Tuesday, November 11, 2014

नई राहे

Filled under:



नई राहे

न अमीरों को सताता हु
न गरीबो को रुलाता हु
मैं तो अपनी मंजिल की राहे खुद ही पाता हु
जब निकलता हु यादो की राहों पर
तो बेवफ़ाओ को पाता हु
आँखों ही आँखों में इज़हार हो जाता था
मगर लफ्जों के निकलते ही बेवफ़ा हो जाता था
देखता था जब भी मैं चाँद को
तो मुझको वो हमेशा बेदाग नज़र आता था
लाख नुख्स थे मेरी प्यार की राहों में
पर कमी न थी मेरे चाहने वालो की
जब देखता था चांदनी रात में आसमान को
तो एक नहीं कई चाँद नज़र आते थे
जो मेरी यांदो के सहारे जमीं पर उतर आते थे
लोग लाख वेवफ़ा मुझे कहे
लेकिन हर बार प्यार की नई राहे मैं ही तो ढूंढ पाता हु

Posted By KanpurpatrikaTuesday, November 11, 2014

Saturday, November 1, 2014

इंसाफ

Filled under:



 
इंसाफ 

तुम सच्चे हो मुझे पता है
तुम अच्छे हो मुझे पता है
तुमने कुछ न किया ये सबको पता है
लेकिन चिल्लाने से चीखने से
कोई सुनता नहीं या सुनना नहीं चाहता
कोई गाली और डंडे से
कोई कलम और कोई आवाज़ से
तुम्हे गुनहगार साबित कर देगा
तब तुम क्या करोगे
अगर तुम्हे इंसाफ चाहिए तो
हाथ जोड़ो मत हाथो में कुछ रख लो
सबको सेक लो कुछ की मुट्ठी गरम कर दो
तो कुछ की जेबे गर्म कर दो
फिर तुम मत चीखना मत चिल्लाना
सिर्फ आँखों से देखना की
न जाने कितने कैंडल मार्च निकलेंगे
और न जाने कितने हाथो में तख्तियाँ लिए होंगे
फिर न कोई कलम और ना कोई आवाज़
और न ही किसी के डंडे और अंदाज़
तुम्हे डरा पायेंगे बल्कि
तुम्हे इंसाफ दिलाएंगे /

आशीष त्रिपाठी

Posted By KanpurpatrikaSaturday, November 01, 2014

Monday, October 20, 2014

रे पथिक रुक जा तनिक

Filled under:

पथिक

एक पथिक चाल पड़ा निडर ....

लेकर दृढ़ संकल्प

नहीं पता ले जायेगा किस और

समय का चक्र

सहसा उसकी रहा में आया एक तूफान

भ्रमित हुआ वो पथिक

पथ हुआ अंजान

बदलो की गरज़ना सी आई एक आवाज़

रे पथिक रुक जा तनिक

कर ले तू विश्राम

जानता था वो पथिक ये काल का है पाश

पथिक बोला पथ पर पहुचकर

होगा मेरा विश्राम

रुक गई बदल की गरज़ं

थम गया तूफान

ह्रदय में था पथिक के

एक नया अरमान ....

Posted By KanpurpatrikaMonday, October 20, 2014

Sunday, October 19, 2014

ए ख़त तू बता दे

Filled under:



ए ख़त तू बता दे तुझमे लिखा क्या है 


एक स्याही तू तो बता लिखा तुझसे क्या गया 


लिफाफे जिसको लेकर आया तू बडे इत्मीनान से 


आखिर उस मजमून में ख़ुशी या गम तू ही  बता दे 


लिखा है मेरे प्यार में इत्मीनान से जिसने मोहब्बत 


ऐ कागज़ तुम्हे तो पता ही होगा 


वफ़ा से भरा ख़त है या बेवफ़ाई लिखी उसमे है  


पड़ना आता अगर हमे खतो को 


तो मोहब्बत हम शब्दों से करते !


आशीष त्रिपाठी


Posted By KanpurpatrikaSunday, October 19, 2014

Wednesday, October 15, 2014

मृत्यु तुम क्यों आती हो

Filled under:

मृत्यु तुम क्यों आती हो
सबको क्यों रुलाती हो
जीवन जब आता है
खुशिया ढेरो लाता  है
सबको हँसाता है
यादे बचपन की ताज़ा कर जाता है
लेकिन मृत्यु जब तुम आती हो
दुःख अपार लाती  हो
खुशियों पर अघात लगाती हो
तन मन सब छिन्न भिन्न हो जाता है
मष्तिष्क भी उदास हो जाता है
ईश्वर ही भेजता जीवन तुमको भी
और मृत्यु तुमको भी
फिर इतना अंतर क्यों रखा उस ईश्वर ने
जीवन जो हँसाता  है
मृत्यु क्यों रुलाती है 
जीवन लगता लड़का है
म्रत्यू लगती लड़की है
जो बिदा होती घर से
तो दुःख सबको होता है
जीवन लगता लड़का है
जो लाता घर पर खुशिया है
क्या लड़का इसलिए ही चिराग है
और लड़की बोझ है
इसलिए ही जीवन जवानी है
और बुढ़ापा बोझ है
मृत्यु तुम क्यों आती हो
जीवन की तरह खुशियाँ क्यों नहीं लाती हो / 

Posted By KanpurpatrikaWednesday, October 15, 2014