Monday, May 4, 2020

जब कोरोना काल में भूत हुए क्वॉरेंटाइन

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 जैसा की सर्वविदित है वैश्विक महामारी कोरोना की वजह से सभी प्रकार के कामकाज ठप पड़े हैं कहीं पर भी अगर नजर दौड़ आएंगे तो आवश्यक सेवाओं के अतिरिक्त सब रुका हुआ है। ऐसे में अगर हम शांत मन से 2 माह पीछे की जिंदगी या यूं कहें कि दौड़ती हुई जिंदगी पर नजर डालें तो समझ आएगा हम कहां और किन हालातों और आपाधापी में जिंदगी गुजार रहे थे ।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों और चर्च में हजारों की भीड़ रोजाना दर्शनार्थ जाती थी लेकिन अब सब जगह सन्नाटा है प्रार्थनाएं और पूजा-पाठ तो हो रहा है लेकिन बगैर भीड़ के। ईश्वर सबके साथ है बगैर किसी आडंबर के ।
वहीं अगर आडंबर की बात की जाए और आप सभी भी उस भाग दौड़ भरी जिंदगी पर नजर डालें तो हम देखेंगे कि चौराहों पर कुछ न कुछ पड़ा मिल जाता था। कोई रात के अंधेरे में उतारा करता, नींबू काटता या डालता मिल या दिखाई दे जाता था । कई लोगों पर भूत आते थेऔर  तीन लोगों ने पकड़कर इन बाबाओं के पास ले जाते थे । ताकि झाड़-फूंक के द्वारा उन्हें ठीक किया जा सके। कई घरों में किसी पड़ोसी या अपने रिश्ते दारो द्वारा ही कुछ कराया गया ऐसे भी लोग सभी धर्मों में मिल जाते थे । इन लोग अर्थात भूतों का इलाज ढोंगी तांत्रिक बाबाओ  के पास होता था । कोई बेहोश होता था ,कोई सड़क पर ऐसे ही दौड़ जाता था, किसी को घर के अंदर ही डर लगता था ।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब सब कुछ बंद है तो दुष्ट आत्माओं व भूत भी इस कोरोना संकट  में कहीं ना कहीं क्वॉरेंटाइन हो गए हैं । क्या करोना काल में इन बाबाओं के द्वारा कृतिम भूत भी इन बाबाओं के साथ लॉक डाउन में जहां तहां फस गए हैं।
 व्यापार , नौकरी हो या किसी व्यक्ति पर उन भूतों की छाया अब क्यों नहीं पड़ रही है । जबकि कोरोना काल में सभी प्राकृतिक का खूबसूरत नजरों से आनंद उठा रहे हैं। ऐसे में यह कृतिम भूत क्या सच में क्वॉरेंटाइन हो गए हैं । अब जब जिंदगी ठहर सी गई तो मानना पड़ेगा कि हम सब एक ऐसे काल्पनिक चरित्र में जी रहे थे जिसमें वहां से निकलने का समय हमारे आपके पास था ही नहीं।
 ऐसे ही अगर हम झोलाछाप डॉक्टर से लेकर प्राइवेट क्लीनिक नर्सिंग होम पर ही नजर डालें और देखें कि इन सब जगह पर गंभीर और सामान्य बीमार लोगों की भीड़ रहा करती थी और इन की मेहरबानी से ही वहां भीड़ पैथोलॉजी सेंटर पर भी पहुंच जाया करती थी। अगर हड्डी टूटने के केस छोड़ दें तो वह सामान्य  और गंभीर बीमार मरीज उतनी संख्या में झोलाछाप डॉक्टर से लेकर प्राइवेट क्लीनिक में नहीं दिख रहे हैं ,कारण क्या है इसका ।
 हम अवसाद व बीमार थे टेंशन या भागदौड़ भरी जिंदगी और काम पटेंशन  से बीमार थे या फिर बाहर का खानपान की वजह से हम बीमार हो रहे थे। यह सोचने वाली बात है इस विषय पर भी हम सभी को एक बड़ा चिंतन करने की जरूरत है ,कि आखिर एक छींक, सिर दर्द, खांसी और ऐसी छोटी-छोटी बीमारियों जिसे अभी हम नजरअंदाज कर रहे हैं और शारीरिक व्यायाम के द्वारा ठीक भी कर ले रहे हैं ।
उन बीमारियों पर हम रोजाना कितना पैसा ऐसे ही खर्च कर देते थे । क्या हम सब अब वह खर्च बचा सकते हैं।
 जैसे हम सभी अभी घर में रहकर ही बाहर के खाने का स्वाद घर में बने खाने से ले रहे हैं और हमारी आदत थी चौराहे पर जाकर ठेले पर पानी के बताशे और पिज्जा बर्गर का आर्डर कर ही पेट भरता था।
और चाह कर भी  हम वह अपनी आदत नहीं छोड़ पा रहे थे। यह जानते हुए की वह खाना भी उतना अच्छा नहीं है फिर भी क्या कारण था।
 यह भी इन दिनों में हमें सोचना होगा पान मसाला हो या फिर शराब या अन्य नशे की वस्तुएं।  हम उन पर भी बेतहाशा पैसा बर्बाद कर रहे थे ।वलेकिन एक ही बहाना था क्या करें छूटता ही नहीं।  दिनभर जी तोड़ मेहनत करने के बाद हम उस मेहनत के पैसों को अपने परिवार की जरूरतों पर कम और नशे में कहीं ना कहीं ज्यादा खर्च कर देते थे ।बेशक अभी इन वस्तुओं पर रोक है हम अनजाने डर से घर पर ही हैं ।कोशिश जरूर नशा करने वाले कर रहे हैं ।लेकिन  इन्हें कोरोना के डर ने रोक रखा है। तो क्या हम आगे भी अपने जीवन को इस नशे की लत से दूर करके अपने परिवार के लिए एक बेहतर भविष्य की कल्पना कर पाएंगे।
 बेशक हम सभी के अंदर एक इच्छाशक्ति की कमी थी। लेकिन इस कोरोना महामारी ने हमें एक मौका दिया । जो सालों साल शायद किसी को नहीं मिलता, लेकिन कहीं ना कहीं हम अपने को सौभाग्यशाली माने कि हम इस युग और इस भारतवर्ष में है जहां स्वस्थ भी हैं और सुरक्षित भी है, ताकि हम अपने आने वाले कल को और बेहतर मुकाम दे सकें ।
स्वस्थ रहें सुरक्षित रहें

