Wednesday, February 11, 2026

राजा रवि वर्मा: कला, विवाद और देवी की तस्वीरों का 'मानवीकरण'

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 राजा रवि वर्मा: कला, विवाद और देवी की तस्वीरों का 'मानवीकरण'



भारतीय इतिहास में 1894 वह वर्ष था, जिसने सनातन धर्म की पूजा पद्धति के स्वरूप को सदा के लिए बदल दिया। इसी वर्ष राजा रवि वर्मा ने मुंबई में अपनी लिथोग्राफिक प्रेस की नींव रखी। लेकिन यह केवल एक तकनीक की शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक ऐसे विवाद का जन्म था जिसने अध्यात्म, कला और नैतिकता के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया।

'साधना' से 'सजावट' तक का सफर

रवि वर्मा से पूर्व, भगवान के विग्रह (मूर्तियाँ) मंदिरों के गर्भगृह की गहराई में होते थे, जहाँ केवल अंधेरा और दीपक की लौ होती थी। वहाँ रूप गौण था और 'ऊर्जा' (Energy) मुख्य थी। रवि वर्मा ने यूरोपीय तैल-चित्रण शैली (Oil Painting) का उपयोग कर देवताओं को 'चेहरा' दिया। उन्होंने पहली बार लक्ष्मी, सरस्वती और सीता को आम इंसान जैसे नैन-नक्श, रेशमी साड़ियाँ और गहने पहनाए।

सुगंधा: वह मॉडल जो 'देवी' बन गई

रवि वर्मा के जीवन का सबसे बड़ा विवाद उनकी मॉडल्स को लेकर रहा। कहा जाता है कि उन्होंने देवी की आकृतियों के लिए उस समय की प्रसिद्ध गणिकाओं और वेश्यांओ को आधार बनाया। इसमें सबसे प्रमुख नाम सुगंधा का आता है।

"एक कलाकार की नज़र में सुंदरता का कोई चरित्र नहीं होता, केवल अनुपात होता है।" - यह तर्क रवि वर्मा के समर्थकों का था।

लेकिन तत्कालीन रूढ़िवादी समाज के लिए यह एक गहरा आघात था। जिस स्त्री को समाज की मुख्यधारा 'अपवित्र' मानती थी, उसी के चेहरे को लोग अपने घरों के पूजा-स्थलों में सजाकर माथा टेक रहे थे। विवाद इतना बढ़ा कि मामला अदालत तक पहुँचा। उन पर 'देवताओं के अपमान' और 'अश्लीलता' के आरोप लगे।

रवि वर्मा की प्रेस से निकलने वाली तस्वीरों ने दो विपरीत काम किए:

1. जो भगवान पहले केवल ऊँची जाति या रईसों के मंदिरों तक सीमित थे, वे अब चंद रुपयों की फोटो के रूप में गरीबों की झोपड़ियों तक पहुँच गए। अध्यात्म अब 'आंतरिक अनुभव' के बजाय 'बाहरी विजुअल' बन गया। भगवान की छवि अब बाज़ार की मांग के अनुसार तय होने लगी।

यदि हम शिवतंत्र के 'अमृत विज्ञान'  के चश्मे से देखें, तो रवि वर्मा का युग चेतना के पतन का युग था।

जब तक देवता 'प्रतीक' (जैसे शिव लिंग) थे, तब तक साधक का ध्यान अपनी रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क के 'अमृत' पर था। जब देवता 'सुंदर स्त्री या पुरुष' के रूप में फोटो में आए, तो साधक की दृष्टि 'कामुकता' और 'मानवीय सौंदर्य' में अटक गई।

पिंगला (सूर्य) और इड़ा (चंद्र) के जिस मिलन को कपाल के भीतर घटित होना था, वह अब केवल कागज के एक रंगीन टुकड़े की पूजा तक सीमित रह गया।

राजा रवि वर्मा ने भारतीय कला को पहचान तो दी, लेकिन उन्होंने 'ईश्वर' को 'इंसान' बना दिया। आज हम जो कैलेंडर आर्ट और फोटो देखते हैं, वे उसी विवादित दौर की देन हैं। उन्होंने ईश्वर को घर-घर पहुँचाया, पर शायद उस 'ईश्वरीय तत्व' को हमसे छीन लिया जो हमारे भीतर था।

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