Wednesday, April 15, 2020

#सौंदर्य #पिशाच #एक #कहानी #कलयुग #की

#सौंदर्य #पिशाच #एक #कहानी #कलयुग #की 
आज हम जिस युग में जी रहे हैं वह 21वीं शताब्दी है लेकिन जो युग है वह कलयुग है ।कलयुग के विषय में हमारे धर्म ग्रंथो में अनेक बातें लिखी गई हैं ।जो निरंतर प्रत्येक 10 साल के अंतर पर हमें कलयुग का आभास करा भी देती है। और यह  सौंदर्य पिशाच इन प्रत्येक 10 सालों में और ताकतवर होता जा रहा है । वर्तमान में  या यूं कहें कि 70 साल पहले जो पिशाच छोटा था आज 70 साल में पहले से विशाल हो गया है । लेकिन हम सब इस सौंदर्य पिशाच  से अनजान है और यह सौंदर्य पिशाच समय के साथ में धीरे-धीरे हमे खत्म करता जा रहा है। हमारे पुराणों में उल्लेख किया जाता है इस कलयुग के अंतिम समय में एक व्यक्ति औसत आयु 20 वर्ष के करीब होगी और महिलाएं 12 से 15 वर्ष की आयु में मां भी बन जाएंगे। बच्चे एक साल में बोलना और स्कूल जाना सीख जाएंगे। शायद आप इन सब बातों पर यकीन न करे ।लेकिन सौंदर्य पिशाच के कई साक्ष्य सबूत हमें टेलर रूप में आज भी दिखाई पड़  जाते हैं। वर्तमान युग में वर्तमान से भूतकाल अर्थात करीब 200 साल के पुराने इतिहास को देखें तो बहुत कुछ बदल चुका है ।खान-पान से लेकर रहन-सहन बोलचाल संस्कार और संस्कृति सभी कुछ बदल चुका है । अगर से हम मनुष्य की औसत आयु की बात करें तो वर्तमान की तुलना में भूतकाल से करें तो खुद ही पता चल जाएगा। जहां आज के इंसान की औसत आयु 60 वर्ष है पहले यह औसत आयु 100 वर्ष या उससे भी अधिक हुआ करती थी ।बच्चे जहां 5 वर्ष 5 माह के बाद ही स्कूली शिक्षा लेते थे आज 2 वर्ष मे स्कूल जाने लगते है । बोलना बैठना और ऐसी कई चीजें 1 वर्ष के अंतराल में ही सीख जाते हैं अर्थात  कलयुग के अंत में औसत आयु जो धर्म ग्रंथो  में जो उल्लेखित है 20 वर्ष होगी जो अभी 60 वर्ष है तो यह संभव हो सकता है बच्चे स्कूल जाना 6 माह या 1 वर्ष में जाएगा तो 5 माह 5 वर्ष से आज 2 वर्ष हो गया यानी यह संभव हो जाएगा तो कलयुग आने का यह कलयुग का संभावित वर्णन लिखा हुआ है वह कहीं नहीं ट्रेलर के रूप  में आज हमारे सामने आ ही जाता है। कलयुग के अंत में लिखी गई है बात सच होती दिखती है जैसे    लड़के और लड़कियां जहां 10 वर्ष की आयु के बाद समझदार होते थे और सामाजिक गतिविधियां सीखते थे आज उस उम्र में  या उससे पहले कई ऐसी चीजें सीख जाते हैं जो सामाजिक रूप से कतई ठीक नहीं होती लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सब संभव कैसे हो पा रहा है।  यह यह संभव हो पा रहा है उस पिशाच के द्वारा जो धीरे-धीरे विशाल होता जा रहा है और हमें आगोश में लेता जा रहा है । जो दिन प्रतिदिन बड़ा होता जा रहा है और नष्ट कर रहा है हमारे विचारों को संस्कृती को और धरोहरों को प्रेम को ।हम चाह कर भी उसका मुकाबला नहीं कर पा रहे और ना ही कर सकते हैं ।ऐसे दिन पर दिन हमें अपने जाल में वह सौंदर्य पिशाच फांसता जा  रहा है और हम फंसते जा रहे हैं  आंखें बंद करके हम जैसे जानते ही नहीं है और जानना भी नहीं चाहते हैं क्योंकि यह से सौंदर्य पिशाच ने हमें ऐसा बना दिया है कि हम कुछ सोच भी नहीं सकते। माता-पिता का दिमाग ऐसा कर दिया है कि वह अपने बच्चों से प्यार कम और नफरत ज्यादा करने लगते हैं और अपने बच्चों को नफरत ईश्वर के प्रति सोच और गुस्से से लबरेज कर रहे हैं। कौन है यह सौंदर्य पिशाच और क्या हम सब जानते हैं इस बारे में नहीं आप में से कोई नहीं जानता इस सौंदर्य पिशाच को। क्योंकि सौंदर्य पिशाच पहले यह एक की संख्या में हुआ करते थे आज है परमाणु बम की तरह अनेक संख्या में हमारे बराबर और हमसे बड़े होकर कहीं ना कहीं हमारे साथ घुल मिल चुके हैं ।एक व्यक्ति में एक से अधिक दो या तीन सौंदर्य पिशाच निवास करते हैं समय-समय पर यह अपना रूप भी बदल कर सामने आ जाते हैं ।लेकिन हम चाह कर भी वह सौंदर्य पिशाच को नहीं देख पाते हैं ।आगे हम बताएंगे कैसे उस सौंदर्य पिशाच से बचा जा सकता है और कैसे हम अपनी संस्कृति संस्कार और धरोहरों को बचा सकते हैं ।