Posted By KanpurpatrikaMonday, May 04, 2020

सच्ची घटना : स्वार्थ और निस्वार्थ सेवा की

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हम सभी अपने जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक एक स्वार्थी चरित्र को अपने  साथ लेकर चलते हैं कि जैसे ही एक बच्चा बच्चा बड़ा होता है और जैसे ही जीवन जीने की समझ उसमे आती है वह स्वार्थी चरित्र उसे घेर लेता है ऐसा नहीं कि वह ऐसा करता है लेकिन हमारे समाज में ज्यादातर लोग ऐसा ही करते हैं और जैसा सब करते हैं वैसा मनुष्य चरित्र है तो हम भी करते है । अपने आसपास जैसा देखते हैं वैसा देश काल और परिस्थिति के अनुसार करने लगते हैं।

मौजूदा समय प्रकृति द्वारा दिया गया एक ऐसा समय है जो हमें दोबारा न मिले अपने जीवन में शायद ।
जहां हम अपने आसपास की घटनाओं को जैसे घटित हुए देख रहे हैं वह शायद हमने कभी सोचा भी हो।
 
कोरोना वारियर्स  जिन्हें मालूम है कि कोरोना संक्रमित  व्यक्ति द्वारा संक्रमण उन्हें भी हो सकता है बावजूद इसके वह अपने फ़र्ज़ पर डटे हैं फिर चाहे वह डॉक्टर हो पुलिस हो यह फिर सफाई कर्मी ।सभी अपने फर्ज पर लगातार डटे हुए हैं।  यह कार्य जो ये सब कर रहे है यह सालो से कर भी रहे थे लेकिन खास बात यह है कि जब लॉक डाउन में सभी अपने घरों में सुरक्षित रहने के लिए बाध्य  है वहीं कोरोना वारियर्स फ्रंट लाइन पर डटे हुए हैं ।
जिसके लिए उन्हें अतिरिक्त कुछ और नहीं मिलना है ऐसे में इनका सम्मान कर हौसला बढ़ाना इनके लिए सच्चा और श्रेष्ठ पुरस्कार होगा । जिसको देश के प्रत्येक नागरिक को उनका सम्मान और हौसला बढ़ाना चाहिए और ऐसा लोग कर भी रहे हैं ।तीनों सेनाओं द्वारा भी कोरोना वारियर्स का हौसला बढ़ाया गया ।
 मनुष्य अपने वर्तमान समय में अगर यह सब देखे तो कहीं ना कहीं देश के प्रधान सेवक से लेकर अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति निस्वार्थ भाव से देश के सच्चे नागरिक की भूमिका निभा रहा है । लेकिन हमेशा से ही अपवाद शब्द ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा और ऐसे संकटकाल में भी वह अपवाद स्वरूप कुछ लोग स्वार्थ साध रहे हैं ।  कुछ लोग जो रोज खाने कमाने वाले  कुछ रुपयों के साथ लॉक डाउन में गुजर-बसर करना चाह रहे थे।कुछ लोग कम दामो की वस्तुवों को महंगे दामो में बेचकर  अपना  स्वार्थ सिद्ध करके देश में आये संकट को एक त्योहार समझ कर लोगो को लूटने में लगे थे। 
यही मनुष्य का स्वार्थ है जिससे वह अपने जीवन में घटने वाली अचानक घटनाओं को निमंत्रण देता रहता है ।
सेठ साहूकारों ही सिर्फ इस स्वार्थ वाली पंक्ति में अकेले नही खड़े थे बल्कि नीचे तबके के लोग भी इस संकट की घड़ी में अपना अपना स्वार्थ  ढूंढ रहे थे।
