Showing posts with label रोज बढ़ता हूँ जहाँ से आगे :-Swadesh:. Show all posts
Showing posts with label रोज बढ़ता हूँ जहाँ से आगे :-Swadesh:. Show all posts

Thursday, September 8, 2011

दायरा


दायरा



_____________________

रोज बढ़ता हूँ जहाँ से आगे
फिर वहीँ लौट के आ जाता हूँ
बारहा तोड़ चूका हूँ जिनको
उन्ही दीवारों से टकराता हूँ..
रोज बसते हैं कई शहर नए
रोज धरती में समा जाते हैं .
जलजलों में थी जरा सी गर्मी
वो भी अब रोज ही आ जाते हैं..
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कहीं धुप,न साया, न *सराब
कितने अरमान हैं किस सहरा में
कौन रखता है मजारों का हिसाब
नब्ज बुझती भी, भड़कती भी है
दिल का मामुल है घबराना भी
रात अँधेरे ने अँधेरे से कहा
एक आदत है जिए जाना भी
*कौस एक रंग की होती है *तुलूअ
एक ही चाल भी पैमाने की
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद
शक्ल क्या हो गयी मैखाने की..

Posted By KanpurpatrikaThursday, September 08, 2011