Wednesday, April 27, 2011

मेरे दोस्त होने का शुक्रिया

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मेरे दोस्त होने का शुक्रिया

दोस्ती में ढगा गया दोस्तों से दगा मिला
दोस्त होते है काम के या सिर्फ मतलब नाम के ..
जब जरुरत थी तब नहीं थे और जब लूटने की बारी आई तो लूट्ने सब आये
धोखा चाल फरेब चापलूसी सब नाम है दुश्मनों के
लेकिन कलयुग में मिलते है दोस्तों के नाम से ..
दोस्ती में ढगा गया दोस्तों से दगा मिला
एक एक कर के आये या एक साथ आये वो
लुटवाने का इरादा न था पर लूटने सब आये जो ..
दोस्ती नाम था क़ुरबानी का हमसफ़र का ....
जरुरत औरपरेशानियों में साथ का ...
आज वही दोस्त हमे साफ करने में लगे है
हमारे सुख को दुःख में बदलने में लगे है ..
हमारी खुशिया आज उनके किसी काम की नहीं
और हमारे आशु उनकी तरक्की का टानिक बन गय
दोस्ती में ढगा गया दोस्तों से दगा मिला

Posted By Ashish TripathiWednesday, April 27, 2011

Saturday, April 23, 2011

कानपुर में नशेबाज दरोगा ने टॉयलेट को बनाया घर





कानपुर में नशेबाज दरोगा ने टॉयलेट को बनाया घर



यू पी पुलिस अपना अंदाज़ अपनी बात एक अलग पहेचन कभी फर्जी केस तो कभी फर्जी इनकाउंटर अपनी छवि को सुधारने के लिए कितना चिंतित है रहती है लेकिन विभाग के ही कुछ लोग पूरी यु प़ी पुलिस को बदनाम कर देते है ...कानपुर एक दरोगा को शराब इतनी चढ़ गई की उन्हे अपने घर और
पब्लिक टॉयलेट में नातर ही याद नहीं रहा और आराम फरमाने लगे .. ये तो कानपुर के इन दरोगा जी को ऐसी नशेबाजी में देख कर आपको सहज पता चल सकता है | कानपुर के घंटाघर स्थित पब्लिक टॉयलेट को अपना ड्राइंगरूम समझ कर ये आराम फरमा रहे है ये दरोगा जी कानपुर के पुलिस लाइन में तैनात है जो की वर्दी का गुरुर और शराब के सुरूर में इतने मस्त हुए की कहा आराम फरमा रहे है यही भूल गए ,यू पी की मित्र पुलिस....लेकिन ये शायद इस तरह से मित्रता करंगे पता नहीं लेकिन जनता के सामने ही इससे बड़ा कोई नाजारा देखने को मिले की दरोगा जी टॉयलेट में आराम फरमा रहे है और जनता पीछे टॉयलेट कर रही है दातादीन वर्मा नाम के ये दरोगा जी को अंगूर की बेटी की खुमारी चढ़ रही थी और इतनी असर की की दरोगा जी ये भी भूल गाय की वो कहा लेते है और क्या क्या बोल रहे है और बातो ही बातो में दरोगा जी खुद बताते है की वो अफीम का सेवन किये हुए भी है ,

Posted By Ashish TripathiSaturday, April 23, 2011

Friday, April 22, 2011

काजोल करीना और दीपिका पादुकोण देंगी कानपुर में पोस्ट ग्रेजुएशन के पेपर ....

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काजोल करीना और दीपिका पादुकोण देंगी कानपुर में पोस्ट ग्रेजुएशन के पेपर ....

