Wednesday, December 9, 2015

गत्यात्मक ज्योतिष संगीता पूरी जी के साथ

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बहुत आगे बढ गए हम ..इसके पूर्व की सारी कडियों को पढने के लिए
एक सप्‍ताह बाद अपने रिश्‍तेदारी के एक विवाह से लौटी मेरी बहन ने कल एक प्रसंग सुनाया। उस विवाह में दो बहनें अपनी एक एक बच्‍ची को लेकर आयी थी। हमउम्र लग रही उन बच्चियों में से एक बहुत चंचल और एक बिल्‍कुल शांत थी। उन्‍हें देखकर मेरी बहन ने कहा कि इन दोनो बच्चियों में से एक का जन्‍म छोटे चांद और एक का बडे चांद के आसपास हुआ लगता है। वैसे तो उनकी मांओं को हिन्‍दी पत्रक की जानकारी नहीं थी , इसलिए बताना मुश्किल ही था। पर हिन्‍दी त्‍यौहारों की परंपरा ने इन तिथियों को याद रखने में अच्‍छी भूमिका निभायी है , शांत दिखने वाली बच्‍ची की मां ने बताया कि उसकी बच्‍ची दीपावली के दिन हुई है यानि ठीक अमावस्‍या यानि बिल्‍कुल क्षीण चंद्रमा के दिन ही और इस आधार पर उसने बताया कि दूसरी यानि चंचल बच्‍ची उससे डेढ महीने बडी है। इसका अर्थ यह है कि उस चंचल बच्‍ची के जन्‍म के दौरान चंद्रमा की स्थिति मजबूत रही होगी। ज्‍योतिष की जानकारी न रखने वालों ने तो इतनी छोटी सी बात पर भी आजतक ध्‍यान न दिया होगा। क्‍या यह स्‍पष्‍ट अंतर पुराने जमाने के बच्‍चों में देखा जा सकता था ? कभी नहीं , आंगन के सारे बच्‍चे एक साथ उधम मचाते देखे जाते थे , कमजोर चंद्रमा के कारण बच्‍चे के मन में रहा भय भी दूसरों को खेलते कूदते देखकर समाप्‍त हो जाता था। मन में चल रही किसी बात को उसके क्रियाकलापों से नहीं समझा जा सकता था।
ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए शुभ मुहूर्त्‍तों में जेवर बनवाने के बाद हमने संगति की चर्चा की है। हमने कहा कि एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। आज के युग में जब लोगों का संबंध गिने चुने लोगों से हो गया है , ग्रहों को समझने की अधिक आवश्‍यकता हो गयी है। प्राचीन काल में पूरे समाज से मेलजोल रखकर हम अपने गुणों और अवगुणों को अच्‍छी तरह समझने का प्रयास करते थे , हर प्रकार का समझौता करने को तैयार रहते थे। पर आज अपने विचार को ही प्रमुखता देते हैं और ऐसे ही विचारो वालों से दोसती करना पसंद करते हैं। यहां तक कि विवाह करने से पहले बातचीत करके सामनेवाले के स्‍वभाव को परख लेते हें , जबकि दो विपरीत स्‍वभाव हो और दोनो ओर से समझौता करने की आदत हो , तो व्‍यक्ति में संतुलन अधिक बनता है। पर अब हमें समझौता करना नागवार गुजरता है , अपनों से सही ढंग से तालमेल बना पाने वाले लोगों से ही संबंध बनाना पसंद करते हैं। ऐसी स्थिति में अपने और सामनेवालों के एक जैसे ग्रहों के प्रभाव से उनका संकुचित मानसिकता का बनना स्‍वाभाविक है।
