Thursday, August 18, 2011

जाने अन्ना के बारे में


जाने अन्ना के बारे में

आरंभिक जीवन

अन्ना हजारे का जन्म 15 जून, 1938 को महाराष्ट्र">महाराष्ट्र के अहमद नगर (पृष्ठ मौजूद नहीं है)">अहमद नगर के भिंगारी गांव के एक किसान परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम बाबूराव हज़ारे और मां का नाम लक्ष्मीबाई हजारे है। [1] उनका बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे। दादा फौज में। दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी। वैसे अन्ना के पुरखों का गांव अहमद नगर जिले में ही स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के छह भाई हैं। परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया।

व्यवसाय

वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद सरकार की युवाओं से सेना में शामिल होने की अपील पर अन्ना 1963 में सेना की मराठा रेजीमेंट में ड्राइवर के रूप में भर्ती हो गए। उनका पहला पदस्थापन पंजाब में हुआ। 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अन्ना हज़ारे खेमकरण सीमा पर तैनात थे। 12 नवंबर 1965 को चौकी पर पाकिस्तानी हवाई बमबारी में वहां तैनात सारे सैनिक मारे गए।[2] इस घटना ने अन्ना की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। इसके बाद उन्होंने सेना में १३ और वर्षों तक काम किया। उनका पदस्थापन मुंबई और कश्मीर में भी हुआ। १९७५ में जम्मू पदस्थापन के दौरान सेना में सेवा के १५ वर्ष पूरे होने पर उन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली। वे पास के रालेगांव सिद्धि में रहने लगे और इसी को अपनी सामाजिक कर्मस्थली बना लिया।

सामाजिक कार्य

१९६५ के युद्ध में मौत से साक्षात्कार के बाद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उन्होंने विवेकानंद की एक बुकलेट 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' देखा और खरीद लिया। इसे पढ़कर उनके मन में भी अपना जीवन समाज को समर्पित करने की इच्छा बलवती हो गई। उन्होंने गांधी और विनोबा की भी पुस्तकें पढ़ी। 1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर स्वयं को सामाजिक कार्यों के लिए पूर्णतः समर्पित कर देने का संकल्प कर लिया।

रालेगांव सिद्धि

मुम्बई पदस्थापन के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे। वे वहाँ चट्टान पर बैठकर गांव को सुधारने की बात सोचा करते थे। १९७५ में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर रालेगाँव आकर उन्होंने अपना सामाजिक कार्य प्रारंभ कर दिया। इस गांव में बिजली और पानी की ज़बरदस्त कमी थी। अन्ना ने गांव वालों को नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए प्रेरित किया और ख़ुद भी इसमें योगदान दिया। अन्ना के कहने पर गांव में जगह-जगह पेड़ लगाए गए। गांव में सौर ऊर्जा और गोबर गैस के जरिए बिजली की सप्लाई की गई।[3] उन्होंने अपनी ज़मीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी और अपनी पेंशन का सारा पैसा गांव के विकास के लिए समर्पित कर दिया। वे गांव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं। आज गांव का हर शख्स आत्मनिर्भर है। आस-पड़ोस के गांवों के लिए भी यहां से चारा, दूध आदि जाता है। गांव में एक तरह का राम राज है।

महाराष्ट्र भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन १९९१

१९९१ में अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की सरकार के कुछ 'भ्रष्ट' मंत्रियों को हटाए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की। ये मंत्री थे- शशिकांत सुतर, महादेव शिवांकर और बबन घोलाप। अन्ना ने उन पर आय से ज़्यादा संपत्ति रखने का आरोप लगाया था। सरकार ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन उसे हारकर दो मंत्रियों सुतर और शिवांकर को हटाना ही पड़ा।[4] घोलाप ने अन्ना के खिलाफ़ मानहानि का मुकदमा कर दिया। अन्ना अपने आरोप के समर्थन में न्यायालय में कोई सबूत पेश नहीं कर पाए और उन्हें तीन महीने की जेल हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने उन्हें एक दिन की हिरासत के बाद छोड़ दिया। एक जाँच आयोग ने शशिकांत सुतर और महादेव शिवांकर को निर्दोष बताया। लेकिन अन्ना हज़ारे ने कई शिवसेना और भाजपा नेताओं पर भी भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए।

