Sunday, March 6, 2011

कहा गई वो सड़क.......?

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कहा गई वो सड़क.......?

सड़के एक ऐसी चीज़ जो घर से निकलते ही मिल जाती है
हमारे सपनो की मंजिल तक ले जाने के लिए.....
या आखिरी वक़्त में समसान घाट या कब्रिस्तानतक ले जाती है वो सड़क.....
बचपन में चलना सिखाती है वो सड़क.......
कभी गिर कर उठना सिखाती है ये सड़क......
कभी पैदल तो कभी गाड़ी पर चलना सिखाती है ये सड़क.......
कभी मौज मस्ती में तो कभी उदास पलो में साथ देती है वो सड़क...कभी बचपन में माँ की उंगलिया पकड़ कर तो
कभी बुढ़ापे में लाठी पकड़ कर चलते है उस सड़क पर ...
लेकिन कहा गई अब वो सड़क ..
जहा से ठंडी सी आहट आती थी ...




कानपुर के इतिहास में न जाने कितनी ही सड़के दफ़न हो चुकी है कुछ सांसे गिन रही है कुछ सड़के लोगो द्वारा कब्जे में ले ली गई है और उनका कोई भी पुरसा हाल नहीं है ... कभी अंग्रेजो द्वारा बनवाई गई सड़के आज भी जीवित है तो कल ही बनी सड़क आज दाम तोडती दिखाई पड़ती है शायद कानपुर के लोग यही सोचते है की अगर सड़क न हो तो शुकून तो रहता है की सड़क ही नहीं है .....लेकिन यहाँ तो ठीक उसी प्रकार का एहसास होता है की "चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात " यानि किसी सड़क पर गड्डे मिलते है और सालो बाद वो सड़क बनती है लेकिन नई सड़क पर चलने का एहसास अभी हुआ ही था की गड्डों से सामना होने लगता है ॥ और फिर से मन दुखी हो जाता है की ये क्या हुआ और सड़क भी मन में यही कहती है की आज ही तो दुल्हन की तरह सजाई गई थी नेता आये थे फीता काटा और सड़क पर लोग चलने और दौडने लगे लेकिन आज फिर से मैं बूढी हो गई हु ...
पाठको आज मैं एक ऐसी ही सड़क के बारे में बताने जा रहा हु जो मौजूदा समय में धूल के गुबार से भरी हुई है लेकिन कभी उसी सड़क पर चलने पर हिन्दुस्तानियों का खून तक बहा दिया जाता था , कभी उस सडक पर चलने पर ठण्ड का एहसास होता था गर्मियों में , लेकिन आज सर्दियों भी वहा धुल और मिटटी के सिवा कुछ भी नहीं बचा है ...
कानपुर की वो सड़क जहा कानपुर का हर निवासी घूमने जरुर जाता है चाहे वो छोटा हो या बड़ा सभी जाते है या फिर दोस्त मजाक में भी कहते है क्योँ कहा गए थे
"माल रोड "