Posted By KanpurpatrikaWednesday, April 15, 2020

Friday, March 27, 2020

क्या है जम्बूद्वीप का भौगोलिक रहस्य ?

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क्या है जम्बूद्वीप का भौगोलिक रहस्य ?
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क्या ये किसी स्थान के भूगोल के बारे बताता है ?
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''सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन। 
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥ 
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः। 
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥ 
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।
- वेदव्यास, भीष्म पर्व, महाभारत 

हिन्दी अर्थ : हे कुरुनन्दन! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भांति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों में पिप्पल और दो अंशों में महान शश (खरगोश) दिखाई देता है। 

अर्थात : दो अंशों में पिप्पल का अर्थ पीपल के दो पत्तों और दो अंशों में शश अर्थात खरगोश की आकृति के समान दिखाई देता है। आप कागज पर पीपल के दो पत्तों और दो खरगोश की आकृति बनाइए और फिर उसे उल्टा करके देखिए, आपको धरती का मानचित्र दिखाई देखा। यह श्लोक ५ हजार वर्ष पूर्व लिखा गया था। इसका मतलब लोगों ने चंद्रमा पर जाकर इस धरती को देखा होगा तभी वह बताने में सक्षम हुआ होगा कि ऊपर से समुद्र को छोड़कर धरती कहां-कहां नजर आती है और किस तरह की!

हिन्दू पूजा में कई बार ऐसे पंक्तियों को सुनने मौका मिलता है जिसका अर्थ कहीं न कहीं पृथ्वी के भूगोल के ज्ञान से जुड़ा होता है। जैसे एक उदाहरण है- कई बार मन्त्रों के उच्चारण के पहले संकल्प के समय पंडित एक पंक्ति को बार बार बोलते हैं जैसे जम्बूद्वीपे, आर्यावर्ते, भारतखंडे, (रांची ये दूसरे सम्बंधित शहर) नगरे, फिर उसके बाद नक्षत्र और गोत्र का नाम आता है। जब भी मुंडन, विवाह आदि मंगल कार्यों में मंत्र पड़े जाते हैं, तो उसमें संकल्प की शुरुआत में इसका जिक्र आता है:

