तरह खींच रहा था और वह पैरों पर पड़े छाले और टूटी चप्पल भी उसका रास्ता नहीं रोक पा रही थी ।
शायद  जिंदगी चलती का नाम गाड़ी थी और उसी गाड़ी को चलाते रहना भी जरूरी था।
 भले ही भूखा रहना पड़े और इस लाचारी और बेबसी की चादर ओढ़ कर निकले न जाने कितने मजदूर घर जाने के लिए बीच रास्ते में ही मौत की चादर ओढ़ कर सो गए।
 मजदूर शायद इतना मजबूर कभी नहीं हुआ था वहीं गरीब जरूर था लेकिन स्वाभिमानी भी था। तभी तो कड़ी धूप हो या सर्द रातें ,वह कभी मेहनत करने से पीछे नहीं हटा ।मेहनत से कमाने के लिए ही वह अपनी मां और गांव को छोड़ कर गया था । अपनी जमीन और अपनों के पास लौटने की आस न जाने कितने मजदूरों की बीच रास्ते मे ही टूट गई ।जब वो मज़दूर काल के गाल में समा गए । यह समय ऐसा था ना जो पहले कभी आया था और हम शायद ऐसा समय दोबारा देख पाएं ।भविष्य में आने वाली पीढ़ी किताबों में पढ़कर भी उस पीड़ा, बेबसी और उस दर्द को समझ पाए, कि कैसे एक साथ 16 मजदूर रेल की पटरी पर हमेशा के लिए सो गए ।
बेशक 4 दिन समाचारों की सुर्खियां बन कर सरकार द्वारा मुआवजा मिलने तक हम सब भूल जाएंगे। लेकिन वास्तव में यह दुर्घटना थी या कुछ और।
 बेबसी बेरोजगारी और भूख फिर सैकड़ों मील पैदल चलना थककर  रेल पटरी पर एक साथ सोना और ट्रेन आने के बाद किसी की भी नींद ना खुलना एक आश्चर्य की बात थी।
 क्या यह सब ऐसी पीड़ा को लेकर घर वापसी कर रहे थे जिसके वहां पहुंच कर भी उन्हें शायद भुखमरी और बेरोजगारी का डर था।
 क्या वह सब इतना हताश हो चुके थे कि भविष्य में सुनहरे आकाश में जो चमकते हुए सितारे उन्होंने देख रखे  थे उन सबको घने काले बादलों ने घेर लिया था।
 क्या उनका अंतः करण और आत्मविश्वास उनको कहीं ना कहीं मजबूर कर चुका था कि जिस जिद में वह घर छोड़ आए थे अब वही घर तुम्हें याद आया ।
क्या जिंदगी की पटरी पर जो गाड़ी चलाने के लिए वह घर से चले थे उसी पटरी पर नींद लेते हुए मौत की ट्रेन में सवार होकर चले गए ।
सवाल कई हैं लेकिन जवाब एक ही है मजदूर भाई इतना मजबूर बेबस लाचार कभी नहीं हुआ जितना को रोना काल के  चक्रव्यूह में फंसकर हो गया।
 सोचने वाली अंतिम बात यह भी है कि मजदूरों के सर पर छत  न थी जेब में पैसे और पेट भी भूखा और  निकल पड़े सैकड़ों मील के सफर पर।
 वही जिनके सर पर छत ,बैंक में पैसे और पेट भरा हुआ उन्हें घर में रहने में तकलीफ हो रही थी । असल में तकलीफ किस को थी ये तो तकलीफ भूख और बेबसी में जी कर ही समझा जा सकता है।
 महामारी के चक्कर में मजदूर खाली पेट सो  जाएगा
उसे सपने आते हैं कि भोजन कहां से आएगा
 भूख हवा खाने से और प्यास पानी की दो बूंद से मर जाती है और रातें अपनों से मिलने के सपने में भी कट जाती हैं 
दे रहे हो खाना तुम लेकिन रोटी थोड़ी सुखी है
 थोड़ी इज्जत से देना साहब बेटी कल से भूखी है 
 चाहे रोटी का एक टुकड़ा दे दो या पानी की दो बूंदे हैं 
 थकान से दिमाग भी खुश होगा और दिल भी मुस्कुराएगा
 और 
समय भी यही सिखाता है कि जब वक्त बागी हो जाए तो काम अपने और अपनी माटी ही आती है

