Thursday, May 22, 2014

आम आदमी की सुनामी

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                                                         आम आदमी की सुनामी

१६ वी लोकसभा  चुनाव मोदी बनाम अन्य राजनितिक पार्टिया बनकर रह गया ,एन डी ए  की सयोगी दलों  को छोड़कर / मोदी ने जहा राजनीती से ऊपर उठकर बात की विकास की सहयोग की आम आदमी के दुःख की   बाकि दलों ने राजनीती के सबसे निचले स्तर पर जा कर हमला बोला जो टाफी बिस्कुट गुब्बारे से होकर खूनी हाथो हत्यारा  जैसे शब्दों के साथ लहर और  अंत मे सुनामी के साथ  सब बह गया /
आखिर में सवाल ये उठता है की क्या वाकई में मोदी की लहर या सुनामी  थी या बी जे  पी की अपनी बात थी या फिर मोदी के साथ बी जे पी  या फिर दोनों का ही मिला जुला कर ये सुनामी आई थी जो सभी को बहा कर ले गई / लेकिन  अगर ऐसा ही था तो सिर्फ 284 सीट  ही क्यों 400  के आस पास क्यों नहीं सब को मिलाकर  सिर्फ 333  सीट्स ये कोई चमत्कार नहीं है ये तो अंधे के हाथ में बटेर लगने जैसा ही है क्या वास्तव में सभी ऐसा ही सोच रहे थे या फिर कुछ लोग ही इस जादूई अकड़े के पास खड़े थे ये तो वो ही बता सकते है लेकिन इसके उलट सच्चाई कुछ और ही कहती है /
अगर राज्यवर  चुनाव परिणामो को देखे तो मोदी जी गुजरात में कई सालो से है तो एम पी  में शिवराज जी और राजस्थान में बी जे पी  आई और कांग्रेस गई वही  उत्तर प्रदेश में जहा मायावती जी पूर्ण बहूमत  के साथ आती है और दूसरी बार अखिलेश जी की पूर्ण बहूमत से आ जाते  है तो यहाँ पर किसकी लहर या सुनामी चली / जहा आम आदमी पार्टी और बी जे पी ने दिल्ली में कांग्रेस को हिला  दिया वही बी जे पी उत्तराखंड में सरकार बनाते बनाते रह गई क्यों
कुल मिलाकर  इन सभी विधान सभा और लोक सभा चुनावो में किसी पार्टी या नेता की सुनामी या लहर न होकर जनता का  जागरूक होना एक अहम कारण  है / कही मोदी फैक्टर  या गांधी फैक्टर या कही और दीदी या बहन जी का फैक्टर काम नहीं करता बल्कि जनता जिस दिन एक साथ बदलाव की सोच लेती है उस दिन उस पार्टी का फैक्टर अपने आप  चल जाता है / जिसका जीता जगता उदाहरण है आम आदमी पार्टी जिसको जनता ने जहा सर का ताज़  बना कर सर आँखों पर रखा अब  उसको अपने पैरो के पास भी स्थान नहीं दे रही है  /
उत्तर प्रदेश में जहा मायावती पूर्ण बहुमत से आती है और सबको  आश्चर्य चकित कर देती है लेकिन दुसरे चुनाव में फिर से जनता  उनको आश्चर्य चकित कर देती है और समाज वादी पार्टी को पूर्ण बहुमत से ले आती है अब समजवादी पार्टी को लेकर सभी आश्चर्य चकित थे लेकिन लोक सभा चुनाव में जनता उन्हे फिर से आश्चर्यचकित कर देती है / क्या शराब और रूपये बाटने व लैपटॉप ,बेरोजगारी भत्ता ,और मुफ्त की दवाईया और आवास देने से  से वोट मिलने लगते है और सरकार बनने लगती है तो उत्त्तर प्रदेश में समाजवादी  पार्टी  एक बढ़िया उदाहरण है जो जीत कर भी हार गई /