 देश में आए इस संकट काल में कई समाजसेवी संस्थाओं ने भी अपने स्तर पर सहयोग किया और और गरीब लोगों के लिए खाने का इंतजाम किया ताकि कोई भी व्यक्ति भूखा ना रहे बल्कि सुरक्षित रहें स्वस्थ रहें ।
सरकार  ने भी अपने स्तर पर लोगों को राहत दी मुफ्त राशन से लेकर पैसे और पका हुआ भोजन वितरण करके सहयोग किया।
यहां पर भी अपवाद स्वरू वह स्वार्थी जनता जरूरत न होने पर भी खाने और सरकारी मदद के लिए पुरजोर कोशिश करने में लगी हुई थी ।
 देने वाला तो निस्वार्थ भाव से ही दे रहा था लेकिन लेने वाला जरूरत ना होते हुए भी स्वार्थ वस खड़ा हुआ था उस लाइन में । 
 सवाल यह उठता है कि ऐसे लोग जो उस लाइन में नहीं लग सकते  है लेकिन भूखे थे या वह लोग जो भूखे थे और उसी लाइन में खड़े थे लेकिन उनका नंबर अंत में आता था और जब तक उनका नंबर आता भोजन खत्म हो चुका होता था ।
क्या वह लोग जो जरूरत ना होते हुए भी स्वार्थ व दूसरों का हक मार रहे थे सही थे । नही जब देश या राज्य पर संकट आये तो अपने अनुसार लोगो की मदद करनी चाहिये ना कि  सवार्थी बनकर संकट काल में भी ऐसा करना चाहिए ।।

 एक व्यक्ति बच्चे के रोने पर उसके लिए बिस्कुट व अन्य सामान लेने के लिए दुकान पर जाता है उस दुकान पर ही दूसरा व्यक्ति  भी पहुचता है जिसे जरूरत नही भी थी फिर भी । तीसरा व्यक्ति दुकानदार होता है।
 यहीं पर स्वार्थ और निःस्वार्थ  दोनों तरह के लोग और तीसरा जरूरतमंद तीनों खड़े हुए हैं । जिसको जरूरत है वह बच्चे को भूख शांत कराने के लिए बिस्कुट का पैकेट लेने के लिए आता है लेकिन उसके पहले ही दूसरा व्यक्ति जरूरत ना होने पर भी बिस्कुट लेने के लिए आता है और दुकानदार से बिस्कुट के लिए कहता है दुकानदार के हां में जवाब देने पर जितने भी  बिस्कुट उसके पास हो देने के लिए कहता है ।
  यह बात सुनकर वह पिता जो अपने बच्चे भूख शांत करने के लिए बिस्कुट लेने के लिए आया था वह यही सोच रहा था क्या अभी मैं बिस्कुट नहीं ले पाऊंगा मेरा बच्चा  रोता रहेगा। लेकिन तभी दुकानदार के यह कहकर उसके परेशानी और बढ़ा दी थी एक ही पैकेट मेरे पास है और वह गैर जरूरत वाला व्यक्ति लेकर चला जाता है ।
वह व्यक्ति जो बच्चे के रोने पर बिस्कुट का पैकेट लेने के लिए आया था जाने लगता है तभी दुकानदार उसको रोक कर उससे भी बिस्कुट का पैकेट देने लगता है उस पर उस पिता ने पूछा कि अभी तो आपने एक होने की बात कही थी इस पर दुकानदार ने कहा मुझे तो बेचना ही है और बेचकर उतना ही पैसा मिलेगा चाहे वह 10 पैकेट एक व्यक्ति दे दूं या 10 अलग अलग व्यंक्तियो को। इससे अच्छा है 10 लोगो को देकर सबकी जरूरत पूरी की जाए न कि बेवजह खरीददारी करने वाले लोगो की ।