इसके अलावे हमने ग्रहों के बुरे प्रभाव के लिए दान की चर्चा की है। हमलोग जब छोटे थे , तो हर त्‍यौहार या खास अवसरों पर नहाने के बाद दान किया करते थे। घर में जितने लोग थे , सबके नाम से सीधा निकला हुआ होता था। स्‍नान के बाद हमलोगों को उसे छूना होता था। दूसरे दिन गरीब ब्राह्मण आकर दान कए गए सारे अनाज को ले जाता था। वे लोग सचमुच गरीब होते थे। उन्‍हें कोई लालच भी नहीं होता था , जितना मिल जाता , उससे संतुष्‍ट हो जाया करते थे। हालांकि गृहस्‍थ के घरों से मिले इस सीधे के बदले उन्‍हें समाज के लिए ग्रंथो का अच्‍छी तरह अध्‍ययन मनन करना ही नहीं , नए नए सत्‍य को सामने लाना था , जिसे उन्‍होने सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बिगडने के दौरान पीढीयों पूर्व ही छोड दिया था। पर फिर भी किसी गरीब को दान देकर हम अच्‍छी प्रवृत्ति विकसित कर ही लेते थे , साथ ही बुरे वक्‍त में मन का कष्‍ट भी दूर होता ही है।
आज हमलोग उतने सही जगह दान भी नहीं कर पाते हैं। हमारे यहां एक ब्राह्मण प्रतिदिन शाम को आरती के बाद वह थाल लेकर प्रत्‍येक दुकान में घूमा करता है , कम से कम भी तो उसकी थाली में हजार रूपए प्रतिदिन हो जाते हैं। सडक पर आते जाते मेरे सामने से वह गुजरता है , मुझसे भी चंद सिक्‍के की उम्‍मीद रखता है , पर मैं उसे नहीं देती , मेरे अपने पुरोहित जी बहुत गरीब हैं , उन्‍हे देना मेरी दृष्टि में अधिक उचित है। जिस शहर में प्रतिदिन 12 से 14 घंटे काम करने के बाद एक ग्रेज्‍युएट को भी प्रतिमाह मात्र 2000 रू मिलते हों , वहां इसे शाम के दो घंटे मे 1000 रू मिल जाते हैं , उसको दिया जानेवाला दान दान नहीं हो सकता , पर आज ऐसे ही लोगों को दान मिला करता है। किसी भी क्षेत्र में पात्रता का हिसाब ही समाप्‍त हो गया है , इस कारण तो हर व्‍यक्ति ग्रहों के विशेष दुष्‍प्रभाव में है।
पर इन सब बातों को समझने के लिए यह आवश्‍यक है कि पहले हमें ग्रहों के प्रभाव को स्‍वीकार करना होगा। जिस तरह ऊपर के उदाहरण से मैने स्‍पष्‍ट किया कि चंद्रमा से बच्‍चे का मन प्रभावित होता हैं , उसी तरह बुध से किशोर का अध्‍ययन , मंगल से युवाओं का कैरियर प्रभावित होता हैं और शुक्र से कन्‍याओं का वैवाहिक जीवन। इसी प्रकार बृहस्‍पति और शनि से वृद्धों का जीवन प्रभावित होता है , इसलिए इन सारे ग्रहों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए संबंधित जगहों पर दान करना या मदद में खडे हो जाना उचित है। इसमें किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती , सीधे स्‍वीकार कर लेना बेहतर है। कल अन्‍य उपाय यानि रंगों और पेड पौधों की वैज्ञानिकता पर बात की जाएगी !!