आखिर सवाल फिर से वही है की क्या कारन है की जो राजनितिक पार्टिया और राजनीती की गहरी जानकारी रखने वाले ऐसे परिणाम आने पर सोचने पर मजबूर हो जाते है / इन सब सवालो का जवाब जनता   के ही पास है जनता यानि आम आदमी जो सभी पार्टियो के रोड शो और रैलियों में बराबर  से खड़े नज़र आते है लेकिन परिंणाम आने  के बाद एक दम अलग खड़ी दिखाई पड़ती है /
आप अपने आप को अपनी पार्टी को उचा उठा कर बताओ चाहे जितनी उपलब्धिया गिनाओ  लेकिन आज के आम आदमी को बेवकूफ बनाना मुश्किल ही नहीं नामुनकिन भी है / इसका मुख्य कारण सूचना  और संचार तंत्र का आम आदमी तक पहुंच जाना और उसके ऊपर  भी रामदेव , अरविन्द केजरीवाल और अन्ना जैसे लोगो के द्वारा इस आम आदमी को अक्ल दे जाना जो बाद में शायद इनके   लिए ही मुसीबत बन जाए लेकिन फिर भी जनता तो जाग गई न ! अब जनता आप के चुनावी भाषण  और उपलब्धिया सुनती ही नहीं बल्कि वास्तिविक  आकड़ो पर गौर भी फरमाती है /
लेकिन एक कमी को देखकर दुःख भी होता है की अगर इस काम में समाज का चौथा खम्भा भी बराबर से निष्पक्छ तरीके से साथ दे तो शायद तस्वीर कुछ और ही होती / लेकिन पता नहीं क्यों आज का मीडिया हाउस ज्यादातर पार्टियो के हाथो में है या यो कहे की इनके मालिक आज के नेता ,नेता के साथ ही साथ मीडिया हाउस के मालिक और साझेदार भी है ,जो एक बड़ी वजह है मीडिया का जनता के साथ  खड़े न हो पाना ,वो हवा के रुख (पैसो के रुख ) और रसूख के साथ खड़ी नज़र आती है /
कुल  मिलाकर कोई भी नेता और राजनितिक पार्टिया चाहे करोडो रुपया क्यों न बर्बाद कर दे ,उनकी जीत कभी भी सुनिश्चित नहीं हो सकती है सुनिश्चित तभी  हो सकती है जब नेता और राजनीतक पार्टिया जनता से सीधे सम्बंध  स्थापीत नहीं करते / जनता ने किसी राजनितिक पार्टी या नेता को वोट न देकर उन्होने विकास और रोजगार सस्ती वस्तुए को  दिया था अपने शहर  को विकसित और व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी  आपको दी थी लेकिन  आपने अपनी जिम्मेदारियों से  मुह मोड़ लिया तो जनता ने भी तो आप से मुह ही तो मोड़ा है ये जनता की सुनामी में बह गए   सब /
लेकिन वक़्त अभी भी है  यू पी  में समाज वादी पार्टी को वापसी करनी है 2017 में और बी जे पी को 2019 में ऐसे ही राजस्थान मद्य प्रदेश उत्तराखंड और बाकि राज्यों में अलग अलग पार्टियो को / नेता  और राजनितिक पार्टिया अपनी  पार्टी में चाहे जीतने फेर बदल कर ले जब तक फाइलो से और घोषणा पत्रो से निकल कर विकास हकीकत में नहीं नज़र आएगा तब तक कुछ भी नहीं होने वाला /