सूचना का अधिकार आंदोलन १९९७-२००५

1997 में अन्ना हज़ारे ने सूचना के अधिकार क़ानून के समर्थन में मुंबई के आजाद मैदान से अपना अभियान शुरु किया। 9 अगस्त, 2003 को मुंबई के आजाद मैदान में ही अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठ गए। 12 दिन तक चले आमरण अनशन के दौरान अन्ना हजारे और सूचना के अधिकार आंदोलन को देशव्यापी समर्थन मिला। आख़िरकार 2003 में ही महाराष्ट्र सरकार को इस क़ानून के एक मज़बूत और कड़े मसौदे को पास करना पड़ा। बाद में इसी आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले लिया। इसके परिणामस्वरूप 12 अक्टूबर 2005 को भारतीय संसद ने भी सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया। [5] अगस्त, 2006 में सूचना के अधिकार में संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ अन्ना ने 11 दिन तक आमरण अनशन किया, जिसे देशभर में समर्थन मिला। इसके परिणामस्वरूप , सरकार ने संशोधन का इरादा बदल दिया।

महाराष्ट्र भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन २००३

2003 में अन्ना ने कांग्रेस और एनसीपी सरकार के चार मंत्रियों-सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक, विजय कुमार गावित और पद्मसिंह पाटिल को भ्रष्ट बताकर उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी और भूख हड़ताल पर बैठ गए। तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने इसके बाद एक जांच आयोग का गठन किया। नवाब मलिक ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। आयोग ने जब सुरेश जैन के ख़िलाफ़ आरोप तय किए तो उन्हें भी त्यागपत्र देना पड़ा। [6]

