Monday, December 14, 2015

हिंदू धर्म में किसी भी मांगलिक कामों में केला के पूजन के पीछे क्या है कारण

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हमारे देश में पेड़ पौधे को पुज्नीय माना जात है। तो कभी किसी रुप में तो कभी औषधि के रूप में। हिंदू धर्म में कई पेड़-पौधे ऐसे है। जिनके पीछे कोई न कोई पौराणिक कथा है। इन्ही में से एक है। केला का पौधा। केले के फल, तना और पत्तों को हमारे पूजा विधान में अनेक तरह से उपयोग किया जाता है। यह शुभ और पवित्रता का प्रतीक है। केले के वृक्ष में देवगुरु बृहस्पति का वास होता है। शास्त्रों के अनुसार सात गुरुवार नियमित रूप से केले की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। हिंदू धर्म में केले के पौधे को बहुत पवित्र माना गया है साथ ही इसे कई धार्मिक कार्य उपयोग किया जाता है। लेकिन आप इस बात को नही जानते होगे कि आखिर इसकी हर मांगलिक कामों में पूजा क्यों की जाती है। तो हम आपको बताते है कि इसकी पूजा क्यों की जाती है। पुराणों के अनुसार माना जात है कि केले के वृक्ष में साक्षात विष्णु निवास करते है। गुरुवार के दिन इसीलिेए केला के वृक्ष की पूजा की जाती है। माना जाता है कि अगर केले की वृक्ष की पूजा विधि-विधान और श्रृद्धा के साथ की जाए तो भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्तों सुख समृद्धि और शांति का वर प्राप्त होता है। केले के वृक्ष को शुभ और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है।


केले की पवित्रता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पुराने समय में इसके तने से निकाले गए पानी से ही उपवास के लिए पापड़ आदि बनाए जाते थे।  शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि केले की पूजा करने से गुरु दोष भी समाप्त होता है। अत: घर केले की पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। कुछ जगह पर घर में यानी कि घर के अन्दर केले का पौधा नहीं रखना चाहिए। माना जाता है कि गृह स्वामी के उत्थान में बाधक होता है। इसे आंगन में लगाने का विधान है। इसकी पूजा विधि-विधान से करन चाहिए। अगर आप केले की पूजा करना चाहते है तो इस तरह करें जिससे कि आपको इसका पूर्ण फल मिले। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर मौन पालन कर स्नान करें और केले के वृक्ष को प्रणाम कर जल चढ़ाएं। इसके बाद हल्दी की गांठ, चने की दाल और गुड़ समर्पित करें। कुंकू, अक्षत, पुष्प आदि चढ़ाएं और परिक्रमा करें। इस बात का ध्यान रखें कि घर के आंगन के वृक्ष को छोड़ बाहर किसी जगह लगा हो केला का वृक्ष वहां पर ये पूजा करनी चाहिए। इस तरह पूजा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते है। जिससे आपको मनवांछित फलों का प्राप्ति होती है।.

Posted By KanpurpatrikaMonday, December 14, 2015

Friday, December 11, 2015

निम्न योग पत्नी सुख में बाधा डालते है

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निम्न योग पत्नी सुख में बाधा डालते है।