खेल जारी है शिक्षा माफियाओ का और इस बार खेल ऐसे खेला की करीना इमरान और काजोल को परीक्षा देनी पड़ जाय...मामला कुछ यु हुआ की छत्रपती साहू जी महाराज विश्वविद्यालय और शिक्षा माफियाओ ने खेल कुछ यु खेला की एम् . ए. प्रथम वर्ष की छात्राओं के वास्तविक फोटो की जगह काजोल और करीना के इण्डिया ऍफ़ .एम् .वेब साईट के फोटो लगा दिए गए.. और जब ये परीक्षा केंद्र में परीक्षा देने पहुची तब उनकी वास्तविक फोटो न होने पर उन्हे पेपर नहीं देने दिए गय ....यहाँ ठेके पर फॉर्म भरने वालो का की ऐसी गलती हुई की छात्राओं का भविष्य अन्धकार में चला गया ...और व्यक्तिगत परीक्षार्थी को शर्मिंदा भी होना पड़ा ..एम् ए प्रथम वर्ष की करीब 08 छात्राओं के प्रवेश पत्र में भूमिका चावला करीना कपूर और काजोल के इण्डिया ऍफ़ .एम् .वेब साईट से फोटो ग्राफ लगा दिए गय ..और जब ये छात्रायें परीक्षा केंद्र में परीक्षा देने पहुची तो कल्यानपुर के डॉ. राम मनोहर लोहिया महाविद्यालय ने सम्बंधित सभी छात्राओं को परीक्षा में बैठने से मना कर दिया गया ...
वही छत्रपती साहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति हर्ष कुमार सहेगल ने कहा ये मामला अपनी तरह का अलग है और जानकारी है दोषियों के खिलाफ कार्यवाही होगी ..एसा कैसे हुआ जबकि विश्वविद्यालय स्तर से सत्यापन फार्म और प्रवेश पत्र के फोटो ग्राफ का सत्यापन क्यों नहीं हुआ ..कुल मिलकर ठेके पर फॉर्म भरवाने और विश्वविद्यालय के आपसी गलतियों से नुकसान छात्रायें छात्रायें उठा रही है,विश्वविद्यालय प्रशासन छात्राओं किसी भी प्रकार का रहम करने के मुद में नहीं है क्योंकि प्राइवेट फॉर्म भरने में छात्राओं की अपनी गलती हुई है क्योंकि ऑनलाइन फॉर्म में सारी जानकारी छात्राओं को खुद ही भरनी थी इस लिए पहली नज़र में छात्राओं का ही दोष नज़र आता है ॥
जिन छात्राओं के साथ ये घटना हुई है उनमे समाज शास्त्र एम् ए प्रथम वर्ष की रखी और वंदना में काजोल की फोटो और जया की फोटो के स्थान पर इमरान की और ज्योति की फोटो पर करीना , कल्पना और सुमन की जगह सोनल चौहान की , आरती की जगह भूमिका और रूचि की जगह दीपिका की फोटो लगी है ..अब जबकि छात्राओं का के साथ ऐसा खेल खेला गया है तब विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी गलती नहीं मनाने को तैयार है जबकि छात्राओं का कहना है की परीक्षा शुरू होने से पहले ही हम सभी ने विश्वविद्यालय के चक्कर लगाय लेकिन हमारी कोई सुनवाई नहीं हुई ..ऐसे में सवाल ये उठता है की विश्वविद्यालय प्रशासन ने ऑनलाइन फॉर्म भरने के बाद उनका सत्यापन क्योँ नहीं किया अगर कुछ फॉर्म में गलतिय थी तो उनको सही करवाने की व्यवस्था क्योँ नहीं की गई ..खैर मामला रोचक हास्य पूर्ण और चिंतनीय है....

Posted By Ashish TripathiFriday, April 22, 2011

Monday, April 18, 2011

तेरे मेरे सपने .....

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तेरे मेरे सपने .....