 

Posted By KanpurpatrikaThursday, May 22, 2014

Wednesday, February 19, 2014

सफलता के चार सूत्र आशीष त्रिपाठी के द्वारा

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      सफलता के चार सूत्र आशीष त्रिपाठी के द्वारा
हम सब जानते है की मार्च और अप्रैल महीने या यों कहे की जनवरी से चालू होने वाली एग्जाम की टेंशन रिजल्ट आने तक ख़त्म नहीं होती है / जो पास हो जाते है वो तो खुश और जो फेल हो जाते है वो दुखी, कुछ गलत रहो पर चल पड़ते है और कुछ इस दुनिया से अलविदा कह देते है / ऐसे न जाने कितनी बच्चे हर साल रिजल्ट आने के बाद सामने आते है / क्या ये सही है नहीं ये एकदम गलत है की हम  हार मान ले बिलकुल नहीं हम जीत कर ही रहेंगे जब तक सफल नहीं हो जायेंगे /
लेकिन कैसे  इसके लिए हमे अपने जीवन में चार बाते चार सूत्र हमेशा याद रखने होंगे .......
पहला सूत्र :- हम यानि हम सब जानते है की हम सफल हो पायेंगे की नहीं हम पास होंगे या फेल क्योंकि जैसा हमने तैयारी की है हम जानते है फिर हम फर्स्ट आयेंगे सेकंड या फिर थर्ड या फिर हम फेल हो जायेंगे हम बखूबी जानते है बस दूसरो से या फिर अपने आप से झूठ बोलते है / सही
लेकिन ये सच्चाई हम कभी किसी को नहीं बताते है यहाँ तक की पेपर देने के आने के बाद तो हम सौ प्रतिशत ये जान जाते है की रिजल्ट क्या आयेगा लेकिन फिर भी हम दोष किस्मत को देते है किस्मत क्या होती है मेरे हिसाब से किस्मत कुछ भी नहीं होती है किस्मत भाग्य और लक कुछ भी नहीं होता है अगर होता तो हम देख पाते लेकिन किस्मत भाग्य और लक को महसूस किया जा सकता है /
पेपर देने के आने के बाद यानि हमने कापी में कुछ भी नहीं लिखा है और हम पास हो जाते है तो उसकी किस्मत और अगर हमने सब कुछ लिख कर आते है और फेल हो जाते है तो किस्मत ख़राब नहीं किस्मत को दोष नहीं दे /
फिर यहाँ क्या होता है यहाँ पर सिस्टम ख़राब होता है जिन्हे समाज को सवारने की जिमेदारी दी गई थी उनमे से कुछ लोगो ने पैसे बनाने के चक्कर में किसी की जिंदगी ख़त्म कर दी और किसी के सपने, लेकिन उनको क्या पता की उनकी पैसे कमाने की चाहत किसी के घर का चिराग बुझा देगा / जितनी ज्यादा कापी आप चेक करते है उतनी ही कम नज़र आप सवालो पर दे पाते है जवाबो पर दे पाते है /
 लेकिन बच्चो अगर आप सब कुछ लिख कर आये है और फेल हो जाते है तो किस्मत को दोष देने से अच्छा है की सिस्टम को दोष दे और उस इन्सान को दोष दे जिनसे आप की जिंदगी और आपके सपनो से खेलने की सोची है / आप अगर सब कुछ लिख कर आये है तो आप अपनी दोबारा कापी चेक कराने की मांग रखे और दोबारा कापी चेक होने के बाद आप पास हो जाते है तो आप यहाँ पर शांत न बैठे आप केस करे उसके खिलाफ जिसने आप की जिंदगी  से खेलने की कोशिश की है ताकि किसी के साथ दोबारा ऐसा न हो /
दूसरा सूत्र :- हम हार  क्यों मान लेते है क्यों हम ये समझ लेते है की अब कुछ भी नहीं हो सकता आप जानते है की तीन ओर से तो हमारे रास्ते आस पास वाले बंद करते है और आखरी रास्ता हम खुद बंद कर लेते है क्यों
आप में से कितने लोग बचपन में एक बार में बैठना सिख गए थे
आप में से कितने लोग एक बार में चलना सीख गए थे और एक ही बार में दौड़ना
कितने लोग एक बार में ए बी सी डी और क ख ग  लिखना सिख गए  थे
फिर आप एक बार में सब कुछ पा लेने की  कैसे सोच लेते है एक बार में सफलता नहीं मिलती , तो दो बार , दो बार नहीं तो तीसरी बार  लगातार क्योंकि हमे सफलता चाहिए जिन्हे सफलता नहीं चाहिए वो शांत बैठ जाय क्योंकि उनकी किस्मत होगी तो सब कुछ  हो जायेगा ऐसा अगर वो मान लेते है तो वो पागल है /
हम हर बार प्रयास करेंगे और हर बार हम पहले से बेहतर पायेंगे और एक समय तो ऐसा आयेगा की हम सफल हो जायेंगे अगर नहीं हुए तो इतना तो आ ही जायेगा की हम किसी को पढाने लगेंगे , अगर ये भी नहीं हुआ तो हम अपने बच्चो को या आस पास वालो को तो बता ही सकते है यानि सफल तो हम हो ही जायेंगे / लेकिन प्रयास नहीं छोड़ना  है लगातार बार बार /