जी हा आज की तारीख में माल रोड पर कोई भी घूमने की सोचता ही नहीं है लेकिन यहाँ पर कभी ऐसा ही था की कोई भी हिन्दुस्तानी घूमने की नहीं सोचता था
क्योँ ?
क्योंकि उस समय अंग्रेजो का राज हुआ करता था और सड़क के दोनों ओर घने
वृक्ष हुआ करते थे यहाँ पर ही लाँज़ , असेम्बली हॉल थियेटर हुआ करते थे , अंग्रेजो के जमाने में इस सड़क को ठंडी सड़क के नाम से भी जाना जाता था कारण था दोनों ओर घने वृक्ष जो हमेशा यहाँ ठंडक का एहसास कराते थे शाम होते ही अँगरेज़ अपनी प्रेमिकाओ बच्चो और पत्नियों के साथ यहाँ पर सैर सपाटे के लिए आया करते थे माल रोड पर ही फूल बाग़ हुआ करता था जहा फूलो की महक हवा को ठंडक के साथ मह्काती भी थी ... देर रात तक यहाँ पर अंग्रेजो का जमावड़ा लगा रहता था .... लेकिन एक बात और थी अगर इस माल रोड पर कोई हिन्दुस्तानी भूले से भी आ जाता था तो उसकी पिटाई तो होती ही थी बेरहमी से, साथ ही उस पर जुर्माना भी लगा दिया जाता था ॥ उस समय ये बात सबको बड़ी ही ख़राब लगा करती थी की हम हिन्दुस्तानी अपनी ही जमीन पर घूम नहीं सकते आखिर क्योँ हम अपने ही वतन में गुलाम है ... लेकिन अगर आज के नज़रिए से देखा जाय तो शायद अँगरेज़ सही ही करते थे मैं अंग्रेजो को सही नहीं ठहरा रहा हु बल्कि आज उस ठंडी सड़क की हालात देख कर ये कह रहा हु ॥
उस समय आप अगर माल रोड से निकल जाय तो आप को एक अजीब स एहसास होता था लेकिन अगर आज आप माल रोड से निकल जाय तब भी एक अजीब स एहसास होगा ॥ एक फूल बाग़ जहा पर हमेशा फूलो की महक हुआ करती थी वहा आज (07/03/2011)की हालात ये है की के इ एम् हॉल के बाहर गोभी के हजारो कटे हुए पत्ते और सड़ी हुई सब्जियों की महक और मैदान में तम्बू कनात फूल बाग़ की असलियत बयान कर रहे है ...
क्या अगर आज हम जब अपने बाबा और दादी से ये बाते जानते है और आश्चर्य होता है लेकिन मुझे नहीं लगता है की आने वाले समय में कोई इस बात पर यकीं कर पायेगा ॥
की माल रोड कभी ठंडी हुआ करती थी या फूल बाग़ में फूल हुआ करते थे ...क्योँ क्योंकि आज की सूरत देख कर यही कहेंगे ......
यार ज्यादा मत छोड़ो ...
जब देश आजाद हुआ और अँगरेज़ यहाँ से गए तो उन्हे इस ठंडी सड़क को छोड़ने का अफ़सोस जरुर हुआ होगा लेकिन आज अगर उनमे से कोई भी एक अँगरेज़ जिन्दा होता तो ये नज़ारा देख कर मर जाता की आज उस ठंडी सड़क की हालात इन हिन्दुस्तानियों ने क्या कर दी ?
आज़ादी के बाद ये सड़क सबकी चहेती बन गए क्योंकि हर कोई अंग्रेजो की तरह ही इस सड़क पर घुमने आने लगा और मौज मस्ती करने लगे जहा ज्यादा लोग होते है वहा बाज़ार भी लगती और माल रोड अंग्रेजो के चंगुल से छुट कर अमीरों और मध्यम वर्गिये परिवारों के लिए पिकनिक स्पोट के रूप में पसंद किया जाने लगा ..यहाँ पर धीरे धीरे शोपिंग काम्प्लेक्स और माल्स बनने लगे जिसका असर ये हुआ घने वृक्ष धीरे धीरे कटने लगे और यहाँ की हरियाली और पेड़ो से आने वाली ठंडक गायब हो गई ...फूल बाग़ में फूल भी गायब हो गए और आज दोनों ही जगह आप दिन क्या रात में भी घुमने की नहीं सोच सकते है ..यहाँ पर वाहनों की रफ़्तार और व्यस्तम ट्राफिक सुबह से ले कर देर रात तक उन पुरानी यादो को मुह चिडाता नज़र आता है ...अब ठंडी सड़क हो या नानाराव पार्क या फिर फूल बाग़ ये सब इतिहास के पन्नो में दर्ज है और कानपुर के इतिहासकार भी कहते है की प्रशासन का सहयोग मिले तो शायद इन पुरानी यादो को ताज़ा किया जा सकता है और उन जगहों पर संकेत या बोर्ड लगाय जा सकते है जिससे की लोगो को अपने शहर की बदली हुई तस्वीर दिखाई पड़ जाय ...

जाने कहा गई वो ठंडी सड़क ( यहाँ पर कुछ लाइने अमरउजाला काम्पैक्ट (21/02/2011) से ली गई है जिसके लिए मैं मैं उनका आभार व्यक्त करता हु )

कहा गई वो सड़क पार्ट २ में कानपुर की एक और सडक का आपको हाल बाटूंगा जहा पर सड़क के नाम पर कुछ है ही नहीं ....जल्द सिर्फ कानपुर की आवाज़ ब्लॉग पर

Posted By Ashish TripathiSunday, March 06, 2011