12 अप्रैल 2011 को नॉएडा जैसे शहर में एक ऐसा मामला सामने आया की जिसने सुना वो दंग रहे गया .. मीडिया में खबरे बराबर आ रही थी बस अंतर था तो उनकी ब्रेकिंग न्यूज़ की लाइनों में कोई " काल कोठारी में बंद दो बहने " "कोई "नॉएडा के फ्लैट नंबर ३२६ का सच " तो कोई "नॉएडा में जिन्दा कंकाल " आदि सभी सबसे पहले उस खबर की सच्चाई बताना चाहते थे की किस तरह नॉएडा जैसे शहर में दो बहनों ने अपने आप को सात महीनो तक एक फ्लैट के अन्दर बंद कर के रखा ॥.... और खास बात ये थी की न पड़ोसियों और नहीं ही उस फ़्लैट की सोसाइटी के लोगो ने जरा भी चिंता या खबर नहीं ली , क्या यही मानवता रह गए है आज के समय में मेट्रो लाइफ में ... फिर सब क्यों चिल्लाते है की नॉएडा दिल्ली नहीं है सुरक्चित ॥.... जब हम अपनों का हाल खबर नहीं रखेंगे तो कैसे और कब क्या हुआ कैसे पता चलेगा ..क्या किसी की कोई जिम्मेवारी नहीं बनती है ...बस अपना काम और हमारे आस पास पास घट रही घटनाओ से कोई सरोकार नहीं है ,फिर कोई ऐसी घटनाओ पर आश्चर्य व्यक्त करते है ..खैर आश्चर्य तब होता है जब अनुराधा और सलोनी को निकला जाता है और कुछ मीडिया कर्मी उससे ही पूछने लगते है , जब कोई इन्सान सात महीनो से अपने आप को एक कमरे में बंद किये हो यानि समाज और दुनिया से सात महीनो पीछे चल रहा हो और अचानक भीड़ के साथ कुछ लोग अन्दर जाते है और कैमेरो के फ्लेश चमकाने लगते है और अनुराधा के आंगे न्यूज़ चेंनेल की आई डी लगती है और उससे कुछ सवाल किये जाते है क्या मीडिया क यही फ़र्ज़ बचा है की किसी भी वक्त किसी के भी आंगे कैमरा खोल कर आई डी लगाना .... खैर ये उनका काम है वो अच्छे से समझते होंगे ..अब बात करते है उन लडकियों के जीवन की कैसे उन्होने सोनाली और अनुराधा ने ऐसा कदम उठाया की सात महीनो तक अपने को एक कमरे तक सीमित कर लिया जब की उनके पास उच्च शिक्षा थी और नौकरिया भी थी फिर ऐसा क्या हुआ जो ऐसे हालात हो गए आइये जानते है क्या हुआ उनके साथ....
नुराधा ओर सलोनी व विपिन के आपसी रिश्तो के साथ एक कुत्ता भी था जो इस चारो के साथ में रिश्तो की डोर में कही न कही बंधा हुआ था .....एक अच्छे परिवार से ताल्लुक रखने वाली सलोनी और अनुराधा की शुरूआती पढाई काफी अच्छे स्तर पर हुई और दोनों बहनो ने उच्च शिक्षा भी ग्रहण की और अपने सपनो को लेकर अपनी अपनी मंजिल की और चल पड़ी लेकिन मंजिल पर पहुचने से पहले ही रिश्तो की गाड़ी पर से एक रिश्ता टूट गया जो की उनके बेहद ही करीब था जब उनके पिता उनके साथ जब नहीं हुआ करते थे तब उनकी माँ ही उनका साथ देती थी लेकिन माँ का चला जाना उनके लिए एक बड़ी घटना थी क्योंकि अब साडी जिम्मेवारी सलोनी पर जो आ चुकी थी क्योंकि दोनों भाई बहनों में सलोनी ही बड़ी थी ...और सभी ने अपनी माँ को यादो में समेटा और चल पडे फिर से अपनी मंजिल की और लेकिन विपिन अभी छोटा था और उसको माँ के अंचाल की बेहद जरुरत थी और इसे समय कौन था उसकी देख भाल करता और कौन उसको पढाता ये सबसे बड़ी समस्या इस परिवार पर आ पड़ी और इसका हल खुद सलोनी ने ही निकला ..
और सभी की आपसी बातचीत के बाद सलोनी ने अपने सपनो को कुचल कर विपिन में अपने सपने पूरे करने की सोची क्योंकि घर का सबसे छोटा बच्चा वैसे ही प्यराहोता है और दो बहनों के बाद विपिन का होना वैसे भी परिवार के लिए खुसिया ले कर आया था इसलिए सलोनी ने अपनी नौकरी छोड़ कर विपिन पर ही पूरा ध्यान देना शुरू कर दिया ...और अनुराधा अभी भी अपने सपनो की मंजिल पर चली जा रही थी ...