हम अपना बचपन कभी भी न भूले जैसे पापा ये रात क्यों होती है ये दिन क्यों होता है तोता हरा क्यों होता है पापा हम उड़ क्यों नहीं सकते बार बार क्यों क्यों क्यों लेकिन हमारे माता पिता हर बार हमारे सवालों  का जवाब देते जाते है / फिर जब हम बडे हो जाते है तो ये क्यों वाली आदत यानि अपना बचपन पीछे छोड़ देते है जितनी ज्यादा क्यों उतने ज्यादा जवाब समझ में  आया
यानि जो भी हम पड़ रहे है जब तक समझ में नहीं आ जाता तब तक पूछे और पूछने का तरीका की जहा पर आकर हम रुक जाते है यानि की जहा से हमे आंगे नहीं समझ में आता  वहा से पूछे,  ये नहीं की बिलकुल नहीं समझ में आया /
तीसरा सूत्र :- आप अपने दिन भर में हो रहे कार्यो यानि जो भी आप के साथ पूरे दिन में होता है अच्छा या ख़राब सही या गलत   आप  अपने माता या पिता या फिर दोनों से  बताए / इससे आपको जीवन में कभी शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा न आपको न आप के माता पिता को / ये आदत आज से ही डाल लीजिये शुरुआत में थोड़ी डाट पड़ेगी लेकिन आगे के सारे रास्ते साफ हो जायेंगे /
अगर आप नहीं बताते है तो क्या होगा जितना आप छुपाते जाते हो वो सब आपके पीछे इकठ्ठा होता जाता है और एक दिन वो इतना बड़ा हो जाता है और आप के पीछे खड़ा होता है पहाड़ ऐसा जिसे आप शायद न देख पाओ , लेकिन आपके अलावा सभी उसको देख रहे होते है और आप के साथ आपके परिवार को भी बुरा कहते है /
माँ समझती नहीं है पापा पुराने जमाने के है वो अनपड़ है उन्हे अक्ल ही नहीं है
ये शब्द भी हम ही यूज करते है जिन्होने हमे चलना सिखाया हमे बोलना सिखाया हमे सही और गलत में फर्क समझाया आज वो ही बेअक्ल हो गए जिन्होने हमे पड़ना सिखाया या पडने के लिए भेजा वो ही आज अनपद हो गए जिन्होने हमे समझदारी की बाते बताई वो ही न समझ हो गए / वहा प्रभु क्या है तेरी माया
लेकिन गलती कहा पर है सिर्फ जेनरेशन गैप बस इससे ज्यादा कुछ नहीं जो लगातार होता है आज आप के साथ है कल आपके बच्चो के साथ होगा / लेकिन इसका मतलब ये नहीं की हम अपने ही मम्मी पापा को गलत शब्द बोले अगर आज हम जैसा भी कर रहे है ये मान के चलिए की कल आपके साथ भी वैसा ही होगा ये आप सब भी जानते है जो साइंस पड़ते है वो अच्छे से जानते है न्यूटन का नियम किसी भी चीज़ को ऊपर उछालते ही वो अपने आप नीचे की और आ जाती है न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम यानि हम किसी को बुरा कह रहे है तो हमारे साथ भी कोई बुरा बोलेगा /
इसलिए अपने मम्मी पापा और अपने परिवार से बड कर कोई नहीं होता वही होते है वो जन्म से लेकर हमेशा हमारे साथ खडे होते है बाकि तो मतलब के साथी होते है /
चौथा और अंतिम सूत्र :- हमे अपने धर्म पर पूरा विश्वाश करना चाहिए फिर हमारा धर्म कुछ भी क्यों न हो हम हिन्दू हो  मुस्लिम हो सिख हो ईसाई हो , न ही दूसरो के धर्म की बुराई करनी चाहिए /
चालीस दिन मंदिर पैदल जाने से पांच रूपये का प्रसाद चढ़ाने  से या फिर मनौती मान लेने से कोई पास नहीं होता /
ईश्वर भी उसका साथ देते है जो कर्म करता है मेहनत करता है साथ ही अपने काम के प्रति ईमानदारी बरतता है / ईश्वर ये नहीं कहते की आप मेरी दो घंटे पूजा करो लेकिन लेकिन उस ईश्वर उस खुदा और उस वाहे गुरु को मानना भी जरुरी है आप सुबह उठे नामज़ पडे पूजा करे वाहे गुरु को याद करे या बाइबिल पडे या फिर प्रेयर करे लेकिन ये करे जरुर और फिर उस ईश्वर से कहे हमे हमारे काम में सहयोग करे , ताकि हम सफल हो सके फिर देखे की आप सफल कैसे नहीं होते है आप सब सफल हो ऐसी मैं भी ईश्वर  से कामना करता हु /
बस ये चार सूत्र आप अपने जीवन में उतर ले आप सफल हो ही जायेंगे / अब इसके अलावा भी अगर आप कुछ पूछना चाहते है तो पूछ सकते है अगर मेरे पास जवाब होगा तो मैं दूंगा नहीं तो बाद में दूंगा लेकिन गलत जवाब नहीं दूँगा मेरी ये आदत है /