Posted By KanpurpatrikaWednesday, December 09, 2015

शमी वृक्ष (Prosopis spicigera) -साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व और औषधीय गुण

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शमी वृक्ष (Prosopis spicigera) -साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व और औषधीय गुण - 
पीपल और शमी दो ऐसे वृक्ष हैं जिन पर शनि का प्रभाव होता है। कहते हैं कि इनकी पूजा से शनि प्रसन्न हो जाते हैं। पीपल का वृक्ष बहुत बड़ा होता है इसलिए इसे घर में नहीं लगाया जा सकता है। (पीपल के बारे में एक विसरित लेख दो भागों में हाल में ही लिखा गया है). ऐसे में शमी का पौधा ही घर में लगाकर शनि को प्रसन्न किया जा सकता है।
राजस्थान में शमी वृक्ष को 'खेजड़ी' के नाम से जाना जाता है। यह मूलतः रेगिस्तान में पाया जाने वाला वृक्ष है, जो थार मरुस्थल एवं अन्य स्थानों पर भी पाया जाता है। इसके अन्य नामों में घफ़ (संयुक्त अरब अमीरात), खेजड़ी, जांट/जांटी, सांगरी (राजस्थान), जंड (पंजाबी), कांडी (सिंध), वण्णि (तमिल), शमी, सुमरी (गुजराती) आते हैं। इसका व्यापारिक नाम कांडी है। शमी के फूल छोटे पीताभ रंग के होते हैं। प्रौढ पत्तियों का रंग राख जैसा होता है, इसीलिए इसकी प्रजाति का नाम 'सिनरेरिया' रखा गया है अर्थात 'राख जैसा'।
विशेष रोचक जानकारी :
खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है। जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है। इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है। इसकी लकडी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है। अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है। सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे। इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है।
शमी वृक्ष में पाप खत्म करने की शक्ति होती है। किसी भी यज्ञ या शुभ कार्य के अनुष्ठान में शमी का पूजन व प्रयोग किया जाता है।
शमी के पंचांग से मिलेगी दोषों से मुक्ति :
शमी के वृक्ष पर कई देवताओं का वास एक साथ होता है. यही वजह है कि समस्त यज्ञों में शमी वृक्ष की समिधाओं का प्रयोग अत्यंत शुभ माना गया है. शमी के काँटों का प्रयोग तंत्र-मंत्र बाधा के और नकारात्मक शक्तियों के नाश के लिए होता है, तो वहीं शमी के पंचांग यानि फूल, पत्ते, जड़ें, टहनियां और रस का इस्तेमाल कर शनि संबंधी दोषों से जल्द मुक्ति पायी जा सकती है.
वास्तु विज्ञान के अनुसार नियमित शमी वृक्ष की पूजा की जाए और इसके नीचे सरसो तेल का दीपक जलाएं तो शनि दोष से कुप्रभाव से बचाव होता है। नवरात्र में विजयादशमी के दिन शमी की पूजा करने से घर में धन दौलत का आगमन होता है।
शमी का पौधा नकारात्मक प्रभाव को दूर करता है। टोने-टोटके के कारण प्रगति में आने वाले अवरोध को भी शमी शमन करता है।
कथा के अनुसार कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या करके ही ज्ञान की प्राप्ति की थी।
शमी वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है। शनि देव को शान्त रखने के लिये भी शमी की पूजा की जाती है।
शमी को गणेश जी का भी प्रिय वृक्ष माना जाता है और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं।
बिहार, झारखण्ड और आसपास के कई राज्यों में भी इस वृक्ष को पूजा जाता है। यह लगभग हर घर के दरवाज़े के दाहिनी ओर लगा देखा जा सकता है। किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन को शुभ मना जाता है।
शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है। अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास में पांडवों ने अपने सारे अस्त्र शस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे, जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था। कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी और उससे शक्ति और विजय प्राप्ति की कामना की थी। तभी से यह माना जाने लगा है कि जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है उसे शक्ति और विजय प्राप्त होती है। इसी प्रकार लंका विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा शमी के वृक्ष की पूजा का उल्लेख मिलता है।
शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी ।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी ॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया ।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता ॥

अर्थात "हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं। आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय हैं। जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की मैं भी करता हूँ। मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये।
कहते है एक आक के फूल को शिवजी पर चढ़ाना से सोने के दान के बराबर फल देता है , हज़ार आक के फूलों कि अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों के चढाने कि अपेक्षा एक बिल्व-पत्र से मिल जाता है | हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी। हजार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल, हजार कुश फूलों के बराबर एकशमी का पत्ता, हजार शमी के पत्तो के बराबर एक नीलकमल, हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।इसलिए भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए एक शमी का पुष्प चढ़ाएं क्योंकि यह फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है|
विशेष :
1 शमी वृक्ष की जड़ को विधि-विधान पूर्वक घर लेकर आएं। उसे घर में रोपित कर नित्य उसका पूजन करें। ऐसा करने से गणेश जी आएंगे घर के आर और शनिदेव जाएंगे घर से पार।
2 भगवान गणेश को शमी अर्पित करते समय निम्न मंत्र का जाप करें -
त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै।
शमी दलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक।।
जाप के उपरांत मोदक और दुर्वा का भोग लगाएं और आरती करें।
3 शमी के पौधे की जड़ को काले धागे में बांधकर गले या बाजू में धारण करें। ऐसा करने से शनिदेव से संबंधित जीवन में जितने भी विकार हैं उनका शीघ्र ही निवारण होगा।
4 गणेश पूजन करते समय शमी के कुछ पत्ते गणेश जी को अर्पित करने से घर में धन एवं सुख की वृद्धि होती है।
औषधीय गुण :
यह कफनाशक ,मासिक धर्म की समस्याओं को दूर करने वाला और प्रसव पीड़ा का निवारण करने वाला पौधा है.