कुंडली में सप्तम भाव से पत्नी का भाव होता है, तथा इसका करक शुक्र होता है, जब सप्तम भाव ,सप्तमेश तथा शुक्र शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट होतो, पत्नी सुख मिलता है और ये पाप प्रभाव अथवा अशुभ भाव में होतो पत्नी सुख में बाधा आती है। निम्न योग पत्नी सुख में बाधा डालते है।
१. जब लग्न, द्वितीय , चतुर्थ, सप्तम, अष्टम , द्वादश भाव में मंगल शत्रु राशी में हो.
२. चतुर्थ भाव का मंगल घर में क्लेश करता है।
३. सप्तम भाव में शनि नीच (मेष) अथवा शत्रु राशी का हो तथा उस पर मंगल की दृष्टी होतो, दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है।
४. सप्तम भाव में बुध +शुक्र की युती ४५-५० साल की उम्र में पत्नी सुख मिलता है।
५. सप्तम भाव पर सूर्य, राहू का प्रभाव जातक को अपने पत्नी/पति से अलग करते है। अथवा तलाक करवा देते है।
६. लग्न (१) भाव में सूर्य+राहू की युती दाम्पत्य जीवन में बाधा डालते है।
७. लग्न में सूर्य जातक को क्रोधी बनाता है।
८. सप्तम भाव में सूर्य पत्नी को क्रोधी बनाता है।
९. सप्तम में नीच राशी का चन्द्रमा (८) वृश्चिक राशी का अथवा पाप राशी का चन्द्रमा हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्टी होतो, जातक अपनी पत्नी/पति को खो बैठता है।
१०. यदि सप्तम भाव में शनि +चन्द्र की युती जातक को विधवा स्त्री दिलवा देते है।
११. यदि सप्तमेश राहू या केतू से युक्त होतो, जातक पर-स्त्री गामी होता है।
१२. सप्तम भाव में राहू जातक को दूसरे की स्त्री में आशक्त करता है।
१३. सप्तम में मकर राशी का गुरू (१०) होतो दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है।
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१. चन्द्र +राहू युति होतो मानसिक चिंता , पति / पत्नी की मानसिक स्थिति में असंतुलन होता है।
२. मंगल+राहू की युति से अड़ियल स्वभाव अथवा एक दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाना।
३. शुक्र +राहू की युति से जातक के पत्नी के अलावा अन्य स्त्री से सम्बन्ध के कारण अथवा माता-पिता की इच्छा के बिना विवाह कारण तलाक।
४. सूर्य+राहू पति, पत्नि के पद , ओहदे अथवा आर्थिक स्थिति को लेकर मतभेद , तथा तलाक की नौबत।
५. शनि +राहू एक दूसरे से अलग रहने के कारण , अशांति तथा तलाक।
६. बुध+राहू -दिमागी सोच में असमानता के कारण अशांति तथा तलाक।
७. मंगल+शुक्र+राहू -घरेलू अशांति -दुःख तथा अंत तलाक।
८. शुक्र+चन्द्र +राहू प्रेम में घाटा ही घाटा। स्त्रीयों से हानि, घरेलू अशांति। पराई औरतों से सम्बन्ध अंत में तलाक।
यदि उपरोक्त ग्रह योग २-७ -११ वे भाव में होतो , ज्यादा प्रभावशाली है
(
उपरोक्त योग होने पर अंत तलाक में होता है )
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Posted By KanpurpatrikaFriday, December 11, 2015

