न्यूजरूममजमा लगता है हर रोज़,सवेरे से,खबरों की मज़ार परऔर टूट पड़ते हैं गिद्दों के माफिकहम...हर लाश परऔर कभी...ठंडी सुबह...उदास चेहरे,कुहरे में कांपते होंठ-हाथ-पांव,और दो मिनट की फुर्सत... काटने दौड़ती है आजकलअब शरीर गवाही नहीं देता सुस्ती की...न दिन में और न रात में...जरूरी नहीं रहे दोस्त...दुश्मन...अपने...बहुत अपनेज्यादा खास हो गयी हैफूटी आंख न सुहाने वालीटेलीफोन की वो घंटी... जो नींद लगने से पहले उठाती है...और खुद को दो चार गालियां देकर...फिर चल पड़ता हूं...चीड़ फाड़ करने...न्यूजरुम में...न्यूजरूममजमा लगता है हर रोज़,सवेरे से,खबरों की मज़ार...