Posted By KanpurpatrikaWednesday, December 09, 2015

Monday, December 7, 2015

आइये अपनी लग्न कुंडली से जाने अपने ईष्ट देव को….

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आइये अपनी लग्न कुंडली से जाने अपने ईष्ट देव को….

भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपास्य देव माना गया है व विभिन्न शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है।
आजकल परेशानियों, कठिनाइयों के चलते हम ग्रह शांति के उपायों के रूप में कई देवी-देवताओं की आराधना, मंत्र जाप एक साथ करते जाते हैं। परिणाम यह होता है कि किसी भी देवता को प्रसन्न नहीं कर पाते- जैसा कि कहा गया है – ‘एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय’ जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं।
यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है।हम सब प्रतिदिन विभिन्न देवी -देवताओं का पूजन करते हैं। लगभग सभी सकाम पूजा ही करते हैं। कहने का मतलब यह है कि हम हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए ही ईश्वर को मानते है। बहुत कम लोग होते हैं निष्काम पूजा करते हैं। बहुत सारे लोगों कि यह शिकायत होती है कि वो पूजा -व्रत आदि बहुत करते हैं फिर भी फल नहीं मिलता।
मैं यहाँ कहना चाहूंग कि हमें काम तो बिजली विभाग में होता है और चले जाते हैं जल-विभाग में ! जब हम गलत कार्यालय में जायेंगे तो काम कैसे होगा। इसी प्रकार हर कुंडली के अनुसार उसके अपने अनुकूल देवता होते हैं।
लग्नानुसार इष्ट देव——
लग्न स्वामी ग्रह इष्ट देव
मेष, वृश्चिक मंगल हनुमान जी, राम जी
वृषभ, तुला शुक्र दुर्गा जी
मिथुन, कन्याबुध गणेश जी, विष्णु
कर्क चंद्र शिव जी
सिंह सूर्य गायत्री, हनुमान जी
धनु/ मीन गुरु विष्णु जी (सभी रूप), लक्ष्मी जी
मकर, कुंभ शनि हनुमान जी, शिव जी
लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है।
विशेष : इष्ट का ध्यान-जप का समय निश्चित होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह सात बजे जप ध्यान करते हैं, तो रोज उसी समय ध्यान करें। अपनी सुविधानुसार समय न बदलें।
व्यक्ति यदि अपने लग्र के देवता की पूजा करें तो उनको अपने हर काम में सफलता मिलने लगेगी।
देव मंत्र —-
हनुमान—- ऊँ हं हनुमंताय नम:
शिव—- ऊँ रुद्राय नम:
गणेश —ऊँ गंगणपतयै नम:
दुर्गा— ऊँ दुं दुर्गाय नम:
राम —-ऊँ रां रामाय नम:
विष्णु— विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ
लक्ष्मी— लक्ष्मी चालीसा,…ऊँ श्रीं श्रीयै नम:
किसी भी कुंडली के लग्न /प्रथम भाव , पंचम भाव और नवम भाव में स्थित राशि के अनुसार इष्ट देव निर्धारित होते है और इनके अनुसार ही रत्न धारण किये जा सकते हैं।
मेष लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर प्रथम राशि मेष होती है तो वह मेष लग्न की कुंडली कही जायेगी। मेष लग्न में पांचवे भाव में सिंह राशि और नवम भाव में धनु राशि होती है।
मेष राशि का स्वामी मंगल , सिंह राशि का स्वामी है सूर्य और धनु राशि का स्वामी वृहस्पति है। इस कुंडली के लिए अनुकूल देव हनुमान जी , सूर्य देव और विष्णु भगवान है ।
मेष लग्न के लिए हनुमान जी की आराधना , मंगल के व्रत , सूर्य चालीसा , आदित्य – हृदय स्त्रोत , राम रक्षा स्त्रोत , रविवार का व्रत , वृहस्पति वार का व्रत , विष्णु पूजन करना चाहिए। मूंगा , माणिक्य और पुखराज रत्न अनुकूल रहेंगे।
वृषभ लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वितीय राशि वृषभ होती है तो वह वृषभ लग्न की कुंडली कही जायेगी। वृषभ लग्न में पांचवे भाव में कन्या राशि और नवम भाव में मकर राशि होती है।
वृषभ राशि का स्वामी शुक्र , कन्या राशि का बुध और मकर राशि के स्वामी शनि देव है।
वृषभ लग्न वालों के लिए लक्ष्मी देवी , गणेश जी और दुर्गा देवी की आराधना उचित रहेगी। लक्ष्मी चालीसा , दुर्गा चालीसा और गणेश चालीसा का पाठ करना चाहिए।