Thursday, December 10, 2015

यह अजपा जप ,इसके देवता अर्ध्नारीश्वर है

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जिसका उच्चारण नही किया जाता,अपितु जो स्वास और प्रतिस्वास के के गमन और आगमन से सम्पादित किया जाता है,(हं-स:) यह अजपा कहलाता है,इसके देवता अर्ध्नारीश्वर  है.
उद्यदभानुस्फ़ुरिततडिदाकारमर्द्धाम्बिकेशम,
पाशाभीति वरदपरशुं संदधानं कराब्जै:
,दिव्यार्कल्पैर्नवमणिमये: शोभितं विश्वमूल्म,
                                                  सौमाग्यनेयम वपुरवतु नश्चन्द्रचूडं त्रिनेत्रम॥
उदित होते हुए सूर्य के समान तथा चमकती हुई बिजली के तुल्य जिनकी अंगशोभा है,जो चार भुजाओं में अभय मुद्रा,पाशु,वरदान मुद्रा,तथा परशु को धारण किये है,जो नूतम मणिमय दिव्य वस्तुओं से सुशोभित और विश्व के मूल कारण हैं,ऐसे अम्बिका के अर्ध भाग से युक्त चन्द्रचूड त्रिनेत्र शंकरजी का सौम्य और आग्नेय शरीर हमारी रक्षा करे
.स्वाभाविक नि:श्वास-प्रश्वास रूप से जीव के जपने के लिये हंस-मंत्र इस प्रकार है:-
अथ व्क्ष्ये महेशानि प्रत्यहं प्रजपेन्नर:,
मोहबन्धं न जानति मोक्षतस्य न विद्यते ।
श्रीगुरौ: कृपया देवि ज्ञायते जप्यते यदा,
उच्छवासानि:श्वास्तया तदा बन्धक्षयो भवेत ।
उच्छवासैरेव नि:श्वासैहंस इत्यक्षरद्वयम,तस्मात प्राणस्य हंसाख्य आत्माकारेण संस्थित:।नाभेरुच्छवासानि:श्वासाद ह्र्दयाग्रे व्यवस्थित:,षष्टिश्वासेर भवित प्राण: षट प्राणा: नाडिका गत:।षष्टिनाड्या अहोतात्रम जपसंख्याक्रमो गत:,एक विंशति साहस्त्रं षटशताधिकमीश्वरि।जपते प्रत्यहं प्राणी सान्द्रानन्दमयीं पराम,उतपत्तिअर्जपमारम्भो मृत्युस्तत्र निवेदनम।बिना जपेन देवेशि,जपो भवति मन्त्रिण:,अजपेयं तत: प्रोक्ता भव पाश निकृन्तनी ।
अर्थ:- हे पार्वती ! अब एक मन्त्र कहता हूँ,जिसका मनुष्य नित जप करे,इसका जप करने से मोह का बन्धन नही आता है,और मोक्ष की आवश्यकता नही पडती है,हे देवी ! श्री गुरु कृपा से जब ज्ञान हो जाता है,तथा जब श्वास प्रतिश्वास से मनुष्य जप करता है,उस समय बन्धन का नाश हो जाता है,श्वास लेने और छोडने में ही "हँ-स:" इन दो अक्षरों का उच्चारण होता है,इसीलिये प्राण को हँस कहते हैं,और वह आत्मा के रूप में नाभि स्थान से उच्छवास-निश्वास के रूप में उठता हुआ ह्रदय के अग्र भाग में स्थित रहता है,साठ श्वास का एक प्राण होता है,और छ: प्राण की एक नाडी होती है,साठ नाडियों का एक अहोरात्र होता है,यह जप संख्या का क्रम है,हे ! ईश्वरी इस प्रकार इक्कीस हजार छ: सौ श्वासों के रूप में आनन्द देने वाली पराशक्ति का प्राणी प्रतिदिन जाप करता है,जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त यह जप माना जाता है,हे ! देवी,मन्त्रज्ञ के बिना जप करने से भी श्वास के द्वारा जप हो जाता है,इसीलिये इसे अजपा कहते है,और यह भव (संसार) के पाश (कष्टों) को दूर करने वाला है.महाभारत मे कहा है:-"षटशतानि दिवा रात्रौ,सहस्त्राण्येकविंशति:,एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवौ जपति सर्वदा".रात दिन इक्कीस हजार छ: सौ संख्या तक मन्त्र को प्रानी सदा जप करता है.सिद्ध साहित्य में अजपा की पर्याप्त चर्चा है,"गोरखपंथ" में भी एक दिन रात में आने जाने वाले २१६०० श्वास-प्रश्वासों को अजपा कहा गया है."इक्कीस सहस षटसा आदू,पवन पुरिष जप माली,इला प्युन्गुला सुषमन नारी,अहिनिशि बसै प्रनाली".गोरखपंथ का अनुसरण करते हुए श्वास को "ओहं" तथा प्रश्वास को "सोहं" बतलाया है,इन्ही का निरन्तर प्रवाह अजपाजप है,इसी को नि:अक्षर ध्यान भी कहा गया है,"निह अक्षर जाप तँह जापे,उठत धुन सुन्न से आवे"(गोररखवानी