लेकिन शायद इसपरिवार का खुशियों की और से नाता ही टूट चूका था उर रिश्तो कसके बंधी डोर धीरे धीरे कमज़ोर होती जा रही थी ये आपसी रिश्तो में कमी न होकर उनके पिता का भी इस दुनिया से चला जाना था .. जब उनको लगा की माँ की मौत के बाद हमारा परिवार संभल गया है तभी पिता की मौत ने सलोनी को पूरी तरह से तोड़ दिया था ..और सलोनी नितिन को स्कूल भेजने के बाद अक्सर गुमशुम बैठी रहती .. और जब कभी अनुराधा पूछ्ती की दीदी क्या हुआ तो यही कहती कुछ नहीं बस यु ही तबियत ठीक नहीं है ..और वो विपिन के बडे होने पर यही सोच रही थी की अब विपिन कही नौकरी करने लगे और उसकी शादी के बाद हमारा घर एक बार फिर से खुशियों का मुह देखेगा लेकिन एसा नहीं हुआ ...और वो यही सोचती की अब शायद फिर से सर्विस कर लू ताकि थोडा टाइम पास हो जायेगा लेकिन फिर यही सोचती की अब क्या बचा है ..और विपिन को पूरी तरह सेटेल करने के बाद ही कुछ करुँगी लेकिन यहाँ भी खुशियों ने उनके साथ छलावा किया ..
विपिन की नौकरी भी लगी और सब खुश भी थे अब विपिन के लिए लड़की भी देखि जाने लगी और विपिन की शादी भी तय हो गई ..लेकिन विपिन ने उस घर को जिसमे उसका बचपन बीता और जवान हुआ शादी के बाद उसको वो घर ही छोटा लगने लगा और उसने अपनी बहनों से कह की अब हम दूसरी जगह सिफ्ट हो जाते है क्योंकि ये घर हम सब के लिए छोटा है .. इस बात से सलोनी के अकेले पन और खुशियों को एक जोरदार झटका लगा ..
और सलोनी ने भी उसी घर में रहने की बात कही की मैं इस घर को छोड़ के नहीं जाउंगी जहा मेरे माँ और पिता जी यादे जुडी हुई है मैं उस घर को छोड़ के नहीं जाउंगी .... भाई ने उन दोनों बहनों को छोड़ कर दूसरी जगह रहने चला गया ..
सोनाली अनुराधा के जाने के बाद एकदम अकेली हो जाती थी और दिन भर यही सोचती की कैसे उसने अपने लिए सपने देखे थे और किस प्रकार माँ के जाने के बाद अपने सपनो को एक किनारे करके विपिन की ओर पूरा ध्यान लगाय की मैं उसको ही इतना काबिल बना दूंगी की मुझे कभी अफसोस ही नहीं होगा की मैने कुछ किया ही नहीं लेकिन ये क्या हुआ वही विपिन मुझे ही छोड़ कर चला गया ..जिसको मैने कभी अकेला ही नहीं छोड़ा वो किसी भीज चीज़ के लिए एक बार या दस बार हर बार मैं पूरी करती थी अब वही भाई कहता है की मैने कई बार कहा लेकिन बहने मेरे साथ रहने के लिए तैयार ही नहीं है क्या विपिन ने कभी ये जानने की कोशिश की हम क्योँ नहीं जा रहे है ..जब हमने उसे अकेले नहीं छोड़ा तो आज उसे भी हमे नहीं छोड़ना चाहिए था लेकिन अब क्या होसकता है ॥ अब तो किसी पर भी विश्वाश नहीं किया जा सकता है ....क्या रिश्ते इतने कमज़ोर होते है गर हा तो मैने क्योँ अपने सपनो को मार के भाई के लिए सपने देखने चालू किये थे शायद जब हम बड़े हो जाते है तो रिश्ते छोटे हो जाते है ....शायद दुनिया के भी सभी रिश्ते ही ऐसे होते है किसी पर विश्वाश ही नहीं करना अब किसी से रिश्ते बनाऊँगी ही नहीं तो टूटेगे कैसे ...और ऐसी सोच के साथ सोनाली ने सबसे मिलना जुलना बंद कर दिया था उर अपने को कमरे में बंद कर लिया ॥ और कभी कभी सोनाली ये भी सोचती की ऐसा तो नहीं किसी ने हमारे ऊपर कुछ कर दिया हो जादू टोना जिसकी वजह से ही माँ फिर पापा और अब मेरा भाई भी छोड़ के चला गया ॥ अब मैं अनुराधा को नहीं खोना चाहती ...