Posted By KanpurpatrikaWednesday, February 19, 2014

Friday, January 3, 2014

खजाने की खोज में हम

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खजाने की खोज में हम !

आज के समय में प्रतेक व्यक्ति चाहे वो पैसे वाला हो या गरीब सभी परेशां है दुखी है क्यों, क्योंकि उनके जीवन में सब कुछ तो मिल रहा है लेकिन खुशिया नहीं मिल रही है / खुशिया तो खरीदी भी नहीं जा सकती है / न ही कोई खुशियों का भंडारा कर रहा है न ही कोई खुशियों का दान कर कर रहा है जो लाइन में खडे होकर हम खुशिया पा लेंगे / सभी भाग रहे है रणभूमि में जिस रणभूमि में सभी का लक्ष्य उस खजाने को पाने का है जिसके लिए सभी लड़ रहे है उस खजाने के लिए / कह भी रहे है सभी कि उस खजाने को पाने के बाद जीवन तृप्त हो जायेगा / लेकिन रन भूमि में उस खजाने को पाने के बाद भी सभी अतृप्त नज़र आ रहे है / जिसको खजाना मिल गया वो भी अतृप्त  है और जिसको नहीं मिला वो भी अतृप्त है / क्यों खजाना मिलने के बाद तो सब ठीक हो जाना चाहिए था लेकिन फिर भी हम वही कि वाही  ही खड़े है क्यों / क्योंकि खजाना तो खाली था जिस खजाने को हम देख रहे थे और जिसको लड़ कर हासिल किया वास्तव में वो खजाना मिलने के बाद तो हमे मालूम पड़ा कि वो खजाना तो कम था, पूरा खजाना तो हमे मिला ही नहीं / पूरा खजाना जिसमे धन हो, सम्मान हो, पद हो, ख़ुशी हो, लेकिन हमे तो एसा या ये सब तो मिला ही नहीं इनमे से कुछ ही तो मिल पाया अर्थात इतना लडने और दौडने के बाद भी हम हार गए जो चाहिए था वो तो मिला ही नहीं जिसके लिए दौड़ रहे थे, जिसको दूर से देखा वो तो ये था ही नहीं आखिर वो खजाना है कहा ?
उस पूरे खजाने कि तलाश तो वर्षो से चल रही है और हम सभी खोज रहे है दूर से देखने में तो वो पूरा ही लगता है लेकिन जैसे जैसे उसके पास जाते जाते है वो कम होता जाता है या उस खजाने से कुछ चीजे हमेशा कम हो जाती है / ऐसे खजाने कि खोज हमेशा होती रहेगी / एक ऐसा खजाना जो परिपूर्ण हो / वो परिपूर्ण खजाना कैसे प्राप्त होगा आखिर पूरे खजाने कि खोज कब समाप्त होगी क्या वो जमीन  के नीचे गडा है या असमान के ऊपर है वो कहा है जो वास्तव में परिपूर्ण है ?
परिपूर्ण खजाना तभी प्राप्त होता है जब हम खुशिया बाटे ख़ुशी तब बाट सकते है जब हम खुश हो क्या दान तभी दिया जा सकता है जब पैसे हो, क्या भंडारा तभी किया जा सकता है जब अनाज हो ,नहीं ऐसा नहीं है पैसा हो तभी दान देना चाहिए या तभी भंडारा करवाना चाहिए जब अनाज हो ये तो हम सोच रहे है कि हमारे पास कुछ नहीं है लेकिन मन होता है ऐसा भी करने का लेकिन ईश्वर ने हमे इतना नहीं दिया कि हम ये सब कर सके लेकिन क्या जो दिया, वो कर पा रहे है नहीं फिर देने के बाद क्या पता आप न करे ?
लेकिन कुछ न होने के बाद भी तो दान और भंडारा किया जा सकता है  भंडारा खुशियों का और दान शिक्षा का श्रम का दान अच्छे संस्कारो का, तो कर सकते है जो ईश्वर ने हमे दिया है लेकिन हम नहीं कर रहे है और जो नहीं है उसकी इच्छा कर रहे और वो आने के बाद फिर वही ईश्वर ने हमे ये नहीं दिया, दिया होता तो करता / ऐसे भंडारे और दान करने से ख़ुशी मिलती है ,वो ख़ुशी किसी खजाने से कम नहीं होती है इसके बाद आपका सम्मान बढेगा आपको कोई ख़राब नहीं कहेगा आपका समाज में पद होगा जो एक परिपूर्ण खजाना है / लोगो के देखने और सोचने का नजरिया बदल जायेगा / इन सब से जो ख़ुशी मिलेगी वो पैसे होने के पहले और पैसे होंने के बाद भी नहीं मिलेगी /