Posted By KanpurpatrikaThursday, December 10, 2015

ग्रहों के 120 गुण

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ग्रहों के 120 गुण

लगन अगर-

मेष है तो आदमी का बच्चा है
वृष है तो धन की मशीन है
मिथुन है तो टेलीफ़ोन है
कर्क है तो भावना की पुडिया है
सिंह है तो अहम भरा हुआ है
कन्या है तो कर्जा दुश्मनी बीमारी से घिरा है
तुला है तो हर बात में फ़ायदा सोचने वाला है
वृश्चिक है तो भूतो का सरदार है
धनु है तो बाप दादा की बात करने वाला है
मकर है तो चौबीस घंटे काम ही काम है
कुम्भ है तो जल्दी रिस्ता बना सकता है
मीन है तो हमेशा मौन रहने वाला है

लगन से सूर्य अगर-

पहले भाव मे है तो अहम भरा है
दूसरे भाव मे है तो चमक के आगे कुछ दिखाई ही नही देता
तीसरे भाव मे है तो नेतागीरी पहले है
चौथे भाव मे है तो राजनीति वाली सोच है
पंचम भाव मे है तो परिवार मे ही राजनीति करने वाला है
छठे भाव मे है तो बाप को नौकर समझता है
सातवे भाव मे है जीवन साथी का गुलाम है
आठवे भाव मे है तो बेचारा दिल का मरीज है
नवे भाव मे है तो धर्म से भी कमाने वाला है
दसवे भाव मे है तो सभी काम नेतागीरी से किये जाते है
ग्यारहवे भाव मे है तो पिता को नोट छापने की मशीन समझता है
बारहवे भाव मे है तो आंखों का मरीज है

लगन से चन्द्र अगर-

पहले भाव मे है तो मन से काम करने वाला है
दूसरे भाव मे है तो ख्यालों से धनी है
तीसरे भाव मे है तो हर बात को पूंछ कर चलने वाला है
चौथे भाव मे है तो मकान दुकान और घर मे रहने वाला है
पंचवे भाव मे है तो मनोरंजन में ही मस्त रहने वाला है
छठे भाव मे है तो कोई काम सोचने से नही होता है
सातवे भाव मे है तो हर बात में माता की राय जरूरी है
आठवे भाव मे है तो दिल की गहराइया बहुत है,थाह पाना मुश्किल है
नवे भाव मे है तो हर काम भाग्य के भरोसे है
दसवे भाव मे है तो कार्य के लिये सोचने वाला है करने वाला नही है
ग्यारहवे भाव मे है तो कमाने के पहले ही कर्जा करने वाला है
बारहवे भाव मे है तो टोने टोटके और ज्योतिष मे रुचि रखने वाला है

मंगल अगर-

पहले भाव मे है तो तलवार का धनी है
दूसरे भाव मे है तो खरी खोटी सुनाने वाला है
तीसरे भाव मे है तो झगडा करने की आदत है
चौथे भाव मे है तो दिल को सुलगाने वाला है
पंचम भाव मे है तो खिलाडी है
छठे भाव मे है तो खून मे ही बीमारी है
सातवे भाव मे है तो काम मे चौकस है
आठवे भाव मे है तो जली हुयी मिठाई है
नवे भाव मे है तो खानदान को आग लगाने वाला है
दसवे भाव में है तो जो कहा है वह सच है,भले ही झूठ हो
ग्यारहवे भाव मे है तो चोरों का सरदार है
बारहवे भाव मे है तो तवे पर पानी छिनछिनाता है

बुध अगर-

पहले भाव मे है तो बातूनी है
दूसरे भाव मे है तो जमीन जायदाद वाला है
तीसरे भाव मे है तो चुगलखोर है
चौथे भाव मे है तो गाने बजाने मे रुचि है
पंचम भाव मे है तो गेंद की तरह परिवार को उछालने वाला है
छठे भाव मे है तो आवाज भी धीमी है
सातवे भाव मे है तो मौन रहकर सुनने वाला है
आठवे भाव मे है तो बात की औकात ही नही है
नवे भाव मे है तो पहुंच कर भी जगह से फ़िसलने वाला है
दसवें भाव मे है तो बातों का व्यापार करने वाला है
ग्यारहवे भाव मे है तो इतिहास को बखानने वाला है
बारहवे भाव मे है तो आधा पागल है