लोकपाल विधेयक आंदोलन २०११

देखें मुख्य लेख जन लोकपाल विधेयक आंदोलन" class="mw-redirect">जन लोकपाल विधेयक आंदोलन जन लोकपाल विधेयक">जन लोकपाल विधेयक (नागरिक लोकपाल विधेयक) के निर्माण के लिए जारी यह आंदोलन अपने अखिल भारतीय स्वरूप में ५ अप्रैल २०११ को समाजसेवी अन्ना हजारे" class="mw-redirect">अन्ना हजारे एवं उनके साथियों के जंतर मंतर, दिल्ली">जंतर-मंतर पर शुरु किए गए अनशन के साथ आरंभ हुआ, जिनमें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल">अरविंद केजरीवाल, भारत की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी किरण बेदी">किरण बेदी, प्रसिद्ध लोकधर्मी वकील प्रशांत भूषण (पृष्ठ मौजूद नहीं है)">प्रशांत भूषण, पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट">पतंजलि योगपीठ के संस्थापक बाबा रामदेव" class="mw-redirect">बाबा रामदेव आदि शामिल थे। संचार साधनों के प्रभाव के कारण इस अनशन का प्रभाव समूचे भारत में फैल गया और इसके समर्थन में लोग सड़कों पर भी उतरने लगे। इन्होंने भारत सरकार">भारत सरकार से एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक बनाने की माँग की थी और अपनी माँग के अनुरूप सरकार को लोकपाल बिल का एक मसौदा भी दिया था। किंतु मनमोहन सिंह">मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने इसके प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया और इसकी उपेक्षा की। इसके परिणामस्वरूप शुरु हुए अनशन के प्रति भी उनका रवैया उपेक्षा पूर्ण ही रहा। किंतु इस अनशन के आंदोलन का रूप लेने पर भारत सरकार ने आनन-फानन में एक समिति बनाकर संभावित खतरे को टाला और १६ अगस्त तक संसद" class="mw-redirect">संसद में लोकपाल विधेयक पास कराने की बात स्वीकार कर ली। अगस्त से शुरु हुए मानसून सत्र में सरकार ने जो विधेयक प्रस्तुत किया वह कमजोर और जन लोकपाल के सर्वथा विपरीत था। अन्ना हजारे ने इसके खिलाफ अपने पूर्व घोषित तिथि १६ अगस्त से पुनः अनशन पर जाने की बात दुहराई। १६ अगस्त को सुबह साढ़े सात बजे जब वे अनशन पर जाने के लिए तैयारी कर रहे थे, उन्हें दिल्ली पुलिस ने उन्हें घर से ही गिरफ्तार कर लिया। उनके टीम के अन्य लोग भी गिरफ्तार कर लिए गए। इस खबर ने आम जनता को उद्वेलित कर दिया और वह सड़कों पर उतरकर सरकार के इस कदम का अहिंसात्मक प्रतिरोध करने लगी। दिल्ली पुलिस ने अन्ना को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। अन्ना ने रिहा किए जाने पर दिल्ली से बाहर रालेगाँव चले जाने या ३ दिन तक अनशन करने की बात अस्वीकार कर दी। उन्हें ७ दिनों के न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। शाम तक देशव्यापी प्रदर्शनों की खबर ने सरकार को अपना कदम वापस खींचने पर मजबूर कर दिया। दिल्ली पुलिस ने अन्ना को सशर्त रिहा करने का आदेश जारी किया। मगर अन्ना अनशन जारी रखने पर दृढ़ थे। बिना किसी शर्त के अनशन करने की अनुमति तक उन्होंने रिहा होने से इनकार कर दिया। 17 जुला तक देश में अन्ना के समर्थन में प्रदर्शन होता रहा। दिल्ली में तिहाड़ जेल के बाहर हजारों लोग डेरा डाले रहे। 17 अगस्त की शाम तक दिल्ली पुलिस रामलीला मैदान में और 7 दिनों तक अनशन करने की इजाजत देने को तैयार हुई। मगर अनशन ने 30 दिनों से कम अनशन करने की अनुमति लेने से मना कर दिया. उन्होंने जेल में ही अपना अनशन जारी रखा। अन्ना को राम्लीला मैदान मै १५ दिन कि अनुमति मिलि

व्यक्तित्व और विचारधारा

गांधी की विरासत उनकी थाथी है। कद-काठी में वह साधारण ही हैं। सिर पर गांधी टोपी और बदन पर खादी है। आंखों पर मोटा चश्मा है, लेकिन उनको दूर तक दिखता है। इरादे फौलादी और अटल हैं। महात्मा गांधी के बाद अन्ना हजारे ने ही भूख हड़ताल और आमरण अनशन को सबसे ज्यादा बार बतौर हथियार इस्तेमाल किया है। इसके जरिए उन्होंने भ्रष्ट प्रशासन को पद छोड़ने एवं सरकारों को जनहितकारी कानून बनाने पर मजबूर किया है।

अन्ना हजारे गांधीजी के ग्राम स्वराज्य को भारत के गाँवों की समृद्धि का माध्यम मानते हैं। उनका मानना है कि ' बलशाली भारत के लिए गाँवों को अपने पैरों पर खड़ा करना होगा।' उनके अनुसार विकास का लाभ समान रूप से वितरित न हो पाने का कारण रहा गाँवों को केन्द्र में न रखना.

व्यक्ति निर्माण से ग्राम निर्माण और तब स्वाभाविक ही देश निर्माण के गांधीजी के मन्त्र को उन्होंने हकीकत में उतार कर दिखाया, और एक गाँव से आरम्भ उनका यह अभियान आज 85 गावों तक सफलतापूर्वक जारी है। व्यक्ति निर्माण के लिए मूल मन्त्र देते हुए उन्होंने युवाओं में उत्तम चरित्र, शुद्ध आचार-विचार, निष्कलंक जीवन व त्याग की भावना विकसित करने व निर्भयता को आत्मसात कर आम आदमी की सेवा को आदर्श के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया है।

सम्मान

सौरसे :-http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%८७

Posted By KanpurpatrikaThursday, August 18, 2011

अन्ना के इस आन्दोलन में भी भ्रष्टाचार !



