Tuesday, March 15, 2011

मेरी नौकरी कहा है भाई ...

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मेरी नौकरी कहा है भाई ...

जब मैं सड़क के किसी कोने से निकलता हु तो हर कोई हाथ में डंडा लिए हमको को मारने के लिए ही खड़ा रहता है मेरे से क्या हो गया जो हर कोई हर ओर हमे ही मारने की सोचता है .. आखिर हमारा कसूर क्या है कोई बताएगा ...
पाता नहीं कोई बता पायेगा लेकिन मुझे नहीं लगता की किसी को पाता होगा बस सभी अपनी धुन में रहते है गर मैं किसी को मार दू तो शायद वो जान से मर जायेगा .. और ऐसा हुआ भी है अगर किसी दिन हमको गुस्सा आ जाता है और मैं जब लोगो को मारने दौड़ता हु तो फिर मेरे सामने कोई दिखाई नहीं पड़ता है सभी अपना स्थान छोड़ कर भागते नज़र आते है चे वो स्कूटर पर हो या कार पर या फिर पैदल ही क्योँ न हो ... सभी भागते ही नज़र आते है ..
पिछले हफ्ते की ही बात ले लीजिये की मेरे ही मिलने वालो को एक साहब ने जोर की लाठी मार दी फिर क्या था उनको गुस्सा आ गया और उन्होने आओ देखा न तौ और उन मिश्रा जी को बीच सड़क पर पटक दिया .. मिश्रा जी के जमीन पर गिरते ही जो से उनके मुह्ह से एक जोरदार गाली के साथ मर गया की आवाज़ भी आई .. और मैने और लोग जो मेरे को मारने आने वाले थे को चेतवानी दे कर वहा से निकल गया .. और आज जब मैं मिश्रा जी के घर के पास से निकलता हु तो मिश्रा जी की जवानी बुढ़ापे में नज़र आती है .. मुझे तरश आता है लेकिन मेरी भी क्या गलती थी जो मिश्रा जी ने जोर दार डंडा मरा था मेरे को .. मेरी कौन सी नौकरी है जो दोपहर का खाना और रात के खाने का या फिर शुबह के नाश्ते का बंदोबस्त होता है ....
मैं भी तो सभी के टुकडो पर पलता हु मैं ही क्योँ सभी मेरे ही तरह के जानवर चाहे वो साड़ हो कुत्ता हो या और कोई .. एक थी गाय जो पुजनिये थी आज कल उनका भी बुरा हाल है वो भी हमरी कटेगरी में आ गई है हा कभी कभार तीज त्यौहार में उनका कुछ सम्मान जरुर हो जाता है लेकिन उनका भी हमरे जैसा ही हाल है उनको भी लाठियों के साथ गालिया मिलने लगी है
अब आप ही सोचिये की एक जानवर की कौन सी नौकरी होती है .. वो भी तो सुबह से शाम तक घूमता रहता है इंसानों का बचा हुआ फेका गया खाना खाने को मिलता है वो भी उसमे भी हिस्सा लगता है कभी कुत्ता तो कभी पागल इन्सान भी उसमे हिस्सा बाटने चला जाता है यहाँ तो सरकरी नौकरियों जैसा हाल है की पहले औ और पहले पौ ..
कल ही की बात मैं मैं पिछले तीन दिनों से भूखा प्यासा टहल रहा था प्यास लगी सो एक बाल्टी में मुह डाला जरा स पानी अन्दर गया ही था की उसकी 10 गुनी तीव्रता के साथ वो पानी बाहर आ गया मैं तुरंत ही वह से भगा एक इन्सान ने मेरे पीछे से एक मजबूत और जोर दार डंडा जो मेरे मरा था अभी तक भूख और प्यास से बेहाल था अब दर्द से भी लेकिन भूख के आगे सब कुछ भूल गया और दूसरी ओर गया वहा भी खाने की कुछ सामान रखा थी सो खाने लगा और साथी कुत्तो ने नोचना चालू कर दिया किसी तरह आपसी संघर्ष के बाद तीन दिन की भूख पर थोड़ी राहत मिली और फिर मजबूरन गन्दी नाली का पानी पीना पड़ा सभी इन्सान देखते है उर सोचते है की कैसे प़ी लेते है हम ऐसा पानी तो उनको बताना चाहता हु की जब प्यास लगती और पानी नहीं ,मिलता है तो जो भी सामने जल जैसी जो भी चीज़ आएगी उसको पीना पड़ेगा ..
लोगो से मैं पूछना चाहूँगा की आखिर जानवरों को अगर कुछ खिला दोगे तो क्या चला जायेगा ..हम दुआए ही देंगे लेकिन हमरी दुआए किसी को क्या फायेदा पहुचेंगी ये तो एक पंडित ही बताएगा क्योंकि ग्रहों की चाल वही जानता है गर वो कहे की कल से आपके द्वार के सामने कोई भी कुत्ता नहीं दिखना चाहिए तो एक अलग से आदमी लगा दिया जायेगा और कोई भी कुत्ता स्वरुप जानवर दिखने पर उसका सम्मान लाठियों और डाँडो से होगा अगर पंडित कह दे की कल से आप रोज़ 21 दिनों तक साड़ को शुद्ध गंगा जल पिलाय तो आपको विदेश यात्रा मिलेगी तो शायद इन्सान अपने दरवाजे के बाहर एक साड़ ही बांध ले और उसकी खूब सेवा करेगा ..लेकिन अभी तक पूजी जाने वाली गाय भी लोगो के लिए बोझ बनती जा रही है तभी तो जिस निवाले पर हमारा हक हुआ करता था आज उस पर एक और अधिकार गाय का हो गया है और वो भी कहेती है की क्या करू मज़बूरी है दूध देनाहै खाना मिले न मिलेदूध तो देना है क्योंकि गर दूध देना बंद कर दिया तो वो हमे कसाई के हाथो बेच देगा और उन पैसो से एक नए गाय फिर आ जाएगी इस ,लिए अपनी जान बचने के लिए खुद ही खाना खोजना पड़ेगा ..
मेरी कौन सी नौकरी है जो मैं शाम को या महीने के आखिर में रासन भर कर आराम से खाना खाऊंगा ..क्योँ मारते हो मेरे को जरा सोचो अगर आप मेरी जगह होते तो क्या करते खैर हम जानवर तब भी खुश है काम से काम हमे कोई हमारे समाज में ये तो नहीं कहता है की इन्सान हो क्या ...

Posted By Ashish TripathiTuesday, March 15, 2011