मिथुन लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर तृतीय राशि मिथुन होती है तो वह मिथुन लग्न की कुंडली कही जायेगी। मिथुन लग्न में पांचवे भाव में तुला राशि और नवम भाव में कुम्भ राशि होती है।
मिथुन राशि का स्वामी बुध , तुला राशि का शुक्र और कुंभ राशि का स्वामी शनि देव हैं।
इस लग्न के लिए गणेश जी , लक्ष्मी देवी और काली माता अराध्य होगी। कुम्भ राशि के स्वामी शनि होने के कारण शनि देव को प्रसन्न और शांत रखने के उपाय किये जा सकते हैं।
इस लग्न के लिए पन्ना , हीरा और नीलम अनुकूल रत्न हैं।
कर्क लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर चतुर्थ राशि कर्क होती है तो वह कर्क लग्न की कुंडली कही जायेगी। कर्क लग्न के पांचवे भाव में वृश्चिक राशि और नवम भाव में मीन राशि होती है।
कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा,वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल और मीन राशि के स्वामी वृहस्पति होते है। इस लग्न के लिए शिव जी , हनुमान जी और विष्णु जी अराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए मोती , मूंगा और पुखराज अनुकूल रत्न हैं।
सिंह लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर पंचम राशि सिंह होती है तो वह सिंह लग्न की कुंडली कही जायेगी। सिंह लग्न के पांचवे भाव में धनु राशि और नवम भाव में मेष राशि होती है।
सिंह राशि का स्वामी सूर्य देव , धनु राशि के स्वामी वृहस्पति और मेष राशि के स्वामी मंगल होता है।
इस लग्न के लिए सूर्य देव , विष्णु जी और हनुमान जी आराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए माणिक्य , मूंगा और पुखराज रत्न अनुकूल होते हैं।
कन्या लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर षष्ठ राशि कन्या होती है तो वह कन्या लग्न की कुंडली कही जायेगी। इस लग्न के पांचवे भाव में मकर राशि और नवम भान में वृषभ राशि होती है।
कन्या राशि का स्वामी बुध , मकर राशि का स्वामी शनि और वृषभ राशि का स्वामी शुक्र होता है।
इस लग्न के लिए गणेश जी , दुर्गा देवी ,लक्ष्मी देवी आराध्य देव होते हैं और पन्ना, नीलम और हीरा अनुकूल रत्न होते हैं।
तुला लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर सप्तम राशि तुला हो तो वह तुला लग्न की कुंडली कही जायेगी। तुला लग्न में पांचवे भाव में कुम्भ राशि और नवम भाव में मिथुन राशि होती है। तुला राशि का स्वामी शुक्र , कुम्भ राशि का स्वामी शनि और मिथुन राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए लक्ष्मी देवी , काली देवी , दुर्गा देवी और गणेश जी आराध्य देव हैं और हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है।
वृश्चिक लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर अष्ठम राशि वृश्चिक हो तो वह वृश्चिक लग्न की कुंडली कही जायेगी। वृश्चिक लग्न में पांचवे भाव में मीन राशि और नवम भाव में कर्क राशि होती है। वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल , मीन राशि का स्वामी वृहस्पति और कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा होता है। इस लग्न के लिए हनुमान जी , विष्णु जी और शिव जी अराध्य देव होते है और मूंगा , पुखराज और मोती अनुकूल रत्न है।
धनु लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर नवम राशि धनु हो तो वह धनुलग्न की कुंडली कही जायेगी। धनु लग्न में पांचवे भाव में मेष राशि और नवम भाव में सिंह राशि होती है। धनु राशि का स्वामी वृहस्पति , मेष राशि का स्वामी मंगल और सिंह राशि का स्वामी सूर्य होता है। इस लग्न के लिए विष्णु जी ,हनुमान जी और सूर्य देव आराध्य देव हैं और पुखराज , मूंगा और माणिक्य अनुकूल रत्न है।
मकर लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर दशम राशि मकर हो तो वह मकर लग्न की कुंडली कही जायेगी। मकर लग्न में पांचवे भाव में वृषभ राशि और नवम भाव में कन्या राशि होती है। मकर राशि का स्वामी शनि , वृषभ राशि का स्वामी शुक्र और कन्या राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए शनि देव , हनुमान जी , दुर्गा देवी , लक्ष्मी देवी और गणेश जी आराध्य देव है और नीलम , हीरा और पन्ना अनुकूल रत्न है।