।।जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….अमुक...।।

इस पंक्ति में मनुष्य के रहने के स्थान तथा उसके बारे में जानकारी दी जाती है जो पूजा करा रहा है। आखिर ये पंक्ति क्या दर्शाती है? क्या ये किसी स्थान के भूगोल के बारे बताता है ? बार बार जम्बूद्वीप का उच्चारण होता है आखिर ये जम्बूद्वीप का रहस्य क्या है? वैसे एक द्वीप का भी वर्णन होता है जिसका नाम है शाकद्वीप। जम्बूद्वीप और क्षार समुन्द्र के बाद शाकद्वीप है , जिसका विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। उसके बाद उस से दुगुना बड़ा पुष्कर द्वीप है ।
 
आखिर  जम्बूद्वीप तथा आर्यावर्त में कौन कौन से देश आते हैं इसका वर्णन निम्न है-
जम्बूदीप -- सम्पूर्ण एशिया।
आर्यावर्त -- पारस (इरान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप, थाईलैंड, मलेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, लाओस तक।
भारत वर्ष-- अफगानिस्तान , पाकिस्तान, भारत, नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप।
 
कुछ शोधों के अनुसार जम्बूद्वीप एक पौराणिक महाद्वीप है। इस महाद्वीप में अनेक देश हैं। भारतवर्ष इसी महाद्वीप का एक देश है।

पुराणों के अनुसार धरती पर सात द्वीप  जिनके बीच समुद्र हैं तथा हर अगले द्वीप का आकार अपने पिछले का दुगुना है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जम्बूद्वीप उन सात महाद्वीपो में से एक है और यहां साधारण मानवों का वास है। सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे काई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।
 
मत्स्यमहापुराण में जम्बूद्वीप का विस्तार से भौगोलिक वर्णन है।  इसमें सूतजी से पुछा जाता है की पृथ्वी पर कितने द्वीप हैं ? कितने समुद्र और पर्वत है ? कौन कौन  सी नदियां बहती हैं इत्यादि ? सूतजी कहते हैं की द्वीपों के तो हज़ारों भेद हैं , परन्तु वे सभी सात प्रधान महाद्वीपों के अंतर्गत हैं। पुराणों में सात द्वीपों (जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप तथा पुष्करद्वीप) का वर्णन है । वैसे आज के आधुनिक भू विज्ञान में पृथ्वी पर सात महाद्वीपों का वर्णन है - सात महाद्वीपों में शामिल हैं अफ्रीका, अंटार्कटिका, आस्ट्रेलिया, एशिया, यूरोप , उत्तर अमेरिका और दक्षिण अमेरिका है। शायद वो जम्बूद्वीप को आज के "युरेशिया" से जोड़ रहे थे। युरेशिया में यूरोप और एशिया दोनों शामिल हैं। 
 
इस पुराण के अनुसार यह अनेकों प्रकार के सुन्दर देशों एवं नगरों से परिपूर्ण है। यह सभी प्रकार की धातुओं से सयुंक्त एवं शीलासमूहों से समन्वित पर्वतों द्वारा सुशोभित है।  इसमें पूर्व और पश्चिम - दोनों ओर के समुद्रों तक फैला हुआ हिमवान(हिमालय) नामक पर्वत है, जो सदा बर्फ से ढका रहता है।  
 
जम्बू द्वीप से छोटा है भारतवर्ष। भारतवर्ष में ही आर्यावर्त स्थित था।बहुत से लोग भारतवर्ष को ही आर्यावर्त मानते हैं जबकि यह भारत का एक हिस्सा मात्र था। वेदों में उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा गया है। आर्यावर्त का अर्थ आर्यों का निवास स्थान। आर्यभूमि का विस्तार काबुल की कुंभा नदी से भारत की गंगा नदी तक था। आज न जम्बू द्वीप है न भारतवर्ष और न आर्यावर्त। आज सिर्फ हिंदुस्तान है ।

धरती के सात द्वीप : पुराणों और वेदों के अनुसार धरती के सात द्वीप थे- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। 

'जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:, 
भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंपुरुषं स्मृतम्‌, 
हरिवर्षं तथैवान्यन्‌मेरोर्दक्षिणतो द्विज। 
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्‌, 
उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा। 
नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्‌, 
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:। 
भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे। 
एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव: जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।
- (विष्णु पुराण)

