Thursday, November 10, 2016

घर में मातम लेकिन नाचना जरुरी है

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घर में मातम लेकिन नाचना जरुरी है 



जो नाच गाने का काम करते है अगर उनके घर में मातम हो भी जाय तो क्या उन्होंने जिसके यहाँ नाचने के पैसे लिए है उसके यहाँ तो नाचने जायंगे ही न !
शायद समझ में नहीं आया की हम ये बात क्यों कर रहे है दरअसल बात यह है की वर्ष 2007  में मेरे एक पत्रकार मित्र लखनऊ में थे और रात में 12 के आस पास अपने फ्लैट की बालकनी में बैठे कुछ कर रहे थे तभी देश के दो प्रतिष्ठित समाचार चैनल के दो पत्रकार जो उसी फ्लैट में रहते थे अपनी इन्नोवा कार से रुके और अपनी कार से ड्राइवर की मदद से बोरी उतरवाने लगे दो बोरी उतर ही पाई थी की तीसरी बोरी फस गई और बोरी फट गई और उससे 1000 की गाद्दिया गिर पड़ी |
क्या ये पैसे सैलरी के थे या ये खबर दबाने के थे या किसी की दलाली के !
आज इनकी मजबूरी है की इन्हें खबर तो दिखानी है काले धन की लेकिन कई पत्रकार बंधुओ के पास भी काला धन है लेकिन अपने घर में मातम है लेकिन मजबूरी है की खबर दिखाय या अपने पैसो को कैसे सफ़ेद करे |
देश में कई पत्रकार है जिनका करोड़ो रुपया काले धन से राख हो गया है |  

Posted By KanpurpatrikaThursday, November 10, 2016

Sunday, November 6, 2016

हाय तौबा :- चैनल के प्रसारण पर रोक ,डाक्टर ने मरने की डेट निश्चित कर दी है !

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चैनल के प्रसारण पर रोक लोगो का एक दिनी शोक डाक्टर ने मरने की डेट निश्चित कर दी है !

चैनल के एक दिन के प्रसारण पर रोक पर इतनी हाय तौबा शोक मनाया जा रहा है ज्यादातर पत्रकार और प्रेस क्लब एक साथ दंभ भर रहे है की सरकार का निर्णय गलत है !
क्या इससे पहले किसी चैनल के प्रसारण पर रोक नहीं लगी
अगर नहीं लगी तो इससे पहले सर्जिकल स्ट्राइक भी नहीं हुई थी !
इतना शोर क्यों मचा रहे हो इससे किसी की रोज़ी रोटी नहीं रुक जाएगी न ही किसी के घर में कोई भूखा सो जायेगा न ही किसी का बेटा भाई या बहन पिता बेरोजगार नहीं हो जायेंगे |
क्यों इतना रोना पीटना मचाय हो क्या कोई मर गया है या डाक्टर ने मरने की डेट निश्चित कर दी है !
शोर मचाना है तो तब मचाया करो जब आपके पत्रकार भाई सड़क पर आ जाते है उनको सेलरी नहीं मिलती उनको बिना बताय नौकरी से निकाल दिया जाता है कई महिला कर्मचारियों का शोषण होता है |
तब आप पत्रकार भाई और प्रेस क्लब वाले कोई मीटिंग क्यों नहीं करते तब आप सब एक साथ आवाज़ क्यों नहीं उठाते है |
आखिर आप लोग की परेशानी क्या है की कही सरकार एक एक करके आप लोगो के काले कारनामे या यु कहे छुट्टा बैल या भैस के नकेल कसने का ये सिर्फ एक दिवसीय कार्यक्रम है जो आप लोगो के अन्दर डर पैदा कर रहा है अगर हम एक न हुए तो सभी के नकेल पड़ जाएगी और जो हम कही भी किसी भी सरकारी अधिकारी को प्रेस का रौब दिखा कर डरा धमका देते है अपनी इज्ज़त बना लेते है ! ये सब बंद हो जायेगा प्रेस लिखी गाड़ी कही से  भी निकल जाएगी कोई भी फ्री में खाने को दे देगा |
शायद सच्चाई यही है डर सबको लगता है जब डर होता है अर्थात वह पर साहस ख़त्म हो चूका होता है |
कोई अपने दिल पर न ले ये सिर्फ उनके लिए है जो गलत करते है | जो ईमानदार है उन्हे ईमानदारी पेश करने की जरुरत नहीं पड़ती उनको सभी जानते है चिल्लाते वही है जिनकी सुनी नहीं जाती |
न्याय के लिए न्यायालय है सरकार ने अगर गलत किया है तो आप अदालत जाए अपनी बात रखे अदालत को सरकार को भी डांट लगाती है और कार्यवाही करती है |