गुरु अगर-

पहले भाव मे है तो बेचारा अकेला है
दूसरे भाव मे है तो वेद को भी बेचकर खाने वाला है
तीसरे भाव मे है तो हर बात धर्मानुसार होनी चाहिये
चौथे भाव मे है तो कपडे की जानकारी है
पंचम भाव मे रास्ते चलते शिक्षा देने वाला है
छठे भाव मे है तो कर्जा दुश्मनी और बीमारी के मामले मे गुणी है
सप्तम भाव मे है तो धर्म पर बहस करने वाला है
अष्टम भाव मे है तो जमा पूंजी को खाने वाला है
नवम भाव मे है तो पूर्वजों के भाग्य की खा रहा है
दसम भाव मे है तो पूर्वजों की सम्पत्ति को बेच कर खाने वाला है
ग्यारहवे भाव मे है तो दोस्तों के साथ ही पति या पत्नी के सम्बन्ध बनाने वाला है
बारहवे भाव मे है तो आगे नाम चलाने वाला ही नही है

शुक्र अगर-

पहले भाव मे है तो खूबसूरत है
दूसरे भाव मे है तो बिना क्रीम लगाये कही जाने वाला नही
तीसरे भाव मे है तो सज संवर कर ही निकलेगा
चौथे भाव मे है तो रोजाना सवारी तो करनी ही है
पंचम भाव मे है तो फ़िल्म देखने से ही फ़ुर्सत नही है
छठे भाव मे है तो मकान दुकान और पत्नी को भी गिरवी रखने वाला है
सातवें भाव मे है तो जीवन को पैर के नीचे लेकर चलने वाला है
अष्टम मे है तो शमशान मे भी सो सकते है
नवम मे है तो देश मे तो रह ही नही सकते है
दसवे भाव मे है तो चमक दमक मे ही काम करना है,शाम को भले भूखा सोना पडे
ग्यारहवे भाव मे है तो शाम को रोटी भी उधारी की आ सकती है
बारहवे भाव मे है तो आराम का मामला है

शनि अगर-

पहले भाव मे है तो जड है
दूसरे भाव मे है तो धन की चिन्ता है
तीसरे भाव मे है तो आलसी है
चौथे भाव में ठंड अधिक लगती है
पंचम मे है तो कल का खाया ही नही पचता है
छठे भाव मे है तो सारी जिन्दगी की ताबेदारी यानी नौकरी है
सप्तम मे है तो रोजाना पहाड पर चढ कर काम करना है
अष्टम मे है तो सूखा कुआ है
नवम मे है तो भाग्य भरोसे नही काम के भरोसे कमाना है
दसवे भाव मे है तो दिन रात की मेहनत के बाद भी केवल रोटी
ग्यारहवे भाव मे है तो रोजाना काम का पैसा डूबने वाला है
बारहवे भाव मे है तो आराम के मामलो मे खर्चा नही

राहु अगर-

पहले भाव मे है तो आसमान से उतरना मुश्किल है
दूसरे भाव मे है तो पैसा कहां से आयेगा
तीसरे भाव मे है तो कोई भरोसा नही कब थप्पड मार दे
चौथे भाव मे है तो हर बात में शक है
पंचम मे है तो पढाई से क्या होता है हम तो बहुत जानते है
छठे भाव मे है तो बिना दवाई के रास्ता नही चलनी
सातवे भाव मे है तो घर मे कभी नही बननी
आठवे भाव मे है तो पता नही कब गुम जायें
नवे भाव मे है तो खाना खाने से भी पहले पूर्वजों का नाम लेना है
दसवे भाव मे कभी तो भूत की तरह काम करना है कभी करना ही नही है
ग्यारहवे भाव मे है तो कभी बहुत कमाई कभी धेला भी नही
बारहवे भाव मे है तो घर से बाहर निकलने में भी डर लगता है