अन्ना के इस आन्दोलन में भी भ्रष्टाचार !

अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अनशन ने इतना असर किया की हर कोई अन्ना माय ही हो गया .. हर तरफ हर ओर बस एक ही नारा सुने पड़ रहा है " अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है " क्या बच्चा क्या बुड्डा सभी एक स्वर में नज़र आए ये दिवाली और ईद के त्यौहार से भी इतर आया सिक्ख भियो के गुरुगोबिंद सिंह जी के जन्म दिवस से अलग और इसी भियो के बड़े दिन से भी बड़ा .. आखिर ये अन्ना है कौन क्या कोई पूरी तरह से जनता है इनको ? शायद सभी नहीं जानते और शायद जानना भी नहीं चाहते क्योंकि वो बस इतना जानते है की अन्ना ने भ्रष्टाचार को मिटाने का बीड़ा उठाया है जो सही है इसमे उनका कोई स्वार्थ नहीं है ... लेकिन सबसे पहले जानते है की अन्ना है कौन ? और कहा से वो ताल्लुक रखते है ..
अन्ना का पूरा नाम किसन बाबूराव हज़ारे (जन्म 15 जनवरी, 1940), भारत के प्रसिद्ध गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। अधिकांश लोग उन्हें 'अण्णा हजारे' के नाम से ही जानते हैं। सन् १९९२ में उन्हे पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।सूचना का अधिकार लिये कार्य करने वालों में वे प्रमुख थे। साफ-सुथरी छबि वाले हजारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये प्रसिद्ध हैं। जान लोकपाल विधेयक पारित कराने के लिये उन्होने आमरण अनशन आरम्भ किया जिसे अपार समर्थन मिला जिससे घबराकर सरकार को उनकी मांगे मानने को विवश हुई।

लेकिन अन्ना हजारे के बारे में इतना जानने के बाद भी लोग क्या उनके इस अनशन में भ्रष्टाचार को बढावा नहीं दे रहे है ! बेशक अन्ना के इस आन्दोलन में भर्ष्टाचार की बू आ रही है मैने कानपुर समेत कई शरो में देखा और सुना की लोग किस तरह अन्ना का समर्थन अपने निजी स्वार्थ के लिए कर रहे है ये भर्ष्टाचार नहीं तो क्या है आज भारत में भर्ष्टाचार इस कदर बाद चुका है की मानसिकता में ही रच बस गया है .. एक स्कूल में बच्चो को होमावोर्क दिया जाता है और उन्हे याद करवाया जाता है की काळ जब आप लोग स्कूल आयेंगे .. और आपके सामने कैमरे दिखाई दे और आप से कोई पूछे की आप ये क्योँ कर रहे तो आप सभी ये कहना की हम अन्ना के साथ है अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है दूसरा रत्ता की की जब ये पूछा जाय की अन्ना क्या कर रहे है तो बताना की वो अनशन कर रहे है भ्रष्टाचार से लडने की लिए है .. कोई दो घंटे तक टेंट और तम्बू लगत है और नारे बजी करता है और जसे ही मीडिया अपना काम कर के जाती है सभी गायब हो जाते है एसा क्यों क्या सिर्फ अगले दिन संचार और न्यूज़ पेपर में पानी तशवीर और नाम देखने के लिए ही इतना सब शर्म करो भारतवाशियों जो इन्सान पाना सब कुछ छोड़ कर भारत के लिए कर रहा है उस इन्सान के इस आन्दोलन में भी भ्रष्टाचार ! नहीं करना तो मत करो अगर करना है तो पूरी तरह से ईमानदारी से करो !
एक और तो आम जनता कुछ जानती नहीं है दूसरी और सरकार को कोसती है उसके लिए जिसकी गलती जनता ने खुद की है गलत सरकार चुन कर और फिर जब कुछ करने की बरी आती है तो कहती है हमे क्या करना कौन आगे जय कोई साथ दे तो हम भी खडे हो जायेंगे .. लेकिन जब भारत का एक ७५ वर्षीय बुजुर्ग अपनी परवाह किये बैगैर खड़ा होता है की मैं बदलूँगा भारत की और उसके साथ अरविन्द केजरीवाल किरण बेदी , प्रशांत भूषण और स्वामी अग्निवेश और इनके पीछे भी न जाने कितने निस्वार्थ भाव से युवा खडे है लेकिन कुछ भारतीय अपनी फोटो और इस बहाने अपनी संस्था का नाम पेपर में छपवाने के लिए ही इस आन्दोलन को भी भ्रष्टाचार युक्त बना रहे है इसे लोगो से मेरा विनर्म अनुरोध है कृपया आप लोग इस पुण्य कार्य को गन्दा न करे ..