कुम्भ लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर एकादश राशि कुम्भ हो तो वह कुम्भ लग्न की कुंडली कही जायेगी। कुम्भ लग्न में पांचवे भाव में मिथुन राशि और नवम भाव में तुला राशि होती है।कुम्भ राशि का स्वामी शनि , मिथुन राशि का स्वामी बुध और तुला राशि का स्वामी शुक्र होता है। इस लगन के लिए शनि देव , काली देवी , गणेश जी , दुर्गा देवी और लक्ष्मी देवी आराध्य देव है और नीलम , पन्ना और हीरा अनुकूल रत्न है।
मीन लग्न :– जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वादश राशि मीन हो तो वह मीन लग्न की कुंडली कही जायेगी। मीन लग्न में पांचवे भाव में कर्क राशि और नवम भाव में वृश्चिक राशि होती है। मीन राशि का स्वामी वृहस्पति , कर्क राशि का स्वामी चन्द्र और वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल होता है। इस लग्न के लिए विष्णु जी , शिव जी और हनुमान जी आराध्य देव है और पुखराज , मोती और मूंगा अनुकूल रत्न है।
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शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।
जन्म माह :—
जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।
-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
-मार्च , अगस्त व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जन्म वार से :—-
जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
रविवार- विष्णु।
सोमवार- शिवजी।
मंगलवार- हनुमानजी
बुधवार- गणेशजी।
गुरूवार- शिवजी
शुक्रवार- देवी।
शनिवार- भैरवजी।
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जन्म कुंडली से :—-
जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।
राशि के आधार पर :—–
पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे—–
मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें।
वृष: गणेशजी।
मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कर्क: हनुमानजी।
सिंह: शिवजी।
कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली।
तुला: भैरव, हनुमानजी, काली।
वृश्चिक: शिवजी।
धनु: हनुमानजी।
मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कुंभ: गणेशजी।
मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।
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ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर जानिए आपके इष्ट देव—
सूर्य: विष्णु।
चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा।
मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।
बुध- गणेश, विष्णु।
गुरू- शिव।
शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती।
शनि- भैरव, काली।
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इष्ट देव की उपासना—–
नीचे सभी राशियों के देवता दिए जा रहे हैं। अपनी राशि के अनुसार देवता की आराधना करे—–
मेष : हनुमान जी
वृषभ : दुर्गा माँ
मिथुन : गणपति जी
कर्क: शिव जी
सिंह : विष्णु जी (श्रीराम )
कन्या : गणेश जी
तुला : देवी माँ
वृश्चिक : हनुमान जी
धनु : विष्णु जी
मकर : शिव जी
कुम्भ : शिव का रूद्र रूप
मीन : विष्णु जी (सत्यनारायण भगवान)
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प्रतिनिधि ग्रह– इष्‍ट देव—- रत्न दान —–सामग्री
गुरु————— विष्‍णु—–पुखराज- —पीली वस्तुएँ
शुक्र————- देवी के रूप— हीरा —–सफेद मिठाई
शनि————- शिव जी—– नीलम —-काली वस्तुएँ
सूर्य——— गायत्री, विष्णु—- माणिक— सफेद वस्तुएँ, नारंगी
बुध————- गणेश——– पन्ना——– हरी वस्तु
मंगल ———हनुमानजी ——मूँगा——- लाल वस्तुएँ
चंद्र————- शिवजी——– मोती——- सफेद वस्तु
विशेष : राहु और केतु पर्वतों के खराब होने पर क्रमश:—
सरस्वती और गणेश जी की आराधना करना लाभ देता है।
‘ऊँ रां राहवे नम:’ और ‘ऊँ कें केतवे नम:’ के जाप से भी ये ग्रह शां‍त होते हैं।