Posted By KanpurpatrikaWednesday, May 13, 2020

Monday, May 4, 2020

जब कोरोना काल में भूत हुए क्वॉरेंटाइन

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 जैसा की सर्वविदित है वैश्विक महामारी कोरोना की वजह से सभी प्रकार के कामकाज ठप पड़े हैं कहीं पर भी अगर नजर दौड़ आएंगे तो आवश्यक सेवाओं के अतिरिक्त सब रुका हुआ है। ऐसे में अगर हम शांत मन से 2 माह पीछे की जिंदगी या यूं कहें कि दौड़ती हुई जिंदगी पर नजर डालें तो समझ आएगा हम कहां और किन हालातों और आपाधापी में जिंदगी गुजार रहे थे ।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों और चर्च में हजारों की भीड़ रोजाना दर्शनार्थ जाती थी लेकिन अब सब जगह सन्नाटा है प्रार्थनाएं और पूजा-पाठ तो हो रहा है लेकिन बगैर भीड़ के। ईश्वर सबके साथ है बगैर किसी आडंबर के ।
वहीं अगर आडंबर की बात की जाए और आप सभी भी उस भाग दौड़ भरी जिंदगी पर नजर डालें तो हम देखेंगे कि चौराहों पर कुछ न कुछ पड़ा मिल जाता था। कोई रात के अंधेरे में उतारा करता, नींबू काटता या डालता मिल या दिखाई दे जाता था । कई लोगों पर भूत आते थेऔर  तीन लोगों ने पकड़कर इन बाबाओं के पास ले जाते थे । ताकि झाड़-फूंक के द्वारा उन्हें ठीक किया जा सके। कई घरों में किसी पड़ोसी या अपने रिश्ते दारो द्वारा ही कुछ कराया गया ऐसे भी लोग सभी धर्मों में मिल जाते थे । इन लोग अर्थात भूतों का इलाज ढोंगी तांत्रिक बाबाओ  के पास होता था । कोई बेहोश होता था ,कोई सड़क पर ऐसे ही दौड़ जाता था, किसी को घर के अंदर ही डर लगता था ।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब सब कुछ बंद है तो दुष्ट आत्माओं व भूत भी इस कोरोना संकट  में कहीं ना कहीं क्वॉरेंटाइन हो गए हैं । क्या करोना काल में इन बाबाओं के द्वारा कृतिम भूत भी इन बाबाओं के साथ लॉक डाउन में जहां तहां फस गए हैं।
 व्यापार , नौकरी हो या किसी व्यक्ति पर उन भूतों की छाया अब क्यों नहीं पड़ रही है । जबकि कोरोना काल में सभी प्राकृतिक का खूबसूरत नजरों से आनंद उठा रहे हैं। ऐसे में यह कृतिम भूत क्या सच में क्वॉरेंटाइन हो गए हैं । अब जब जिंदगी ठहर सी गई तो मानना पड़ेगा कि हम सब एक ऐसे काल्पनिक चरित्र में जी रहे थे जिसमें वहां से निकलने का समय हमारे आपके पास था ही नहीं।