लेकिन दूसरी ओर अनुराधा अभी भी अपने काम पर जाती रही लेकिन जब भी वो काम से वापस घर आती तो अब उसको अपनी दीदी सोनाली में कुछ अजीब से बदलाव नज़र आने लगे उसकी बाते और उसका व्यवहार और अनुराधा को लगा की सोनाली के अकेले रहने के कारण ही ऐसा होता जा रहा है अब अनुराधा ने भी अपनी दीदी के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी और वो भी सोनाली के साथ रहेनी लगी और कभी कभी घर से बाहर सामान वगैरह लेने जाती रही लेकिन जब भी वो बाहर जाती सोनाली उसको बड़े प्यार से समझाती की किसी से बात न करना कोईखाने को दे तो मत खाना किसी ने हमारे घर के ऊपर जादू टोना ब्लैक मैजिक कर दिया है और अनुराधा भी धीरे धीरे कमरे में ही रहने लगी इसी बीच टेलीफोन और बिजली के बिल न जमा होंने के कारण उनका कैन्केशन कट गए यानि अब न जमाने से उनका कोई रिश्ता था न बिजली और टेलीफ़ोन से अब फ़्लैट नंबर ३२६ एक काली कोठरी में तब्दील हो चुकी थी जहा दो बहने अकेले रहती थी और न खाना न पीना हा जब तक फोन ठीक था तब तक बगल केस्टरे से फोन करके सामान जरुर माँगा लिया करती थी लेकिन अब वो भी नहीं ...
इसी बीच उन दोनों बहनों के साथ उनका प्यार कुत्ता भी अन्दर ही बंद रहता और एक दिन उसने भी दम तोड़ दिया जिससे की सोनाली अब बिलकुल ही टूट चुकी थी और उसने अब दिन हो या रात बस बिस्तर के एक कोने में ही पड़ी रहेती थी न भूक न प्यास हा अनुराधा भी भी कुछ खा लिया करती थी लेकिन सोनाली अब एक जिन्दा नर कंकाल से ज्यादा कुछ भी नहीं थी और अनुराधा सर्दी हो या गर्मी दिन हो या रात अब इनको कोई फर्क ही नहीं पड़ता था ....अब उनका भाई जो कभी कभी हाल चाल ले लिया करता था उसने भी बिलकुल ही सम्बन्ध ख़त्म कर दिए की इन लोगो को समझाने से कोई फायेदा नहीं है ..अब दोनों बहने यही सोचती की किस प्रकार हम यह खेला करते थे लड़ा करते बठे और आज हमरे साथ कोई नहीं है न कोई आता है न कोई जाता है बस है साथ तो यादे और अँधेरा अब तो किसी भी रिश्ते पर विश्वास ही नहीं रह कब कौन अपने फायेदे ले लिए हमसे रिश्ते बनाय ..कोई नहीं है हमारा ....
हाँ पर ही अनुराधा उर सलोनी की मौत हो जाती और कई दिनों बाद जब पड़ोसियों को लाशो की बदबू लगती तब वो सोसायटी में खबर करते तब मालूम पड़ता लेकिन इस सोते ही समाज में कई ऐसे भी लोग है जिनको जगने की भी आदत है और दूसरो के लिए कुछ करने की तभी तो जब उनको ये मालूम पड़ा की दो बहने अपने को महीनो से कमरे में बंद किया हुआ है तो उन्होने अपने प्रयासों से उन दोनों को बाहर निकलवाया और इलाज के लिए भेजा लेकिन दुसरे ही दिन सलोनी ने दुनिया छोड़ दी शायद वो यही सोच रही होगी की अब फिर से कोई रिश्ता बनेयेगा और फिर तोड़ेगा इससे अच्छा है की मैं दुनिया ही छोड़ दू ..लेकिन अब लोगो को उनकी चिंता भी होने लगी थी और सोसायटी और सब अब अपनी अपनी सफाई दे रहे थे ...
रिश्तो की गर असली परिभाषा जाननी है तो पश्चमी देशो के नागरिको से पूछो जो आज भी भारतकी संशाक्रती और समज को देखने के लिए सात समन्दर पर से अपना कीमती समय निकल के आते है और जानते है यहाँ के रिश्तो के बारे में लेकिन आज यहाँ के लोग उनकी संशाक्रती को ही अपना रहे है तब क्या होगा ऐसा ही होगा ॥ वो सैलानी बताते है की कैसे भाई बहन के रिश्ते हिंदुस्तान में निभाई जाते है कैसे माता पिता का शीर्वाद सबके काम आता है कैसे एक ही घर में १० से २० लोग रहते है और प्यार लगातार बढता रहता है लेकिन अब ऐसा नहीं है हमसे जो सीख रहे थे आज हम उन्ही से सीख रहे है ..
आज अहम भारतीय उस कल्चर को अपना रहे उसकी ही बात करते है उस ही कल्चर का खाना खाना पसंद करते है जिसका की कोई वजूद ही नहीं है जहा रिश्तो की क़द्र ही नहीं है जहा रिश्ते निभाय ही नहीं जाते है जहा सपने सिर्फ अपने लिए देखे जाते है अपनों के लिए नहीं ...
मेट्रो लाइफ जहा हर कोई भाग रहा है शायद इसी को मेट्रो लाइफ कहते है जहा हर कोई भाग रहा है पैसो के लिए ॥ रिशोत से ज्यादा पैसो की कीमत है जब रिश्ते ही नहीं रहंगे तो ऐसे पैसो का क्या काम ॥
ये ख़त्म होते रिश्तो की शुरुआत है
ये आपसी रिश्तो की कमज़ोर होती डोर है