इनके साथ कौन है :-



एनडीटीवी इंडिया के बाद सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के बाद सरकार ने 'न्यूज टाइम असम' चैनल को एक दिन के लिए और केयर वर्ल्ड चैनल को 7 दिन के लिए बंद रखने का आदेश दिया है। असम के भी एक समाचार चैनल को एक दिन के लिए प्रसारण बंद करने का आदेश दिया है। समिति ने महसूस किया कि चैनल ने एक से अधिक बार 'प्रोग्रामिंग दिशा-निर्देशों' का उल्लंघन किया। चैनल के खिलाफ आरोपों में से एक आरोप है कि उसने एक कार्यक्रम का प्रसारण किया जिसने एक नाबालिग लड़की की पहचान का खुलासा किया, जिसे घरेलू सेवक के तौर पर काम करने के दौरान बर्बर यातना दी गई थी।

चैनल द्वारा प्रसारित दृश्यों में बच्ची की निजता और गरिमा से समझौता किए जाने की बात महसूस करते हुए चैनल को अक्तूबर 2013 में एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। वहीं केयर वर्ल्ड चैनल को सात दिन के लिए बैन किया गया है। आरोप है कि इस चैनल ने आपत्तिजनक कार्यक्रम दिखाया था।

Posted By KanpurpatrikaSunday, November 06, 2016

Friday, October 14, 2016

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Posted By KanpurpatrikaFriday, October 14, 2016

सात का साथ पपीते के पत्ते एक फायदे अनेक

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डेंगू का उपचार: आजकल डेंगू एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरा है, पुरे भारत में ये बड़ी तेजी से बढ़ता ही जा रहा है जिससे कई लोगों की जान जा रही है l
यह एक ऐसा वायरल रोग है जिसका माडर्न मेडिकल चिकित्सा पद्धति में कोई इलाज नहीं है परन्तु आयुर्वेद में इसका इलाज है और वो इतना सरल और सस्ता है कि उसे कोई भी कर सकता है l
तीव्र ज्वर, सर में तेज़ दर्द, आँखों के पीछे दर्द होना, उल्टियाँ लगना, त्वचा का सुखना तथा खून के प्लेटलेट की मात्रा का तेज़ी से कम होना डेंगू के कुछ लक्षण हैं जिनका यदि समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी की मृत्यु भी सकती है l
यदि आपके आस-पास किसी को यह रोग हुआ हो और खून में प्लेटलेट की संख्या कम होती जा रही हो तो चित्र में दिखाई गयी चार चीज़ें रोगी को दें :
१) अनार जूस
२) गेहूं घास रस
३) पपीते के पत्तों का रस
४) गिलोय/अमृता/अमरबेल सत्व
अनार जूस तथा गेहूं घास रस नया खून बनाने तथा रोगी की रोग से लड़ने की शक्ति प्रदान करने के लिए है, अनार जूस आसानी से उपलब्ध है यदि गेहूं घास रस ना मिले तो रोगी को सेब का रस भी दिया जा सकता है l
- पपीते के पत्तों का रस सबसे महत्वपूर्ण है, पपीते का पेड़ आसानी से मिल जाता है उसकी ताज़ी पत्तियों का रस निकाल कर मरीज़ को दिन में २ से ३ बार दें , एक दिन की खुराक के बाद ही प्लेटलेट की संख्या बढ़ने लगेगी l
- गिलोय की बेल का सत्व मरीज़ को दिन में २-३ बार दें, इससे खून में प्लेटलेट की संख्या बढती है, रोग से लड़ने की शक्ति बढती है तथा कई रोगों का नाश होता है l यदि गिलोय की बेल आपको ना मिले तो किसी भी नजदीकी पतंजली चिकित्सालय में जाकर "गिलोय घनवटी" ले आयें जिसकी एक एक गोली रोगी को दिन में 3 बार दें l