 ऐसे ही अगर हम झोलाछाप डॉक्टर से लेकर प्राइवेट क्लीनिक नर्सिंग होम पर ही नजर डालें और देखें कि इन सब जगह पर गंभीर और सामान्य बीमार लोगों की भीड़ रहा करती थी और इन की मेहरबानी से ही वहां भीड़ पैथोलॉजी सेंटर पर भी पहुंच जाया करती थी। अगर हड्डी टूटने के केस छोड़ दें तो वह सामान्य  और गंभीर बीमार मरीज उतनी संख्या में झोलाछाप डॉक्टर से लेकर प्राइवेट क्लीनिक में नहीं दिख रहे हैं ,कारण क्या है इसका ।
 हम अवसाद व बीमार थे टेंशन या भागदौड़ भरी जिंदगी और काम पटेंशन  से बीमार थे या फिर बाहर का खानपान की वजह से हम बीमार हो रहे थे। यह सोचने वाली बात है इस विषय पर भी हम सभी को एक बड़ा चिंतन करने की जरूरत है ,कि आखिर एक छींक, सिर दर्द, खांसी और ऐसी छोटी-छोटी बीमारियों जिसे अभी हम नजरअंदाज कर रहे हैं और शारीरिक व्यायाम के द्वारा ठीक भी कर ले रहे हैं ।
उन बीमारियों पर हम रोजाना कितना पैसा ऐसे ही खर्च कर देते थे । क्या हम सब अब वह खर्च बचा सकते हैं।
 जैसे हम सभी अभी घर में रहकर ही बाहर के खाने का स्वाद घर में बने खाने से ले रहे हैं और हमारी आदत थी चौराहे पर जाकर ठेले पर पानी के बताशे और पिज्जा बर्गर का आर्डर कर ही पेट भरता था।
और चाह कर भी  हम वह अपनी आदत नहीं छोड़ पा रहे थे। यह जानते हुए की वह खाना भी उतना अच्छा नहीं है फिर भी क्या कारण था।
 यह भी इन दिनों में हमें सोचना होगा पान मसाला हो या फिर शराब या अन्य नशे की वस्तुएं।  हम उन पर भी बेतहाशा पैसा बर्बाद कर रहे थे ।वलेकिन एक ही बहाना था क्या करें छूटता ही नहीं।  दिनभर जी तोड़ मेहनत करने के बाद हम उस मेहनत के पैसों को अपने परिवार की जरूरतों पर कम और नशे में कहीं ना कहीं ज्यादा खर्च कर देते थे ।बेशक अभी इन वस्तुओं पर रोक है हम अनजाने डर से घर पर ही हैं ।कोशिश जरूर नशा करने वाले कर रहे हैं ।लेकिन  इन्हें कोरोना के डर ने रोक रखा है। तो क्या हम आगे भी अपने जीवन को इस नशे की लत से दूर करके अपने परिवार के लिए एक बेहतर भविष्य की कल्पना कर पाएंगे।
 बेशक हम सभी के अंदर एक इच्छाशक्ति की कमी थी। लेकिन इस कोरोना महामारी ने हमें एक मौका दिया । जो सालों साल शायद किसी को नहीं मिलता, लेकिन कहीं ना कहीं हम अपने को सौभाग्यशाली माने कि हम इस युग और इस भारतवर्ष में है जहां स्वस्थ भी हैं और सुरक्षित भी है, ताकि हम अपने आने वाले कल को और बेहतर मुकाम दे सकें ।
स्वस्थ रहें सुरक्षित रहें