Posted By Ashish TripathiMonday, April 18, 2011

Friday, April 15, 2011

ये रिश्ता क्या कहलाता है

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-: ये रिश्ता क्या कहलाता है :-
समाज में बदलती रिश्तो की परिभाषा समाज में बदलती अपनों की सोच अपनों के लिए ...
माँ अपनी ही बेटियों से गलत काम करवाती है ,पिता अपनी ही लडकियों को हवश का शिकार बनता है , गुरु अपने ही शिष्य पर गलत नज़र रखता है और भाई बहन के रिश्तो को ही शर्मसार करते है ...
आखिर इन रिश्तो की भी तो कभी मिसाल दी जाती थी लेकिन आज के समाज को ये क्या हो गया है / बिलकुल साबुन के विज्ञापन की तरह हो गया है .. पहले इस्तेमाल करे फिर विश्वास करे .. आखिर क्यों और कब तक लिव इन रिलेशन शिप पर चर्चा होती है तो कभी गुरु और शिष्य के अपवित्र प्रेम पर ...कही ये ख़त्म होते रिश्तो की शुरुआत तो नहीं अगर कही ये शुरुआत है तो अंत जानवरों के रिश्तो पर जा के खत्म होगा जहा सभी रिश्ते मायने ही नहीं रखते वो सिर्फ खाने के लिए ही जीते है और आपसी संघर्ष में मारे जाते है ...
ये रिश्ता क्या कहलाता है की सोच मुझे समाज में हो रहे रिश्तो के क़त्ल को सोच कर आई क्या रिश्ते आज के समाज के लिए कोई मायने नहीं रखते है रिश्तो में बडती कडवाहट और घटा सामजिक परिवेश ही ख़त्म होते रिश्तो की असली वजह है एकाकी जीवन शैली और घटी अपनी पुरानी सभ्यता
-- जहा सयुक्त परिवार में रह कर सभी खुश रहते थे वही एकांकी जीवन शैली में घुट घुट कर जीने को मजबूर है ...आज टी वी से बड़ा हुआ बचपन अपने ही रिश्तो को नहीं पहचानता .. कारण न माँ के आँचल का छाव मिलता है न पिता की डाट .. शायद इसलिए ही रिश्तो की डोर कमज़ोर होती जा रही है
देश का बहु चर्चित आरुशी और हेमराज मर्डर केश सालो लग गय पुलिस और सी बी आई को ये पता लगाने में में आखिर कत्ल क्यों हुआ और किसने किया फिर भी नतीजा सिफ़र रहा ..एक लड़की का कत्ल उसके ही घर में हो जाता है और आज तक किसी को भी ये नहीं पता चला की कतला क्यों और कैसे हुआ .. शायद मालोममालूम सबको है लेकिन कोई बताना नहीं चाहता है कभी तलवार दम्पति कोर्ट में जाकर इंसाफ मांगते है तो कोई उनको ही गुन्हेगार बता कर उन पर ही हामला कर देता है आखिर क्यों क्या यभी भी रिश्तो में अपनापन नहीं था अपनों को समझाने की ताकत नहीं थी ..ये बात सभी को मालूम है की किसी को भी किसी का कत्ल करने में एक दिन नहीं एक घंटा नहीं एक मिनट नहीं कई दिन लगते है लेकिन एक सेकण्ड में उसको मार देते है ...यानि अरुशी और हेमराज को मारने में किसी न किसी बात का खुलना या राज फाश होना था .. क्या आपसी रिश्तो में इतनी दुरी आ गई थी की एक माकन में रहते हुए भी कोई किसी की भी परेशानियों को नहीं समझ पा रहा था सभी अपनी खुशिया खुद तलाश रहे थे ...क्या मेट्रो लाइफ इतनी तेज़ी से चलती है की लोगो के पास अपनों के लिए ही समय नहीं है अगर एसा ही रहा तो एक दिन हम में से कोई पड़ा होंगा सड़क पर और हमारा ही भाई ये कहते हुए निकल जायेगा की ये तो रोज़ की बात है .../