यदि बुखार १ दिन से ज्यादा रहे तो खून की जांच अवश्य करवा लें l
यदि रोगी बार बार उलटी करे तो सेब के रस में थोडा नीम्बू मिला कर रोगी को दें, उल्टियाँ बंद हो जाएंगी l
ये रोगी को अंग्रेजी दवाइयां दी जा रही है तब भी यह चीज़ें रोगी को बिना किसी डर के दी जा सकती हैं l
डेंगू जितना जल्दी पकड़ में आये उतना जल्दी उपचार आसान हो जाता है और रोग जल्दी ख़त्म होता है l

Posted By KanpurpatrikaFriday, October 14, 2016

कानपुर कभी चलती थी यहाँ ट्राम ( कभी थे आगे अब है पीछे )

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कानपुर कभी चलती थी यहाँ ट्राम 


अपने बिंदास अंदाज और दिलचस्प बोली के लिए मशहूर कानपुर अब बेतरतीब ट्रैफिक के जाना जाता है। मंगलवार को मेट्रो प्रॉजेक्ट के शिलान्यास के साथ ही कानपुर नए दौर में कदम रखेगा। हालांकि कम ही लोग जानते हैं कि स्वतंत्रता के पहले ही शहर में इंटिग्रेटिड ट्रांसपॉर्ट सिस्टम मौजूद था। 1933 तक शहर के एक बड़े हिस्से में ट्राम चलती थी। उस दौर में यह सेवा दिल्ली के पहले कानपुर में आई थी।
यह था रूट
कानपुर के पुराने रेलवे स्टेशन (वर्तमान में जीटी रोड पर) से सरसैया घाट तक डबल ट्रैक पर ट्राम चलती थी। वरिष्ठ इतिहासकार मनोज कपूर के मुताबिक, इसका रूट पुराने स्टेशन से शुरू होकर घंटाघर, हालसी रोड, बादशाही नाका, नई सड़क, हॉस्पिटल रोड, कोतवाली, बड़ा चौराहा और सरसैया घाट पर खत्म होता था। नई सड़क के आगे बीपी श्रीवास्तव मार्केट (मुर्गा मार्केट) में ट्राम के रखरखाव के लिए यार्ड बना था। उस काल में इस जगह को कारशेड चौराहा कहते थे, जो बाद में अपभ्रंश होकर कारसेट चौराहा हो गया।
नई सड़क पर ट्रैक रोड के दोनों तरफ बिछा हुआ था। यह सर्विस जून-1907 से शुरू होकर 16 मई, 1933 तक चली थी। यह दूरी करीब चार मील थी। इसके डिब्बों की कुछ विशेषताएं सिंगल डेक और खुली छत थी। ट्राम के गंगा किनारे टर्मिनेट होने की बड़ी वजह लोगों की नदी के प्रति अगाध श्रद्धा थी। इस इतिहास का गवाह बीपी श्रीवास्तव मार्केट अब भी पूरी शान से मौजूद है। अंदर से यह अब भी वैसा दिखता है।
मुंबई-दिल्ली से था मुकाबला
कपूर कहते हैं कि ब्रिटिश राज में शहर के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सन् 1900 में कोलकाता में ट्राम आने के बाद 1907 में कानपुर और मुंबई में ट्राम चलाई गई। बिजली भी यहां दिल्ली से पहले आई। दिल्ली में ट्राम 1908 में आई। ये सभी ट्राम बिजली से चलती थीं। मद्रास में घोड़े से खींची जाने वाली ट्राम चलती थी। 1933 में ट्राम बंद हो गई। तत्कालीन जिला प्रशासन ने बड़े चौराहे से सरसैया घाट जाने वाले ट्रैक (दाईं पट्टी) को महिलाओं के लिए रिजर्व कर दिया था। इसे गंगाजी की पट्टी कहा जाता था।

Posted By KanpurpatrikaFriday, October 14, 2016