Posted By KanpurpatrikaMonday, May 04, 2020

सच्ची घटना : स्वार्थ और निस्वार्थ सेवा की

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हम सभी अपने जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक एक स्वार्थी चरित्र को अपने  साथ लेकर चलते हैं कि जैसे ही एक बच्चा बच्चा बड़ा होता है और जैसे ही जीवन जीने की समझ उसमे आती है वह स्वार्थी चरित्र उसे घेर लेता है ऐसा नहीं कि वह ऐसा करता है लेकिन हमारे समाज में ज्यादातर लोग ऐसा ही करते हैं और जैसा सब करते हैं वैसा मनुष्य चरित्र है तो हम भी करते है । अपने आसपास जैसा देखते हैं वैसा देश काल और परिस्थिति के अनुसार करने लगते हैं।

मौजूदा समय प्रकृति द्वारा दिया गया एक ऐसा समय है जो हमें दोबारा न मिले अपने जीवन में शायद ।
जहां हम अपने आसपास की घटनाओं को जैसे घटित हुए देख रहे हैं वह शायद हमने कभी सोचा भी हो।
 
कोरोना वारियर्स  जिन्हें मालूम है कि कोरोना संक्रमित  व्यक्ति द्वारा संक्रमण उन्हें भी हो सकता है बावजूद इसके वह अपने फ़र्ज़ पर डटे हैं फिर चाहे वह डॉक्टर हो पुलिस हो यह फिर सफाई कर्मी ।सभी अपने फर्ज पर लगातार डटे हुए हैं।  यह कार्य जो ये सब कर रहे है यह सालो से कर भी रहे थे लेकिन खास बात यह है कि जब लॉक डाउन में सभी अपने घरों में सुरक्षित रहने के लिए बाध्य  है वहीं कोरोना वारियर्स फ्रंट लाइन पर डटे हुए हैं ।
जिसके लिए उन्हें अतिरिक्त कुछ और नहीं मिलना है ऐसे में इनका सम्मान कर हौसला बढ़ाना इनके लिए सच्चा और श्रेष्ठ पुरस्कार होगा । जिसको देश के प्रत्येक नागरिक को उनका सम्मान और हौसला बढ़ाना चाहिए और ऐसा लोग कर भी रहे हैं ।तीनों सेनाओं द्वारा भी कोरोना वारियर्स का हौसला बढ़ाया गया ।
 मनुष्य अपने वर्तमान समय में अगर यह सब देखे तो कहीं ना कहीं देश के प्रधान सेवक से लेकर अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति निस्वार्थ भाव से देश के सच्चे नागरिक की भूमिका निभा रहा है । लेकिन हमेशा से ही अपवाद शब्द ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा और ऐसे संकटकाल में भी वह अपवाद स्वरूप कुछ लोग स्वार्थ साध रहे हैं ।  कुछ लोग जो रोज खाने कमाने वाले  कुछ रुपयों के साथ लॉक डाउन में गुजर-बसर करना चाह रहे थे।कुछ लोग कम दामो की वस्तुवों को महंगे दामो में बेचकर  अपना  स्वार्थ सिद्ध करके देश में आये संकट को एक त्योहार समझ कर लोगो को लूटने में लगे थे। 
यही मनुष्य का स्वार्थ है जिससे वह अपने जीवन में घटने वाली अचानक घटनाओं को निमंत्रण देता रहता है ।
सेठ साहूकारों ही सिर्फ इस स्वार्थ वाली पंक्ति में अकेले नही खड़े थे बल्कि नीचे तबके के लोग भी इस संकट की घड़ी में अपना अपना स्वार्थ  ढूंढ रहे थे।
 देश में आए इस संकट काल में कई समाजसेवी संस्थाओं ने भी अपने स्तर पर सहयोग किया और और गरीब लोगों के लिए खाने का इंतजाम किया ताकि कोई भी व्यक्ति भूखा ना रहे बल्कि सुरक्षित रहें स्वस्थ रहें ।
सरकार  ने भी अपने स्तर पर लोगों को राहत दी मुफ्त राशन से लेकर पैसे और पका हुआ भोजन वितरण करके सहयोग किया।
यहां पर भी अपवाद स्वरू वह स्वार्थी जनता जरूरत न होने पर भी खाने और सरकारी मदद के लिए पुरजोर कोशिश करने में लगी हुई थी ।
 देने वाला तो निस्वार्थ भाव से ही दे रहा था लेकिन लेने वाला जरूरत ना होते हुए भी स्वार्थ वस खड़ा हुआ था उस लाइन में । 
 सवाल यह उठता है कि ऐसे लोग जो उस लाइन में नहीं लग सकते  है लेकिन भूखे थे या वह लोग जो भूखे थे और उसी लाइन में खड़े थे लेकिन उनका नंबर अंत में आता था और जब तक उनका नंबर आता भोजन खत्म हो चुका होता था ।
क्या वह लोग जो जरूरत ना होते हुए भी स्वार्थ व दूसरों का हक मार रहे थे सही थे । नही जब देश या राज्य पर संकट आये तो अपने अनुसार लोगो की मदद करनी चाहिये ना कि  सवार्थी बनकर संकट काल में भी ऐसा करना चाहिए ।।