और दूसरी और कानपुर के बहुचर्चित दिव्या कांड को भला कौन कानपुर वाला भूल पायेगा ..जहा शिक्षा के मंदिर में ही गुरु ने अपनी ही शिष्य को अपनी हवश का शिकार बना डाला ..और उसकी जिंदगी बचाने के बजाय उसको छोड़ दिया मरने के लिए और वो मर भी गई शायद जीती तो रोज़ मरती..लेकिन ये मौत ज्यादा अच्छी थी समाज की आंखे खोलने के लिए ..कानपुर के दिव्या कांड में कई ऐसे नाटकीय मोड़ आये जब रिश्तो को अपमानित और टूटे देखा गया कभी पडोसी तो कभी दिव्या के ही मकान में रहने वालो पर पुलिस की बर्बरता कभी मुह बोले चाचा मुन्ना को ही उसका कातिल बता दिया गया लेकिन हर बार असली गुनहगार बचता रहा क्यों / क्योंकि यहाँ जनता और पुलिस के रिश्तो की डोर को कमज़ोर किया जा रहा था ..जहा आज रिश्तो से बड़ा पैसा हो गया है जिसके हाथ में जितनी मोती गड्डी होगी हम उसको उतनी ही देर तक साथ देते रहेंगे ..लेकिन आज के समाज का कड़वा सच यही है जहा रिश्तो से ज्यादा लोग पैसो को तवज्जो देते है ..लेकिन दिव्या कांड में जो रिश्ता कलंकित हुआ वो शर्मशार कर देने वला था ..क्योंकि ये रिश्ता था शिक्षा के मंदिर में गुरु और शिष्य का काफी लोगो ने कहा भी ये गलत था लेकिन इसके बाद भी गुरु और शिष्य को बदनाम करने वाली घटनाय कानपुर में होती रही ..लेकिन यहाँ असली गुनहगार को सजा मिल गई ..
लेकिन दिव्या कांड के साथ एक और कांड कानपुर में हुआ लेकिन उसको लोगो की उतना साथ नहीं मिला जितना दिव्या को मिला शायद कह सकते है की केस लगभग एक ही तरह का था लेकीन उम्र और जगहों का अंतर था ..ये था कविता कांड जहा भगवान स्वरुप समझे जाने वाले डाक्टर के मंदिर स्वरुप अस्पताल में कविता के साथ भी गलत होता है और दोषी बच जाता है जबकि कविता की मौत हो जाती है ....जहा लोग डाक्टर को भगवान और अस्पताल को मंदिर समझते है वहा ऐसे काम होते है इन रिश्तो को क्या कहेंगे क्या यहाँ भी मेट्रो लाइफ हावी है नहीं कम से कम यहाँ तो नहीं है मेट्रो लाइफ फिर भी रिश्तो में ऐसा सौतेलापन क्यों ..लेकिन यहाँ जहा रिश्ते भगवान के करीब से पूजे जाते है और कविता अपने लिए जिंदगी मांगने आई थी वहा उसको बदनामी और मौत मिली ..परिवार वाले रॉय चिल्लाय लेकिन कुछ नहीं हुआ क्यों ये सब जानते है ..
खास बात ये थी की दिव्या और कविता कांड में की दोनों ही जगह अच्छे माने जाने वाले रिश्तो को बदनाम किया गया लेकिन अपनों का अपनापन न मिल पाने की वजह से कोई जीता तो कोई हारा ...
इसे ही न जाने कितने कांड शीलू अरुशी दिव्या कविता नित्य नए रिश्तो की कमज़ोर होती डोर का शिकार होती है ..लेकिन ये तो शुरुआत है अंत कितना भयावह होगा ॥
ये रिश्ता क्या कहलाता है
रिश्तो की डोर रिश्तो से है कमज़ोर
रिश्ते ही थामे है जीवन की बागडोर
आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है
कभी अपनों को सहलाता कभी है बहलाता
...
कभी हाथ मिलाकर कभी गले लगाकर
कभी हस कर तो कभी रो कर
रिश्ते अपनों की याद दिलाते
आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है ...
फिर क्यों रिश्ते टूटते जाते है
रिश्ते क्यों बदनाम होते जाते है ..
कभी गुरु का शिष्य से कभी पिता का पुत्री से
कभी भगवान का भक्त से कभी इन्सान का इन्सान से
आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है ...