जम्बू द्वीप के ९ खंड थे : इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इनमें भारतवर्ष ही मृत्युलोक है, शेष देवलोक हैं। इसके चतुर्दिक लवण सागर है। इस संपूर्ण नौ खंड में इसराइल से चीन और रूस से भारतवर्ष का क्षेत्र आता है। 

जम्बू द्वीप में प्रमुख रूप से ६ पर्वत थे : हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत और श्रृंगवान।
(श्रोत-नीतीश प्रियदर्शी)

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आकाश में सृष्टि के ५ पर्व हैं-१०० अरब ब्रह्माण्डों का स्वयम्भू मण्डल, १०० अरब तारों का हमारा ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल, चन्द्रमण्डल (चन्द्रकक्षा का गोल) तथा पृथ्वी। किन्तु लोक ७ हैं-भू (पृथ्वी), भुवः (नेपचून तक के ग्रह) स्वः (सौरमण्डल १५७ कोटि व्यास, अर्थात् पृथ्वी व्यास को ३० बार २ गुणा करने पर), महः (आकाशगंगा की सर्पिल भुजा में सूर्य के चतुर्दिक् भुजा की मोटाई के बराबर गोला जिसके १००० तारों को शेषनाग का १००० सिर कहते हैं), जनः (ब्रह्माण्ड), तपः लोक (दृश्य जगत्) तथा अनन्त सत्य लोक। 

इसी के अनुरूप पृथ्वी पर भी ७ तल तथा ७ लोक हैं। उत्तरी गोलार्द्ध का नक्शा (नक्षत्र देख कर बनता है, अतः नक्शा) ४ भागों में बनता था। इसके ४ रंगों को मेरु के ४ पार्श्वों का रंग कहा गया है। ९०-९० अंश देशान्तर के विषुव वृत्त से ध्रुव तक के ४ खण्डों में मुख्य है भारत, पश्चिम में केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व, तथा विपरीत दिशा में उत्तर कुरु। इनको पुराणों में भूपद्म के ४ पटल कहा गया है। 

ब्रह्मा के काल (२९१०२ ई.पू.) में इनके ४ नगर परस्पर ९० अंश देशान्तर दूरी पर थे-पूर्व भारत में इन्द्र की अमरावती, पश्चिम में यम की संयमनी (यमन, अम्मान, सना), पूर्व में वरुण की सुखा तथा विपरीत में चन्द्र की विभावरी। वैवस्वत मनु काल के सन्दर्भ नगर थे, शून्य अंश पर लंका (लंका नष्ट होने पर उसी देशान्तर रेखा पर उज्जैन), पश्चिम में रोमकपत्तन, पूर्व में यमकोटिपत्तन तथा विपरीत दिशा में सिद्धपुर। 

दक्षिणी गोलार्द्ध में भी इन खण्डों के ठीक दक्षिण ४ भाग थे। अतः पृथ्वी अष्ट-दल कमल थी, अर्थात् ८ समतल नक्शे में पूरी पृथ्वी का मानचित्र होता था। गोल पृथ्वी का समतल नक्शा बनाने पर ध्रुव दिशा में आकार बढ़ता जाता है और ठीक ध्रुव पर अनन्त हो जायेगा। उत्तरी ध्रुव जल भाग में है (आर्यभट आदि) अतः वहां कोई समस्या नहीं है। पर दक्षिणी ध्रुव में २ भूखण्ड हैं-जोड़ा होने के कारण इसे यमल या यम भूमि भी कहते हैं और यम को दक्षिण दिशा का स्वामी कहा गया है। इसका ८ भाग के नक्शे में अनन्त आकार हो जायेगा अतः इसे अनन्त द्वीप (अण्टार्कटिका) कहते थे। ८ नक्शों से बचे भाग के कारण यह शेष है।