हमारे जीवन का लक्ष्य दान का हो कि हमे रोजाना दान करना है संस्कारो का शिक्षा का ,श्रम का और बाटनी है ढेर सारी खुशिया / आपके द्वारा किये गए ये कार्य और बाटी गई ये खुशिया आपके पास 10 गुनी रफ़्तार से और 100 गुना ज्यादा हो कर वापस आती हुई दिखाई देंगी / और आपको उड़ा के ले जाएँगी अपने साथ उस खजाने के पास जो खजाना आप बचपन में माँ कि गोद से लेकर माटी पर घुटने चलते हुए कर्म प्रधान बन कर दौडते ही उस रणभूमि मे लडते हुए ही खोज रहे थे / ये खजाना आपको जमीं के अन्दर खुदाई करने से नहीं मिलेगा / जमीं से ऊपर  और आकाश के नीचे सूर्य के उजाले में और चाँद कि दुधिया रौशनी में नहाता हुआ गंगा जल सा ठंडा और पवित्र मन और तन के साथ दिमाग को उड़ा कर ऐसे स्थान पर ले जाता है जहा आपके सामने सभी छोटे नज़र आते है, लेकिन इसके बाद भी सब आपको प्यार करते है और आप सब को प्यार करते है और आप खुश है आपके अन्दर घ्रणा ईर्ष्या घमंड कुछ भी नहीं होता है यहाँ तक कि आपके पास पैसा हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता है / लेकिन ये खजाना जो मिला है इसे कोई लूट न ले, ये बढता जाए और बढता जाय / वास्तव में ये जो खजाना मिला है ये कोई ले ही न पायेगा क्योंकि मैं खुद जितना खजाना बाटता जा रहा हु लुटा रहा हु ये ईश्वर उससे 100 गुना तेज़ी से और 1000 गुना ज्यादा वापस दे कर फिर से मुझे उड़ा  कर ले जा रहा है, मैं रो रहा हु मैं हस रहा हु मैं नाच रहा हु मैं मैं कहा हु  मैं जानना नहीं चाहता हु लेकिन शायद मैं उस ईश्वर के पास हु ये ही तो वो खजाना है जो खोजा जा रहा है लेकिन मिल नहीं रहा है मैं ये खजाना पा चूका हु और सबको दोनों हाथो से लुटा रहा हु खुशियों से नाच रहा हु रो रहा हु भाग रहा हु इधर उधर बाटता जा रहा हु फिर भी ये क्या ईश्वर मेरे ईश्वर हम सब के ईश्वर बता दे सबको कि मत दौड़ो इस दुनिया कि अंधी भीड़ में मत लड़ो सम्मान के लिए मत लड़ो भगवान के लिए मत लड़ो पैसो के लिए मस्त हो कर खुश हो कर खजाना बाटो क्योंकि खजाना जमीं के अन्दर खुदाई करने से सपने में आने से नहीं मिलता /
आज का इन्सान दिमागी रूप से बहूत ही अच्छा है इतना अच्छा कि बेहतर दिमाग के साथ तकनिकी का साथ हम पहले से ज्यादा सक्षम भी है / नए से नए  तकनिकी खोज रहे है हम नए नए अविष्कार कर रहे है चाँद से लेकर मंगल तक जाने कि बातो को सच कर रहे है हमारे पूर्वजो ने जो बाते हवा में या यु ही कह दी थी उन्हे हम सच्चाई के धरातल पर ले कर आ चुके है उनका देखा गया सपना सच कर के दिखा रहे है / आज क्या संभव नहीं है सभी सब कुछ लेकिन फिर भी तकनिकी रूप से इतना सुद्रण होने के बाद भी क्या अभी तक हम एक परिपूर्ण चारित्रिक और एक अच्छा इन्सान बना सके है नहीं क्यों ,क्या इतनी तकनिकी विकसित करने के बाद भी इतनी अविष्कारों के बाद भी हम लोगो के अन्दर से गन्दगी और बुरइयो को मिटा सके है नहीं ? उन सिसकियों को खुशियों में बदलने वाली मशीन बना पाय है जो बेआबरू कर दी गई है उस इन्सान को सही कर पायेंगे जिसने जिंदगी को बर्बाद कर दिया है नहीं ,क्या आज तक हम एक अच्छी सोच विकसित कर पाय है क्यों नहीं कर पाय है क्योंकि हम अभी भी उस झूठे खजाने कि दौड़ में दौड़ रहे है अंधे बन कर सब जानते हुए भी अनजान बन जाते है सब पता है हमे लेकिन अज्ञानता कि चादर ओड़ कर निकल पड़ते है / अपने दिमाग में ये घर कर बैठे है कि पैसा ही सब कुछ है हमारा शरीर हमारा जीवन किसके लिए है क्या पैसे के लिए है फिर शरीर के साथ पैसा और खुद शरीर इस धरती में क्यों रह जाता है सब माटी में क्यों मिल जाता है / जिन चीजों को  हम छु सकते है वो हमारे साथ नहीं रह जाती है और जिन चीजों को हम छु नहीं सकते, महसूस कर सकते है वो हमारे साथ हमेशा रहती है जिंदगी के साथ भी और जिन्दगी न होने के बाद भी खजाना जो ईश्वर हमे देता है खोज जो ईश्वर तक ले जाती है वो ज्ञान जो अध्यात्मिक है वो तकनिकी जो अच्छे  दिमाग विकसित कर सके वो अविष्कार जो अच्छे और बुरे चरित्र को खोज सके / किसी के साथ बुरा न हो कोई बेआबरू न हो चारो और खुशिया हो चारो और लोग उस खुशियों के खजाने को लूट रहे हो आपस में बाट  रहे हो प्यार खुशिया , सोचिये क्या नजारा होगा जब सब ओर खुशिया ही खुशिया होंगी किसी चेहरे पर परेशानी न हो सब मुस्करा रहे हो सुबह से लेकर शाम तक सब मुस्करा रहे  हो और सोते समय भी हसते रहे, उठे भी तो मुस्कराते हुए / चारो और खुशिया ही खुशिया कोई  समस्या नहो कोई परेशानी न हो / सब लोग लूट लो उस खजाने जो लूटा जा रहा है सालो से लेकिन कोई लूट न पाया /