 आगे दुकानदार ने कहा मेरे पास पर्याप्त मात्रा में है और थोक बाजार में भी सब कुछ पर्याप्त मात्रा में है फिर भी कुछ लोग  स्वार्थ वस अपने घर में एकत्र कर रहे हैं क्यों उनको यह बात खुद भी नहीं पता । लेकिन वह यह काम कर रहे हैं।  यह वही लोग हैं जो दूसरों का हक मारने के लिए सड़कों पर टहल रहे हैं । इस सच्ची घटना के द्वारा हम यह कह सकते हैं कि यह सब घटनाएं हमारे आसपास भी घटित हो रही हैं लेकिन हम क्या कर रहे हैं स्वार्थ वस चुप है या निःस्वार्थी बनकर मदद कर रहे है ।
कहानी  छोटी है लेकिन सीख बड़ी है कि अगर ऐसा संकट देश पर आएगा तो एक सच्चा नागरिक अपना स्वार्थ देखेगा या देश के साथ खड़े होकर देश हित में कदम उठाएगा ।
 देश भी आपका समय भी आपका सोचे आप देश के लिए आपका वर्तमान समय मे क्या करते है ताकि भविष्य के लिए लोगो को क्या संदेश और सीख देते है । आप पर ही निर्भर करता है ।
जय हिंद