केतु अगर-

पहले भाव मे है तो अकेला काफ़ी है
दूसरे भाव मे है तो मालिक के लिये धनदायक है
तीसरे भाव मे है तो टेलीफ़ोन का तार है
चौथे भाव मे है तो बेचारा सांस का मरीज है
पंचम भाव मे है तो क्रिकेट का बल्ला है
छठे भाव मे है तो औजार ही खराब है
सातवे भाव मे है तो सामने खम्भा है
आठवे भाव मे है तो एक टांग टूटी है
नवे भाव मे है तो कोई धर्म हो सब एक जैसे है
दसवे भाव मे है तो सरकारी नेता है
ग्यारहवे भाव मे है तो हर काम बायें हाथ का है
बारहवे भाव मे है तो झंडा ऊंचा रहे हमारा

Posted By KanpurpatrikaThursday, December 10, 2015

Wednesday, December 9, 2015

गत्यात्मक ज्योतिष संगीता पूरी जी के साथ

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बहुत आगे बढ गए हम ..इसके पूर्व की सारी कडियों को पढने के लिए
एक सप्‍ताह बाद अपने रिश्‍तेदारी के एक विवाह से लौटी मेरी बहन ने कल एक प्रसंग सुनाया। उस विवाह में दो बहनें अपनी एक एक बच्‍ची को लेकर आयी थी। हमउम्र लग रही उन बच्चियों में से एक बहुत चंचल और एक बिल्‍कुल शांत थी। उन्‍हें देखकर मेरी बहन ने कहा कि इन दोनो बच्चियों में से एक का जन्‍म छोटे चांद और एक का बडे चांद के आसपास हुआ लगता है। वैसे तो उनकी मांओं को हिन्‍दी पत्रक की जानकारी नहीं थी , इसलिए बताना मुश्किल ही था। पर हिन्‍दी त्‍यौहारों की परंपरा ने इन तिथियों को याद रखने में अच्‍छी भूमिका निभायी है , शांत दिखने वाली बच्‍ची की मां ने बताया कि उसकी बच्‍ची दीपावली के दिन हुई है यानि ठीक अमावस्‍या यानि बिल्‍कुल क्षीण चंद्रमा के दिन ही और इस आधार पर उसने बताया कि दूसरी यानि चंचल बच्‍ची उससे डेढ महीने बडी है। इसका अर्थ यह है कि उस चंचल बच्‍ची के जन्‍म के दौरान चंद्रमा की स्थिति मजबूत रही होगी। ज्‍योतिष की जानकारी न रखने वालों ने तो इतनी छोटी सी बात पर भी आजतक ध्‍यान न दिया होगा। क्‍या यह स्‍पष्‍ट अंतर पुराने जमाने के बच्‍चों में देखा जा सकता था ? कभी नहीं , आंगन के सारे बच्‍चे एक साथ उधम मचाते देखे जाते थे , कमजोर चंद्रमा के कारण बच्‍चे के मन में रहा भय भी दूसरों को खेलते कूदते देखकर समाप्‍त हो जाता था। मन में चल रही किसी बात को उसके क्रियाकलापों से नहीं समझा जा सकता था।
ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए शुभ मुहूर्त्‍तों में जेवर बनवाने के बाद हमने संगति की चर्चा की है। हमने कहा कि एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। आज के युग में जब लोगों का संबंध गिने चुने लोगों से हो गया है , ग्रहों को समझने की अधिक आवश्‍यकता हो गयी है। प्राचीन काल में पूरे समाज से मेलजोल रखकर हम अपने गुणों और अवगुणों को अच्‍छी तरह समझने का प्रयास करते थे , हर प्रकार का समझौता करने को तैयार रहते थे। पर आज अपने विचार को ही प्रमुखता देते हैं और ऐसे ही विचारो वालों से दोसती करना पसंद करते हैं। यहां तक कि विवाह करने से पहले बातचीत करके सामनेवाले के स्‍वभाव को परख लेते हें , जबकि दो विपरीत स्‍वभाव हो और दोनो ओर से समझौता करने की आदत हो , तो व्‍यक्ति में संतुलन अधिक बनता है। पर अब हमें समझौता करना नागवार गुजरता है , अपनों से सही ढंग से तालमेल बना पाने वाले लोगों से ही संबंध बनाना पसंद करते हैं। ऐसी स्थिति में अपने और सामनेवालों के एक जैसे ग्रहों के प्रभाव से उनका संकुचित मानसिकता का बनना स्‍वाभाविक है।