आओ खोजे ऐसा खजाना लूट जाये, तो भी बढता जाये,
जिसके लिए कोई लडे, न मरे, न डरे,
बस लूटे और लुटाये, खजाना फिर भी बढता जाये,
खुशिया हो, त्याग हो, प्यार हो, सम्मान हो,
न हो ईर्ष्या, न हो घ्रणा, न हो बुराई,
हो ऐसी तकनिकी जिससे अच्छा इन्सान बन जाये,
आओ खोजे ऐसा खजाना जहा ईश्वर और इन्सान मिल जाये /
आओ खोजे ऐसा खजाना लूट जाये, तो भी बढता जाये,
ये लेख ईश्वर और इन्सान पत्रिका से लिया गया है जिसके सर्वेअधिकार सुरक्षित है /  
Written By :- 
Pandit Aasheesh Tripathi
 Jyotish Aacharya

Posted By KanpurpatrikaFriday, January 03, 2014

Tuesday, September 10, 2013

क्यों पूज्यनीय है गणपति प्रथम ?

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क्यों पूज्यनीय है गणपति प्रथम ?
भगवान गणेश सनातनधर्म में प्रथम पूज्यनीय बताय गय है हम सभी अपने सभी शुभ कार्यो से पहले भगवान  गणेश का पूजन करते है पुराणों में इस सम्बन्ध में कई कथाएई वर्णित है जिनमे से एक है कुछ इस प्रकार :-  
पुराणों में गणेश को शिव-शक्ति का पुत्र बताया गया है। शिवपुराण की कथा में है कि माता पार्वती ने अपनी देह की उबटन से एक पुतले का निर्माण किया और उसमें प्राण फूंककर अपना पुत्र बना दिया। इस पुत्र के हाथ में एक छड़ी जैसा अस्त्र देकर मां ने उसे अपना द्वारपाल बना दिया।

उनकी आज्ञा का पालन करते हुए बालक ने भगवान शंकर को घर में प्रवेश नहीं करने दिया। तब शिवजी ने अपने त्रिशूल से उसका मस्तक काट दिया। बाद में बालक गजमुख हो गया।

पुत्र की दुर्दशा से क्रुद्ध जगदंबा को शांत करने के लिए जब देवगणों ने प्रार्थना की,तब माता पार्वती ने कहा-ऐसा तभी संभव है,जब मेरे पुत्र को समस्त देवताओं के मध्य पूज्यनीय माना जाए।