Posted By KanpurpatrikaMonday, December 07, 2015

Thursday, December 3, 2015

दशरथ कृत शनि स्तोत्र

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दशरथ कृत शनि स्तोत्र
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।१।।
   
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
   
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।२।।
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ  वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते।।३।।
   
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम: ।
   
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।४।।
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ।।५।।
   
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते ।
   
नमो मन्दगते तुभ्यं निरिाणाय नमोऽस्तुते ।।६।।
तपसा दग्धदेहाय नित्यं  योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।७।।
   
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज  सूनवे ।
   
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।८।।
देवासुरमनुष्याश्च  सिद्घविद्याधरोरगा: ।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:।।९।।
   
प्रसाद कुरु  मे  देव  वाराहोऽहमुपागत ।
      
एवं स्तुतस्तद  सौरिग्र्रहराजो महाबल: ।।­१०।।


Posted By KanpurpatrikaThursday, December 03, 2015

शिवसंकल्प सूक्त

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शिवसंकल्प सूक्त
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥1
वह दिव्य ज्योतिमय शक्ति (मन) जो हमारे जागने की अवस्था में बहुत दूर तक चला जाता है, और हमारी निद्रावस्था में हमारे पास आकर आत्मा में विलीन हो जाता है,वह प्रकाशमान स्रोत जो हमारी इंद्रियों को प्रकाशित करता है, ऐसा मेरा मन शुभसंकल्प युक्त हो।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः।
यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः  शिवसङ्कल्पमस्तु  2
जिस मन की सहायता से ज्ञानीजन कर्मयोग की साधना में लीन यज्ञ,जप,तप करते हैं,वह जो सभी जनों के शरीर में विलक्षण रुप से स्थित है, ऐसा मेरा मन शुभसंकल्प युक्त  हो।
यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ।
यस्मान्न ऋ ते किन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  ॥3
जो मन ज्ञान, चित्त व धैर्य स्का स्वरूप है तथा अविनाशी आत्मा से युक्त इन समस्त प्राणियों के भीतर ज्योति स्वरूप विद्यमान है, ऐसा मेरा मन शुभसंकल्प युक्त हो।
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम् ।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥4
जिस शाश्वत मन द्वारा भूत,भविष्य व वर्तमान काल की सारी वस्तुएं सब ओर से ज्ञात होती हैं और जिस मन के द्वारा सप्तहोत्रिय यज्ञ (सात ब्राह्मणों द्वारा किया जाने वाला यज्ञ) किया जाता है, ऐसा मेरा मन शुभसंकल्प युक्त हो।
यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः ।
यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  5
जिस मन में ऋ ग्वेद की ऋ चाएं व सामवेद व यजुर्वेद के मंत्र उसी प्रकार स्थापित हैं, जैसे रथ के पहिए की धुरी से तीलियां जुड़ी होती हैं। जिसमें सभी प्राणियों का ज्ञान कपड़े के तंतुओं की तरह बुना हुआ होता है, ऐसा मेरा मन शुभसंकल्प युक्त हो।
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान् नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  6
जो मन, मनुष्य को इंद्रियों को उसी प्रकार नियंत्रित करता है अथवा विषय-वासनाओं का चक्कर लगाने के लिए प्रेरित करता है, जैसे एक कुशल सारथी लगाम द्वारा रथ के वेगवान अश्वों को नियंत्रित करता व दौड़ाता है। जो अजर तथा अति वेगवान है व प्रणियों के हृदय में स्थित है, ऐसा मेरा मन शुभसंकल्प युक्त हो।

Posted By KanpurpatrikaThursday, December 03, 2015