विष्णु पुराण (२/८)-मानसोत्तर शैलस्य पूर्वतो वासवी पुरी।
दक्षिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वारुणस्य च। उत्तरेण च सोमस्य तासां नामानि मे शृणु॥८॥
वस्वौकसारा शक्रस्य याम्या संयमनी तथा। पुरी सुखा जलेशस्य सोमस्य च विभावरी।९।
शक्रादीनां पुरे तिष्ठन्स्पृशत्येष पुर त्रयम्। विकोणौ द्वौ विकोणस्थस्त्रीन् कोणान् द्वे पुरे तथा।॥१६॥
उदितो वर्द्धमानाभिरामध्याह्नात्तपन् रविः। ततः परं ह्रसन्ती भिर्गोभिरस्तं नियच्छति॥१७॥
एवं पुष्कर मध्येन यदा याति दिवाकरः। त्रिंशद्भागं तु मेदिन्याः तदा मौहूर्तिकी गतिः।२६॥
सूर्यो द्वादशभिः शैघ्र्यान् मुहूर्तैर्दक्षिणायने। त्रयोदशार्द्धमृक्षाणामह्ना तु चरति द्विज।
मुहूर्तैस्तावद् ऋक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्॥३४॥
सूर्य सिद्धान्त (१२/३८-४२)-भू-वृत्त-पादे पूर्वस्यां यमकोटीति विश्रुता। भद्राश्व वर्षे नगरी स्वर्ण प्राकार तोरणा॥३८॥
याम्यायां भारते वर्षे लङ्का तद्वन् महापुरी। पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकाख्या प्रकीर्तिता॥३९॥
उदक् सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रकीर्तिता (४०) भू-वृत्त-पाद विवरास्ताश्चान्योऽन्यं प्रतिष्ठिता (४१)
तासामुपरिगो याति विषुवस्थो दिवाकरः। नतासु विषुवच्छाया नाक्षस्योन्नतिरिष्यते॥४२॥

भारत भाग में आकाश के ७ लोकों की तरह ७ लोक थे। बाकी ७ खण्ड ७ तल थे-अतल, सुतल, वितल, तलातल, महातल, पाताल, रसातल। अतल = भारत के पश्चिम उत्तर गोल। तलातल = अतल के तल या दक्षिण में।
सुतल = भारत के पूर्व, उत्तर में। वितल = सुतल के दक्षिण।
पाताल = सुतल के पूर्व, भारत के विपरीत, उत्तर गोल। रसातल = पाताल के दक्षिण (उत्तर और दक्षिण अमेरिका मुख्यतः)
महातल = भारत के दक्षिण, कुमारिका खण्ड समुद्र।

विष्णु पुराण (२/५)-दशसाहस्रमेकैकं पातालं मुनिसत्तम। 
अतलं वितलं चैव नितलं च गभस्तिमत्। महाख्यं सुतलं चाग्र्यं पातालं चापि सप्तमम्॥२॥
शुक्लकृष्णाख्याः पीताः शर्कराः शैल काञ्चनाः। भूमयो यत्र मैत्रेय वरप्रासादमण्डिताः॥३॥
पातालानामधश्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः। शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्यदानवाः॥१३॥
योऽनन्तः पठ्यते सिद्धैर्देवो देवर्षि पूजितः। स सहस्रशिरा व्यक्तस्वस्तिकामलभूषणः॥१४॥
नीलवासा मदोत्सिक्तः श्वेतहारोपशोभितः। साभ्रगङ्गाप्रवाहोऽसौ कैलासाद्रिरिवापरः॥१७॥
कल्पान्ते यस्य वक्त्रेभ्यो विषानलशिखोज्ज्वलः। सङ्कर्षणात्मको रुद्रो निष्क्रामयात्ति जगत्त्रयम्॥१९॥
यस्यैषा सकला पृथ्वी फणामणिशिखारुणा। आस्ते कुसुममालेव कस्तद्वीर्यं वदिष्यति॥२२॥
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२०)-परस्परैः सोपचिता भूमिश्चैव निबोधत॥९॥ 
स्थितिरेषा तु विख्याता सप्तमेऽस्मिन् रसातले। दशयोजन साहस्रमेकं भौमं रसातलम्॥१०॥
प्रथमः तत्वलं नाम सुतलं तु ततः परम्॥११॥ 
ततस्तलातलं विद्यादतलं बहुविस्तृतम्। ततोऽर्वाक् च तलं नाम परतश्च रसातलम्॥१२॥
एतेषमप्यधो भागे पातालं सप्तमं स्मृतम्।
भागवत पुराण (५/२४/७)- उपवर्णितं भूमेर्यथा संनिवेशावस्थानं अवनेरत्यधस्तात् सप्त भूविवरा एकैकशो योजनायुतान्तरेणायामं विस्तारेणोपक्लृप्ता-अतलं वितलं सुतलं तलातलं महातलं रसातलं पातालमिति॥७॥
भागवत पुराण (५/२५)-अस्य मूलदेशे त्रिंशद् योजन सहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी 
समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृ दृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्ष्यते॥१॥
यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षाणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥
वास्तविक भूखण्डों के हिसाब से ७ द्वीप थे-जम्बू (एसिया), शक (अंग द्वीप, आस्ट्रेलिया), कुश (उत्तर अफ्रीका), शाल्मलि (विषुव के दक्षिण अफ्रीका), प्लक्ष (यूरोप), क्रौञ्च (उत्तर अमेरिका), पुष्कर (दक्षिण अमेरिका)। इनके विभाजक ७ समुद्र हैं।
(श्रोत- शास्त्रीय विद्वान अरुण उपाध्याय जी)