ये रिश्ता क्या कहलाता है

ये रिश्ता क्या कहलाता है




Posted By Ashish TripathiFriday, April 15, 2011

Sunday, April 10, 2011

मुझे रोटी नहीं घास खानी है





मुझे रोटी नहीं घास खानी है
!
मुझे रोटी नहीं घास खानी है ! ये सुनकर शायद आप चौंक गए होंगे लेकिन ये सच है . एक इन्सान एसा भी है जिसे रोटी से ज्यादा अची घास लगती है . जो की नियमित रूप से दिन में 4 से 5 बार ताज़ी घास खाता है . इस व्यक्ति का नाम है गंगा राम उम्र महज़ 35 साल के करीब . काम चमड़ा फैक्टरी मे मजदूर./
जब हमे इस व्यक्ति के बारे में मालूम हुआ तो हमे विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन जब हमने साथ जा कर देखा तो वाकई मे गंगा राम दिन में करीब 250 ग्राम तक घास आराम से खा जाते है /

जब हमने गंगा रा से इस की वजह पूछी तो गंगा राम की आंखे नम हो गई और बोला साहब गरीब की भूख कुछ ऐसी ही होती है . हम बहुत ही गरीब परिवार से थे . बचपन में जब हम स्कूल जाते थे तो माँ अक्सर टिफिन नहीं देती थी कारण घर में खाना ही नहीं होता था /. लेकिन जब आधी छुट्टी के बाद सभी बच्चे खाना खाने बैठे थे तो मैं उन्हे देखा करता था
और भूख और गुस्से से पार्क में लगी घास नोच लेता और दातो से चबाने लगता पहले तो ये एक दो पत्ती तक हो जाया करती थी फिर पता नहीं कब इससे मेरी भूख शांत होने लगी /
कई बार तो मेरे अध्यापक ने भी मारा जब बच्चे शिकायत करते की सर गंगा राम घास खता है / बात घर तक पहुची तो माँ ने भी मारा लेकिन चोरी छुपे मैं घास खाता रहा / और कुछ सालो बाद तो नियमित रूप से सुब शाम और दोपहर को पार्को में जा कर घास खाने लगा /
माता पिता ने कई डॉक्टर को भी दिखाया लेकिन सब कुछ नोर्मल निकला / और और अब तो आदत से बन गई है . /
गंगा राम से हमने जब पुछा की आपको कोई परेशानी तो नहीं हुई , तो गंगाराम का एक ही कहना था परेशानी तो हुई लेकिन .... कोई घोडा कोई गधा तो कोई कुछ कहेता था शादी की उम्र हुई तो पहले ही लोग कह देते थे की लड़का घास खता है आपकी लड़की को भी घास खिलाना सिखा देगा. लेकिन किसी तरह शादी हुई तो कुछ सालो बाद बीवी ही छोड़ कर चली गई/
अब किसी तरह से मेहनत मजदूरी कर के कमा खा रहा हु / गंगाराम दिल से जिन्दा दिल है और उनका नाम गिनिश वर्ल्ड बुक में वेटिंग लिस्ट में है और उनका नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में दर्ज है /

Posted By Ashish TripathiSunday, April 10, 2011