 एक व्यक्ति बच्चे के रोने पर उसके लिए बिस्कुट व अन्य सामान लेने के लिए दुकान पर जाता है उस दुकान पर ही दूसरा व्यक्ति  भी पहुचता है जिसे जरूरत नही भी थी फिर भी । तीसरा व्यक्ति दुकानदार होता है।
 यहीं पर स्वार्थ और निःस्वार्थ  दोनों तरह के लोग और तीसरा जरूरतमंद तीनों खड़े हुए हैं । जिसको जरूरत है वह बच्चे को भूख शांत कराने के लिए बिस्कुट का पैकेट लेने के लिए आता है लेकिन उसके पहले ही दूसरा व्यक्ति जरूरत ना होने पर भी बिस्कुट लेने के लिए आता है और दुकानदार से बिस्कुट के लिए कहता है दुकानदार के हां में जवाब देने पर जितने भी  बिस्कुट उसके पास हो देने के लिए कहता है ।
  यह बात सुनकर वह पिता जो अपने बच्चे भूख शांत करने के लिए बिस्कुट लेने के लिए आया था वह यही सोच रहा था क्या अभी मैं बिस्कुट नहीं ले पाऊंगा मेरा बच्चा  रोता रहेगा। लेकिन तभी दुकानदार के यह कहकर उसके परेशानी और बढ़ा दी थी एक ही पैकेट मेरे पास है और वह गैर जरूरत वाला व्यक्ति लेकर चला जाता है ।
वह व्यक्ति जो बच्चे के रोने पर बिस्कुट का पैकेट लेने के लिए आया था जाने लगता है तभी दुकानदार उसको रोक कर उससे भी बिस्कुट का पैकेट देने लगता है उस पर उस पिता ने पूछा कि अभी तो आपने एक होने की बात कही थी इस पर दुकानदार ने कहा मुझे तो बेचना ही है और बेचकर उतना ही पैसा मिलेगा चाहे वह 10 पैकेट एक व्यक्ति दे दूं या 10 अलग अलग व्यंक्तियो को। इससे अच्छा है 10 लोगो को देकर सबकी जरूरत पूरी की जाए न कि बेवजह खरीददारी करने वाले लोगो की ।

 आगे दुकानदार ने कहा मेरे पास पर्याप्त मात्रा में है और थोक बाजार में भी सब कुछ पर्याप्त मात्रा में है फिर भी कुछ लोग  स्वार्थ वस अपने घर में एकत्र कर रहे हैं क्यों उनको यह बात खुद भी नहीं पता । लेकिन वह यह काम कर रहे हैं।  यह वही लोग हैं जो दूसरों का हक मारने के लिए सड़कों पर टहल रहे हैं । इस सच्ची घटना के द्वारा हम यह कह सकते हैं कि यह सब घटनाएं हमारे आसपास भी घटित हो रही हैं लेकिन हम क्या कर रहे हैं स्वार्थ वस चुप है या निःस्वार्थी बनकर मदद कर रहे है ।
कहानी  छोटी है लेकिन सीख बड़ी है कि अगर ऐसा संकट देश पर आएगा तो एक सच्चा नागरिक अपना स्वार्थ देखेगा या देश के साथ खड़े होकर देश हित में कदम उठाएगा ।
 देश भी आपका समय भी आपका सोचे आप देश के लिए आपका वर्तमान समय मे क्या करते है ताकि भविष्य के लिए लोगो को क्या संदेश और सीख देते है । आप पर ही निर्भर करता है ।
जय हिंद

Posted By KanpurpatrikaMonday, May 04, 2020