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                                 -निखिलेश मिश्रा

Posted By KanpurpatrikaFriday, March 27, 2020

Thursday, February 27, 2020

दहेज़ लोभियों के अंगारों को

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दहेज़ लोभियों के अंगारों को   
मैने बेटी के सपनो का महल बना लिया था
उसकी खुशियों के चार चाँद ले लिए थे
जब वो जाएगी मेरी दहलीज़ छोड़ कर
फिर कब मिलेगी किस मोड़ पर
डर लगता था तब
जब छोटी सी चोट लग जाती थी तुमको
अब सोच कर भी डर जाता हूँ
दहेज़ के नित्य नए किस्से सुनकर
क्यों लालच बढ़ रहा है दहेज़ के शैतानो का
पड़ लिख कर क्यों रूप रख रहे हो हैवानो का
तुम्हारी भी तो बहन या बेटी होगी
 तुम्हे तनिक भी एहसास नहीं उनके दर्द का 
सोच लो ईश्वर ने दे दिया तुम्हे सब कुछ उस दिन
जब एक पिता रोता है एक बेटी के बिन
वह लक्ष्मी भी है सरस्वती भी होगी
अबला बन तुम्हारे अपराध सहती होगी है
चुप थी ,न की वो डरी थी
रोई भी थी, सोई भी न थी
पिता के प्यार में
एक तरफ दर्द सही थी
पता था उसको
पिता टूट जायेगा बेटी के दुखो से
जानकर तुम्हारे बाजारू अरमानो को
मैं देख न सकती थी उसके हालातों को
इसलिए चुन लिए
दहेज़ लोभियों के अंगारों को
WRITTEN BY : ASHISH C TRIPATHI 

Posted By KanpurpatrikaThursday, February 27, 2020

Sunday, December 8, 2019

राजनीति का खेल जारी है .........

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राजनीति का खेल जारी है ....