Posted By KanpurpatrikaMonday, May 04, 2020

Monday, April 27, 2020

ईश्वर का एक गुप्त संदेश डिकोड

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ईश्वर का एक गुप्त संदेश डिकोड
 वर्तमान में पूरा विश्व जिस प्रकार से कोरोना महामारी के चलते ठहर सा गया है उसे कहीं नहीं प्रकृति या ईश्वर द्वारा दिए गए गुप्त संदेश को समझना होगा । वर्तमान के लिए भी यह संदेश उतना ही जरूरी है जितना भविष्य के लिए। 
जिस प्रकार किसी शहर में मंत्री मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री अथवा विशिष्ट जनों के आने पर उस रास्ते की सड़के नई बना दी जाती हैं क्षेत्र या उस रोड पर सफाई व्यवस्था ऐसी कर दी जाती उससे पहले और बाद में भी वैसा नहीं दिखाई देता। बनावटी हरियाली तक सब कुछ विशिष्ट अतिथि के लिए आगमन के लिए किया जाता है । जो कहीं ना कहीं क्षणिक होने के साथ ही बनावटी और दिखावे में किया गया प्रयास होता है  ।
ऐसा ही गंगा नदी का निरीक्षण करने आने वाले दल के आने की सूचना से पहले ही गंगा को पहले से भी निर्मल दिखा दिया जाता है ।लेकिन वास्तव में यह सब इसलिए होता है कि हम सब मिलकर किसी और को नहीं बल्कि अपने आप को ही धोखा देते हैं।
 ऐसा ही एक आम इंसान भी करता है ।किसी विशिष्ट व्यक्ति आने से पहले वह भी अपने घर को सुसज्जित एवं साफ-सुथरा करके अपने को बेहतर बताने की कोशिश  करता है।
  वर्तमान में प्रकृति द्वारा किया गया यह सुन्दरीकरण कोई दिखावा न होकर एक संदेश है ,जो किसी विशिष्ट अतिथि के आने के लिए किया गया है ।यह वास्तविकता है इंसान द्वारा नहीं अपितु उस ईश्वर द्वारा किया गया कार्य है । जिससे सभी को घरों में रहने के लिए कहा गया, सड़के सूनी है । प्रदूषण पहले की तुलना में बगैर किसी मानव निर्मित प्रयासों के अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है । गंगा भी निर्मल व स्वच्छ है ।वह भी किसी मानव निर्मित संयंत्र के द्वारा नहीं बल्कि प्रकृति ने अपने आपको खुद सवांरा है।
 मौसम भी नित्य नई करवट लेकर कुछ संदेश दे रहा है । क्या है यह संदेश हम सबको इस विषय पर बहुत ही गहराई से सोचने की जरूरत है ।
 विकसित और विकासशील देशों की अंधी दौड़ ने पर्यावरण संरक्षण को दरकिनार करके अपने को बेहतर बताया और अपने ऐशो आराम की वस्तुओं से सिर्फ पर्यावरण को ही नुकसान पहुंचाया ।
अमेरिका जो आज कोरोना महामारी से त्राहिमाम कर रहा है ।लेकिन इसी अमेरिका ने 2012 में पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए किए गए करार को इसलिए तोड़ दिया था कि उसकी जीवनशैली और व्यापारिक हित कहीं ज्यादा बड़े हैं ,पर्यावरण संरक्षण से। लेकिन आज अमेरिका की हालत सभी देख रहे हैं ।
 ऑस्ट्रेलिया रूस जापान कनाडा जैसे देश भी इसी राह पर चलते हुए पर्यावरण संरक्षण को दरकिनार करते हुए चल पड़े थे । कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में आकड़ो के अनुसार  अमेरिका की बात की जाए तो वह सबसे आगे खड़ा दिखाई देता है । वहां पर व्यक्ति 17.3 टन कार्बन डाइऑक्साइड प्रति वर्ष वातावरण में छोड़ी जाती है।विकासशील से विकसित हो रहे थे उस समय उनके द्वारा किये गए पर्यवारण का दुर्व्यवहार सभी को भूल जाना चाहिए ऐसा इन विकसित देशों का कहना था । इन विकसित देशों ने तरक्की के लिए पर्यावरण को औंधे मुँह कुचला था ।लेकिन अब इस महामारी पर यह देश सोचने की भी शक्ति खो चुके है। लेकिन प्रकृति अपने ऊपर किये गए किसी भी प्रकार के अत्याचारों को कभी नही भूलती।
  वक्त बेवक्त ओलावृष्टि तूफान भूकंप केदारनाथ कश्मीर में प्राकृतिक आपदाएं संदेश देने के लिए काफी थी । लेकिन विकास का भूत हमे सोचने ही नही दे रहा था ।
यह विकसित और विकासशील देश पर्यावरण की परवाह ही नहीं करते थे ।इन्हें तो दो वक्त की रोटी, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य स्वास्थ्य सेवाएं को अहम मान रहे थे। पपर्यावरण जब कुछ करेगा तब उस संबंध में कुछ किया जाएगा। ऐसा इन देशो  कहना था ।इनकी पहली पहली प्राथमिकता पर्यावरण संरक्षण नही कुछ और था।
 चीन और कोरोना को समझना उतना ही जरूरी है जितना अन्य देशों द्वारा चीन से अपनी जीवनशैली के लिए उत्पादों को प्राथमिकता देना ।जिसका नतीज़ा चीन में लगातार प्रदूषण बढ़ रहा था और पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई उपाय या ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे थे । आधुनिक से अत्याधुनिक बनने की होड़ और उन देशों के लिए उत्पादन करना । उसी चीन से ही कोरोना जैसे वायरस का उत्पादन हुआ और सभी देश इससे संक्रमित हैं। हम सबने जो दिया वापस भी तो हमें वही मिल रहा है इसमें भूल किसकी है और आरोप-प्रत्यारोप किस पर ।
हवा को सांस लेने लायक बनाने के तमाम प्रयास कहीं ना कहीं धराशाई हो रहे थे । पर्यावरण संरक्षण गोष्ठियों और सेमिनार  तक ही सीमित रह गया था ।इसमें रेडिएशन जैसी महामारी से पहले अनुमान के मुताबिक जल संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम अभी से दुनिया में नहीं उठाए गए तो यह संभव हो कि 2050 तक जल संकट जैसी स्थितियां पैदा होते देर न लगेगी।

Posted By KanpurpatrikaMonday, April 27, 2020

Sunday, April 26, 2020

प्लाज़्मा थेरैपी में अग्रणी रहा है भारत

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भारत कोरोना महामारी से कम संसाधनों और बेहतर चिक्तिस्य सुविधाएं न होने पर भी विश्व के अन्य देशों के मुकाबले काफी हद तक इस महामारी को काबू करने में सफल है और यही विश्वास भी किया जा सकता है कि जल्द ही भारत प्लाज़्मा थेरैपी या वैक्सीन के जरिये इस बीमारी को समुलतः नष्ट करने में सफल हो जाएगा क्योंकि