शिव जी ने उन्हें वरदान दिया-जो तुम्हारी पूजा करेगा,उसके सारे कार्य सिद्ध होंगे।ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने कहा-पहले गणेश की पूजा करें,तत्पश्चात् ही हमारा पूजन करें।इस प्रकार गणेश बन गएगणाध्यक्षगणपतिका मतलब भी है देवताओं में सर्वोपरि।
मेरा कहना है कि जो भी कथाए  प्रचिलित है या जो भी जिस भी कथा पर विश्वास करता  है वो बहस का मुद्दा न होकर मुद्दा ये होना चाहिए  कि सभी कथाओ  से हमे  क्या शिक्षा मिलती है कि हमे पुराणों में लिखी गई बात से सन्देश क्या मिलता है हम सालो से सिर्फ यही तो करते आ रहे है  गणेश को ही प्रतेक शुभ कर्म के पहले पूजते है फिर सभी देवी देवताओ  कि पूजा , क्यों क्या कभी सोचा  नहीं क्योंकि सालो से जो हुआ  पड़ा जो देखा  वही किया न कि अपना  दिमाग प्रयोग किया ?
भगवान गणेश समाज के एक ऐसे  चरित्र को प्रदर्शित करते है जो विकृत है जो शारीरिक रूप से विकृत है/ वो (इन्सान ) जिसको इस प्रथ्वी में  श्रष्टि के रचियता ने विकृत बना दिया आधुनिक युग कि बात करे तो हारमोंस और गुण सूत्रों   के कारण कोई बच्चा विकृत पैदा हो जाता है / भगवान शिव और माँ पार्वती ने समाज को गणेश रूप में ये सन्देश दिया कि जो समाज में शारीरिक रूप से विकृत है उसे पूजे यानि  अपने सभी शुभ कार्यो में उसे पहले पूछे / उसको बार बार यह अहसास न दे  कि वो विकृत है वो सबके जैसा नहीं है उसको दुःख पहुचेगा आपके शुभ कार्यो में जब सभी घर के सदस्य खुश होंगे तो घर का ही एक सदस्य दुखी होगा जो शारीरिक रूप से विकृत होगा क्या यह ख़ुशी पुरे  परिवार कि ख़ुशी होगी नहीं यह आप खुद जानते है /क्या उसे जिसके लिए वो खुद जिम्मेदार नहीं है उसकी सजा उसको जीवन भर आप सभी कामो में पीछे कर के देते रहेंगे और आपकी सभी खुशिया अधूरी रह जाएँगी /अगर अपने उस विकृत भाई बहन बेटी या बेटे को हम अपने  सभी कामो में पहले पूछते है को उसका मन अंदर से ज्याद ख़ुशी महसूस करेगा और उसके दिल से अपने घर के लिए भी अच्छी प्राथना ही निकलेगी न कि दुखी मन से अच्छी प्राथना नहीं निकलेगी / लेकिन उसको जो विकृत है शारीर से उसको अगर हम अपनी खुशियों में बराबर का हिस्सा देते है तो हम हमेशा खुश रहेंगे / वो खुशिया हमे आगे  बढने  में मदद करेंगे /
एक सवाल यह भी है कि भगवान गणेश और उनकी सवारी मूषक से लोग  हजारो मुरादे मांगते है कि मेरा ये काम हो जाय आदि आदि /लेकिन अगर गणपति अगर अपने वास्तविक स्वरुप में खुद उनके घर में पुत्र रूप में जन्म ले ले तो उन्हे हम कितने दिन प्यार करेंगे या पूजेंगे  एक दिन दो दिन या फिर एक माह शायद इससे ज्यादा नहीं फिर वो हमारे लिए बोझ हो जायेंगे / उनको तब कोई पसंद नहीं करेगा सभी हसेंगे / और कितनी ही लडकिया उनसे शादी के लिए तैयार हो जाएँगी एक भी नहीं / अरे जब गणपति आपके साथ है तब आपको बोझ लगने लगते है आप  उन्हे पसंद नहीं करते है और जब गणपति नहीं होते है वो मूर्ति के रूप में होते है तो हम पत्थर को पूजते है प्रसाद चडाते है वहा प्रभु  तेरी माया ! गणपति यानि अगर घर में कोई लड़का या लड़की विकृत रूप में पैदा होता या होती है तो उसे स्वीकार करना हमे कठिन हो जाता है /
 भगवान को मंदिरों में ढूँढने वाले भक्त भगवान भगवान हमारे आस पास ही है बस नजरे तो खोलो अन्धो के पीछे आँख में पट्टी बांध कर मत चलो /इस समाज में एक विकृत रूप है जो न पुरुष है और न जो स्त्री है जो किन्नर है जो हिजड़ा है उसे  समाज में क्या दर्ज़ा प्राप्त है सभी जानते है लेकिन हमारे  सभी शुभ कार्यो में वो आते है और हमें आशीर्वाद  दे कर जाते है   जो समाज  में विकृत है शारीरिक  रूप से /और समाज के मानसिक रूप से /इन किन्नरों कि दुआ सच होती है और बददुआ भी  /
सिर्फ भारत में ही हजारो कि संख्या में संत और धर्मगुरु प्रवचन  देते है और न जाने कितने टी वी  चैनल में पत्र पत्रिकाओ में फिर भी लोगो में अज्ञान फैला हुआ है क्यों क्या सही ज्ञान नहीं दिया जा रहा है शायद इसलिए /
इस बात को इसे भी समझा जा सकता है कि हम बचपन से लेकर बुडापे  तक नाई  कि दुकान पर जाते है बाल कटवाते है फिर बदते है फिर कटवाते है फिर ये क्रम चलता रहता है और नाई कि दुकान भी चलती रहती है न ही हम ये पूछते है कि कोई उपाय जो बाल बडे ही न नहीं वो बताता है , वो बताता इसलिए नहीं है कि उसको पता नहीं होता है और हमारे द्वारा किया गया प्रशन मूर्खो कि श्रेणी में आ जाता है /
हम अगर ईश्वर  है कि नहीं है ये पूछे धर्म  गुरु से तो वो मुर्ख अज्ञानी बताते है और शायद उन्हे  भी नहीं पता कि भगवान है कि नहीं ...............इसलिए ही  गणपति प्रथम  पूजनीय है  /

Posted By KanpurpatrikaTuesday, September 10, 2013