देश में दिनों दिन बढ़ती बलात्कार की घटनाओं ने आम आदमी से लेकर संसद तक, दुकान से लेकर मानव अधिकार का बाजा बजाने वाले, ऑर्डर-ऑर्डर से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता तक, जनता से लेकर नेता तक, सब चीख रहे हैं। ऐसा लगता है यह देश नहीं किसी सब्जी मंडी का दृश्य है।
भंडारे में चढ़ी सब्जी और तेल में खोलती पूडिया को देख कर लोग उतावले हो रहे हैं और शोर मचाकर सभी भंडारे में बट रही खोलती पूडिया लेना चाहते हैं और बांटने वाले शांत हैं पुख्ता इंतजाम होने का दावा कर रहे हैं। खैर यहाँ पर खाओ पियो और मौज करो, कम पड़े तो और लो, की कहावत चरितार्थ कर हो रही है।
सुनने और बोलने में मैं भी शर्मिंदा हूँ। लेकिन क्या करूं राजनीति का खेल देखकर हैरान हूँ। जैसे क्रिकेट में बैटिंग करने वाले को 11 खिलाड़ी घेर लेते हैं। कभी ग़लत निर्णय भी अम्पायर के द्वारा हो जाते है। छक्का मारने वाला भी आउट होता है। यही राजनीति में भी होता है। सत्ताधारी कोई भी विपक्षी ही धरने पर बैठता है। सरकार को घेरेगा, मीडिया को घेरेगा, सजा, मुआवजा और गिरफ्तारी की मांग करेगा। लेकिन इससे होगा क्या नेता जी आप की दुकान थोड़ी  और अच्छी चल जाएगी बस इसलिए. घिन आती है ऐसी राजनीती पर!
क्या थोड़े दिन चिल्लायेंगे अखबारों मीडिया में सुर्खिया बनेगे और फिर ऐ-सी रूम में बैठकर आराम फरमाएंगे साहब है न।
रैलियों में भीड़ इकठ्ठा करके अपने विकास और अपने आन्दोलन का ढिंढोरा पीटेंगे। बजाओ ताली जनता। चलो फिर कुछ नया करते है ...
सत्ताधारी कोई हो, सरकार किसी की हो चिंता हमेशा विपक्ष को ही होती है। अरे नेता जी अगर चिंता जनता की है तो उन बहू बेटियों को जब जलाया गया, तब उस जलती आग में राजनीतिक रोटियाँ सेकने आ गए आप। कभी अपनी भी आग जलाइये नेता जी फिर राजनीति करिए, फिर देखे जनता भी मौज करेगी। तकलीफ आपको भी होगी नेता जी|
जिसकी चीख निकल रही थी। जब वह रो रही थी। जिसके दामन पर कोई हाथ डाल रहा था। जब वह न्याय के लिए दर-दर भटक रही थी, तो आप क्या कर रहे थे नेताजी, पेपर तो पढ़ते ही होंगे टी वी भी देखते होंगे, सोशल मीडिया में उसके फरियाद के वीडियो भी देखे होंगे। तब शांत क्यों थे, क्या आपको उसके जलने जलाने का मुहूर्त निकलवा रहे थे। मौका तलाश रहे थे रोटियाँ सेकने के लिए साहब। मुआवजा तो जनता भी दे देगी। लेकिन आप क्या करोगे। जब वह फरियादी दर-दर भटकता है। तो पक्ष में हो या विपक्ष में नेताजी मुह घुमा लेते है। समाज ठेकेदार भीड़ तभी इक्कठा करेंगे जब मामला गर्म होता है क्योंकि रोटी तभी सिकती है जब तवा गर्म होगा। ना जाने कितनी जल चुकी है और न जाने कितनी जलने और जलाने पर विवश होगी। जनता और विपक्ष कानून को सख्त कर दो के नारे तो लगाता है पर लेकिनचौराहे पर हेलमेट न लगाने पर नेता जी को फ़ोन भी तो हम ही करते है। अभी राजनीति का खेल जारी है अफसोस की फ़िल्म अभी बाकी है।
पंडित आशीष त्रिपाठी
लेखक व ज्योतिषाचार्य

Posted By KanpurpatrikaSunday, December 08, 2019

रक्त सम्बन्ध और मृत आत्माए भाग 4 ....

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रक्त सम्बन्ध और मृत आत्माए  भाग 4  ....