इतिहास में कई महामारीओं को भारत अपनी जीवनशैली या चिकित्सक प्रणाली से परास्त कर चुका है ऐसा ही एक गर्व करने योग्य किस्सा है सन 1710 में इंग्लैंड के डॉक्टर ऑलिवर नामक एक अंग्रेज चिकित्सक भारत आया और बंगाल में घूमा उसके बाद अपनी डायरी में उसने लिखा मैंने भारत आकर पहली बार देखा कि चेचक जैसी महामारी को भारतवासी कितनी आसानी से ठीक कर लेते हैं ।
चेचक तब यूरोप में महामारी थी और इससे लाखों यूरोप वासी मारे जा चुके थे डॉक्टर अलीगढ़ ने आगे लिखा यहां लोग चेचक के टीके लगाते हैं जो एक सुई से लगाया जाता है 3 दिन तक व्यक्ति को बुखार आता है जिसे ठीक करने के लिए पानी की पट्टियां सिर पर रखी जाती हैं फिर व्यक्ति ठीक हो जाता है एक बार जिसने टीका लगवा लिया वही जिंदगी भर चेचक से मुक्त रहता है ।
डॉक्टर अलीगढ़ ने भारत से लंदन पहुँच कर वहां डाक्टरों के डॉक्टरों की सभा बुलाई और भारत में चेचक के टीके की बात बताई वहां के दिग्गज डॉक्टरों को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ तब डॉक्टर ऑलिवर ने सभी दलों को अपने खर्च पर भारत लाए। 
 यहां चेचक का टीका लगाते लोगों को दिखाया । डॉक्टर ने भारतीय वैद्यो से पूछा कि इस टीके में क्या है। वैद्यो ने बताया कि जो लोग चेचक के रोगी होते हैं हम उनके शरीर का थोड़ा सा पस निकाल कर सुई की नोक के बराबर पस स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करा देते हैं इससे उस व्यक्ति का शरीर  इस की रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता धारण कर लेता है

 यह पश्चिमी देशों के डॉक्टर्स के लिए एकदम नई बात थी। डॉ. ऑलिवर ने डायरी में आगे लिखा- 'जब मैंने वैद्यों से पूछा
कि आपको यह सब किसने सिखाया? तब वे बोले कि हमारे गुरू ने, उन्हें उनके गुरू ने और उनके गुरू को उनके भी गुरू ने। अर्थात मेरे अनुसार कम से कम डेढ़ हजार (1500) वर्षों से ये टीका भारत में लगाया जा रहा है।' अंत में डॉ. ऑलिवर
ने लिखां- हमें भारत के वैद्यों का अभिनंदन करना चाहिए कि वे नि:शुल्क रूप से घर-घर जाकर लोगों को टीका-लगा रहे हैं।' किंतु आपको यह जानकर आश्चर्य और क्षोभ होगा कि आज दुनिया एडवर्ड जेनर (सन्‌ 1749-1823) नामक अंग्रेज चिकित्सक को चेचक के टीके का जनक मानती है।


 