इसके अलावे हमने ग्रहों के बुरे प्रभाव के लिए दान की चर्चा की है। हमलोग जब छोटे थे , तो हर त्‍यौहार या खास अवसरों पर नहाने के बाद दान किया करते थे। घर में जितने लोग थे , सबके नाम से सीधा निकला हुआ होता था। स्‍नान के बाद हमलोगों को उसे छूना होता था। दूसरे दिन गरीब ब्राह्मण आकर दान कए गए सारे अनाज को ले जाता था। वे लोग सचमुच गरीब होते थे। उन्‍हें कोई लालच भी नहीं होता था , जितना मिल जाता , उससे संतुष्‍ट हो जाया करते थे। हालांकि गृहस्‍थ के घरों से मिले इस सीधे के बदले उन्‍हें समाज के लिए ग्रंथो का अच्‍छी तरह अध्‍ययन मनन करना ही नहीं , नए नए सत्‍य को सामने लाना था , जिसे उन्‍होने सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बिगडने के दौरान पीढीयों पूर्व ही छोड दिया था। पर फिर भी किसी गरीब को दान देकर हम अच्‍छी प्रवृत्ति विकसित कर ही लेते थे , साथ ही बुरे वक्‍त में मन का कष्‍ट भी दूर होता ही है।
आज हमलोग उतने सही जगह दान भी नहीं कर पाते हैं। हमारे यहां एक ब्राह्मण प्रतिदिन शाम को आरती के बाद वह थाल लेकर प्रत्‍येक दुकान में घूमा करता है , कम से कम भी तो उसकी थाली में हजार रूपए प्रतिदिन हो जाते हैं। सडक पर आते जाते मेरे सामने से वह गुजरता है , मुझसे भी चंद सिक्‍के की उम्‍मीद रखता है , पर मैं उसे नहीं देती , मेरे अपने पुरोहित जी बहुत गरीब हैं , उन्‍हे देना मेरी दृष्टि में अधिक उचित है। जिस शहर में प्रतिदिन 12 से 14 घंटे काम करने के बाद एक ग्रेज्‍युएट को भी प्रतिमाह मात्र 2000 रू मिलते हों , वहां इसे शाम के दो घंटे मे 1000 रू मिल जाते हैं , उसको दिया जानेवाला दान दान नहीं हो सकता , पर आज ऐसे ही लोगों को दान मिला करता है। किसी भी क्षेत्र में पात्रता का हिसाब ही समाप्‍त हो गया है , इस कारण तो हर व्‍यक्ति ग्रहों के विशेष दुष्‍प्रभाव में है।
पर इन सब बातों को समझने के लिए यह आवश्‍यक है कि पहले हमें ग्रहों के प्रभाव को स्‍वीकार करना होगा। जिस तरह ऊपर के उदाहरण से मैने स्‍पष्‍ट किया कि चंद्रमा से बच्‍चे का मन प्रभावित होता हैं , उसी तरह बुध से किशोर का अध्‍ययन , मंगल से युवाओं का कैरियर प्रभावित होता हैं और शुक्र से कन्‍याओं का वैवाहिक जीवन। इसी प्रकार बृहस्‍पति और शनि से वृद्धों का जीवन प्रभावित होता है , इसलिए इन सारे ग्रहों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए संबंधित जगहों पर दान करना या मदद में खडे हो जाना उचित है। इसमें किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती , सीधे स्‍वीकार कर लेना बेहतर है। कल अन्‍य उपाय यानि रंगों और पेड पौधों की वैज्ञानिकता पर बात की जाएगी !!

Posted By KanpurpatrikaWednesday, December 09, 2015