लेकिन मेरे मन के हवन कुण्ड में आत्माओ से सम्बंधित प्रश्न अभी भी प्रज्वलित थे |रात के अधेरे रूपी धुवें के आगोश में वो समां नहीं रहे थे| और मेरे कई प्रश्न  मुझे परेशां कर रहे थे| की सच में यह संभवं है क्या | सच में आत्माए किसी के शरीर में प्रवेश कर जाती है| एक शरीर में एक आत्मा के होते हुए भी दूसरी आत्मा कैसे प्रवेश कर सकती है|  फिर कोई घर का सदस्य मृत्यु के बाद किसी को क्यों परेशान करेगा| जिनके साथ रह रहा हो ,प्यार किया हो, वो अचानक मरने के बाद कैसे किसी को परेशान करेगा| यह सोचते ही मुझे किसी के कमरे में होने का एहसास होता है | मैं कुछ डरा हुआ सा था मेरी आंखे कमरे के चारो कोने में किसी के होने के उस आभास को बराबर अपने नजरो से देखना चाह रही थी| लेकिन उसका आभास मात्र था, की जैसे कोई कमरे में प्रवेश किया हो लेकिन नज़र कोई नहीं आ रहा था| तभी अचानक मेरी अलमारी से किताबें अचानक गिर पड़ती है और मैं अचम्भे से चौक जाता हूँ |अभी यह डर ख़त्म भी नहीं हुआ था की अचानक से कमरे में लगी खिड़कियाँ भी खुल जाती है | मेरा डर लगातार बढता जा रहा था| मेर्री नज़रे दीवारों की हर जगह बार बार घुमती हुई उस अद्रश्य आत्मा को dhundh ढूंड रही थी की वो कब कहा पर क्या कर दे| उसके होने और न होने के बीच का अंतर मैं समझ नहीं पा रहा था| मेरी धड़कन लगातार बढती जा रही थी | तभी मेरी चादर को कोई धीरे धीरे खीच रहा था| ऐसा मुझे लगा और मैं चादर अपनी और खीच रहा था | मैं चादर को पूरी ताकत से अपनी ओर खीचने  का प्रयास कर रहा था| लेकिन कोई था जो मुझे से भी ज्यादा बलशाली था| और वो चादर खीच लेता है और मेरे चेहरे पर अचानक से ही किसी ने पानी डाल  दिया और मैं डर के साथ हडबडा कर उठ गया था ,सामने मेरी माँ खड़ी थी | और मेरी दिल की धड़कन तेज़ थी और मैं अभी भी उस आत्मा के होने का एहसास कर पा रहा था| मेरा शरीर पूरी तरह से पसीने और फेक गए पानी से भीग चूका था| तभी माँ ने पूछा रोनित तू इतना हाफ क्यों रहा था, क्या हुआ तुझे| मैं अभी भी शांत था |और यह नहीं समझ पा रहा था की मैं सपने में था या फिर जाग्रत अवस्था में मुझे यह एहसास हो चूका था की मैं रात में सोचते सोचते पता नहीं कब सपनो की रहस्यमई दुनिया में खो कर सो चूका था ,पता ही नहीं चला | तभी मेरी माँ ने मुझे जोर से हिलाते ही कहा  ,कहाँ सोच रहा है सुबह के १२ बज चुके है ,तू अभी तक सो ही रहा है | तेरे दादा जी और पापा जी कब का ऑफिस जा चुके है| जल्द से उठ जा और चाय पी ले| मैं अब नहा धोकर पूरी तरह तैयार हो चूका था | चुपचाप उस नींद या जागते हुए सपने के रहस्य के बारे में सोच रहा था और लगातार मेरी सोच उस सपने या हकीकत के अंतर का पता लगाने में जूझ  रहा था | और मैं उस उधेड़ बुन में बाज़ार जा कर रहस्य आत्माओ को ज्यादा जानने के लिए बाज़ार से कुछ किताबे भी ले आया| इन सब बातों में पता  नहीं कब ढलते सूर्य को अंधेर ने अपने आगोश में ले लिया था और मैं उस रात का फिर से इंतज़ार करने लगा ....
अगले अंक में पड़े  की उस आत्मा और उस घर को बेचने के पीछे क्या रहस्य था और क्या रोनित की उन आत्माओ के रहस्य के बारे में जान पता है की नहीं  |
किजिए मेरी अगली पोस्ट का इंतज़ार .......🙏🙏🙏






Posted By KanpurpatrikaSunday, December 08, 2019