Posted By KanpurpatrikaSunday, April 26, 2020

Wednesday, April 22, 2020

#सौंदर्य #पिशाच #एक #कहानी #कलयुग #की भाग दो

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पता नहीं क्यों हम जो सोचते थे जिसकी कल्पना कर रहे थे वह सब धोखा था और वह धोखा हम सभी अपने आप को ही दे रहे थे । लेकिन जब धोखे से पर्दा उठ गया तो हम सब यह सोचने पर मजबूर हो गए कि क्या वास्तव में हम एक ऐसे धोखे या दिखावटी जीवन में जी रहे थे जिससे बाहर निकलने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।
 लेकिन आज एक झटके में हमारी आंखों के सामने ही सारा की सारा नजारा ही बदल गया ।कहीं ना कहीं हम अपनी दिनचर्या को बदलना ही नहीं चाहते थे ।लाख समझाने के बाद भी हम सभी तरह-तरह के बहाने बनाकर अपने आप को श्रेष्ठ साबित कर देते थे ।
खुद जानते थे कि हम कर सकते हैं लेकिन हम ऐसा करेंगे ।नहीं जहां दिन हो या फिर रात में भी जिंदगी चलती नजर आती थी वहां पर किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि जिंदगी यो रुक जाएगी।
 जो अपने अपने काम के बीच की काम के बोझ के नीचे दबे जा रहे थे और नहीं आ पाते अपनो के बुलाने पर आज उन्ही को अब 800 किलोमीटर का सफर भी छोटा सा लग रहा है ।गरीब रिक्शेवाले के चंद कदम पहले उतार देने पर वो साहब पैसो के साथ दो चार बातें भी मुफ्त में दे दिया करते थे आज वही पैदल चलते नज़र आते है।
 सुबह का नाश्ता दोपहर खाना देर रात तक मौज मस्ती  सुबह की सैर  महंगे शौक यह सब बस एक काल्पनिक चरित्र जो हमे घेरे हुए था।
अपनो के लिए समय ही नहीं था मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में अरदास प्रार्थना सभा का नियम ना टूटे भले ही अपनों का दिल टूट जाए । लेकिन हम श्रेष्ठ बताना कभी नहीं छोड़ते थे ।
अपना एक सीमित दायरा बना लेना। ब्रांडेड कपड़े मॉल्स में घूमना फिरना बाहर का खाना यह ही तो हमारी दिन चर्या में शामिल था।जो इसमें शामिल नही था वह पिछड़ा था।
 यही तो दिनचर्या थी हम सबकी जिसके बगैर जीवन शायद था ही नहीं ।
जिन कामों को हम बखूबी कर सकते थे नहीं करते थे कारण एक काल्पनिक चरित्र हमें ऐसा करने ही नहीं दे रहा था।
क्या कभी हम सभी ने कल्पना की थी कि आधे से ज्यादा दुनिया यूं रुक जाएगी। विकसित और विकासशील देश अच्छे से अच्छे इलाज के लिए दूसरे देशों में जाना या अपने ही देश में बड़े शहरों में जाना । बेहतर इलाज करवाना लेकिन क्या हुआ एक ही झटके में सब विकसित और अत्याधुनिक सुविधाओं का दम्भ भरने वाले लोग आज हाथ खड़े करने पर मजबूर है।

 माना कि यह महामारी है महामारी कैसे आई कहां से आई क्यों आई, ऐसा सवाल जरूर है लेकिन यह बीमारि या महामारी ने हमारी अंधी दौड़ और काल्पनिक चरित्र को सुनसान सड़कों पर अकेला ही छोड़ दिया है ।
क्या हम सब एक गांव से बेहतर एक शहर और एक छोटे शहर से बेहतर 1 बड़े शहर और उससे भी बेहतर पश्चिमी देशों को मानते थे कि वह ज्यादा समझदार है ,लेकिन हुआ क्या हमारा यह धोखा भी टूट गया आंखों में बंधी पट्टी हट गई ।
आज हम सभी एक लाइन में खड़े होकर और ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि सब ठीक हो जाए ।
अगर इस वायरस को इंसान ने बनाया तो क्या उसका इलाज इंसान के पास नही हैं। जवाब होगा कि नहीं है उस ईश्वर की शक्ति के बगैर कुछ भी नहीं हो सकता ।इसलिए इंतजार कीजिए रुकिए और सोचिये कि क्या वास्तव में जो जीवन हम जी रहे थे वो बेहतर था या फिर यह जीवन है जो अभी हम जी रहे है ।
साल 2020 वास्तव में इतिहास बनेगा अगले 100 सालों के लिए। आज जो जीवित हैं ऐसा भयानक और विकराल समय शायद वह दोबारा न देख पाएंगे। जहा समय चल रहा है और ज़िन्दगी रुकी हुई है। या मानव रुका हुआ है और जिंदगी चल रही है।

इस मौजूदा विकराल समय से निकलना मुश्किल लगता है और अगर हम इससे बाहर निकल जाएंगे तो भी हमारी जीवन के उस काल्पनिक चरित्र को हम स्वीकार ना कर पाए।
 क्योंकि नया काल्पनिक चरित्र धीरे-धीरे तैयार हो रहा है हैम सबके लिए।
और जैसे ही हम इस महामारी से बाहर निकलेंगे और राहत महसूस करेंगे ।
 अपने जीवन को बदला हुआ पाएंगे मंदिर मस्जिद व अन्य धार्मिक स्थलों पर भीड़ कम हो जाएगी मृत्यु और जन्म के समय होने वाले आयोजनों में आने वाले लोगों की संख्या भी कम हो जाएगी । स्कूल कॉलेज या फिर कोचिंग में लगने वाली भीड़ कम हो जाएगी । हम बाहर का खाना खाना कम कर देंगे ।हम सोचने लगेंगे की जीवन बदल जाएगा ,लेकिन सच तो यह है कि हम नहीं बदलने वाले हैं क्योंकि यह काल्पनिक रूप सौंदर्य पिशाच ननये रूप में आकर  हमें ऐसा नहीं करने देगा ।क्योंकि  हम सब जो देख रहे हैं जो सोच रहे थे क्या बाजारों में रौनक खत्म हो जाएगी धार्मिक आयोजन बंद हो जाएंगे नहीं होने वाला है। हमारी रुकी हुई ज़िन्दगी फिर उसी पैसे और इज़्ज़त कमाने की अंधी दौड़ में शामिल हो जाएगी।
इधर हम धीरे धीरे  एक और धोखे में हम जी रहे हैं जो धोखा है  हमें धोखा देगा।
 लॉक डाउन के चलते सभी अपने घरों से कम और बच्चों के पढ़ाई का कार्य सब कुछ मोबाइल और इंटरनेट  पर निर्भर हो गया है ।
क्या हम जैसी कर कर पाएंगे कि  आगे आने वाले समय पर मोबाइल और इंटरनेट पर हमें हमसे दूर कर देगा और हम बिना मोबाइल इंटरनेट के जीवन यापन करने के शायद ऐसा सोचना भी अभी गलत होगा लेकिन यह सच है कि ऐसा होने वाला है ।
आने वाले 100 सालों में या 100 सालों के अंदर ही मोबाइल रेडिएशन एक ऐसा खतरा बन जाएगा जो हमें मोबाइल और इंटरनेट से दूर कर देगा।
और हम सभी अकेले अकेले ऐसे जहां पर रहने को मजबूर हो जाएंगे जहां पर मोबाइल रेडिएशन का खतरा या किसी प्रकार का कोई सी रेडिएशन का खतरा हम तक न पहुंच पाए अपने संदेशों पहुंचाने के लिए हम टेलीपैथी जैसी विधि का इस्तेमाल करेंगे।
क्योंकि अगर वर्तमान समय की बात करे तो देश विदेश में प्रदूषण को दूर करने के लिए कई अत्याधुनिक तकनीक और कड़े नियम बनाये गए ।लेकि नतीजा सिफर रहा।
 लेकिन अभी जब हम सभी अपने घरों में कैद है तओ वायु प्रदूषण के कम होने से  कम होने से पेड़ पौधों में चमक वापस आ गई है वहीं ध्वनि प्रदूषण कम होने से पशु पक्षी आकाश में स्वच्छंद विचरण करते दिखाई पड़ रहे हैं ।
कई ऐसी बातें सच हो गई जिसकी कल्पना मात्र करने से लोग डर जाते थे। बेशक कामकाज और अर्थ व्यवस्था पर फर्क पड़ा है और आगे भी ऐसे ही हालातों में हमें जीना पड़ेगा।
लिखने अगर हम  वर्तमान से सबक नहीं लेंगे तो भविष्य में मोबाइल रेडिएशन या ऐसे ही किसी अन्य महामारी से में 2- 4 जरूर होना पड़ेगा।
 वर्तमान समय में दुनिया रुकी है और इस चलते हुए वक्त में और ठहरी हुई दुनिया में हम सब एक पल के लिए अगर भविष्य के लिए एक सुंदर कल्पना करना चाहे तो सिर्फ एक ही सूत्र होगा कि उस ईश्वर की या प्रकृति से अगर हमने खेलना बंद नहीं किया तो पपरिणाम इस से भी भयानक होंगे। फिर चाहे पहाड़ों को नष्ट करने हो, पेड़ पौधों को काटना हो ,नकली खानपान का व्यापार, नदी गंगा जी और समुद्र में अपने फायदे के लिए खेल खेलना ,बेजुबान जीवो की हत्या करना।अगर हमने यह सब बंद नही किया तो  प्रकृति संतुलन बनाने के लिए हर वह प्रयास करके जो उसके बेजुबान संतानों के लिए बेहतर होगा यह एक अच्छा समय है जब प्रकृति हमें रोक कर सोचने और समझने का मौका दे रही है तो प्रकृति अपने इन बेजुबान संतानों की रक्षा के लिए प्रकृति हर वो कदम उठाएगी जो उसके लिए बेहतर होगा। प्रकृति के दिए इस वर्तमान संदेश को हम समझे और अपने बेहतर भविष्य को सुरक्षित करने में लग जाएं।
पंडित आशीष सी त्रिपाठी।

Posted By KanpurpatrikaWednesday, April 22, 2020