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ASHISH TRIPATHI
KANPUR
UTTER PRADESH
09307950278

Posted By KanpurpatrikaThursday, August 18, 2011

Monday, July 25, 2011

बे -औलाद



बे -औलाद
औलाद होना ज्यादा अच्छा होता है या बे औलाद होना ?ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब हर इन्सान औलाद होना ज्यादा अच्छा होना बताता है .क्योंकि कोई कहता है जिसके घर में औलाद नहीं उसकी वंश वृद्धी ही नहीं होती है या उसके पास कुछ नहीं ,...
समाज और परिवार वाले भी कहते है की संतान सुख भी बड़े किस्मत वालो को मिलता है और संतान के चक्कर में न जाने कितने लोग नीम हाकिम और बाबाओ के यहाँ चक्कर लगाते रहते है ...और अपना सब कुछ लूटने को आतुर रहते है और न जाने कितने लुटा भी चुकते है ...
क्या औलाद होने में ज्यादा सुख है या फिर बे औलाद होने पर मेरे हिसाब से आज की परिस्थित देख कर यही कहा जायेगा की बेऔलाद होना ही सबसे अच्छा है ...लेकिन मेरे हिसाब से दोनों के खुशी और गम के पल लगभग बराबर है या यु कहे की अगर तराजू से बेऔलाद स्त्री और एक औलाद वाली स्त्री के दुःख और सुख को तौला जाय तो लगभग बराबर ही निकलेंगे .. इस पर आप लोगो को आश्चर्य भी होगा लेकिन जैसे कैसे मेरा लेख पड़ते जायेंगे वैसे वैसे आपको समझ आता जायेगा की मेराकहानी का अर्थ क्या है /..
सबसे पहले बात करते है जिनके की संतान है या फिर ये भी कह सकते है की जिन्हे माँ बाप कहने का गौरव् प्राप्त है .." गौरव " बड़ा ही अच्छा शब्द है ये जब लोग कहते है ...लेकिन यही शब्द की " माँ बाप कहने का गौरव् प्राप्त है" एक दिन श्राप के सामान लगने लगता है ...कैसे मैं ये अंत में बताऊंगा ...
जब एक स्त्री को ये मालूम पड़ता है की वो माँ बनाने वाली है तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता है ..और साथ ही परिवार वालो का भी सभी उस खुशी के आने का इंतज़ार करने लगते है .... और जो स्त्री माँ बनाने जा रही होती है उसको इन दिनों काफी तकलीफों और समस्याओ का सामना करना पड़ता है ..और जब बच्चे का जन्म होता है तब भी माँ को तकलीफों का सामना करना पड़ता है ..और ये पीड़ा कुछ ऐसी होती है की हर स्त्री इस पीड़ा का आभास करना चाहती है ..और जो नहीं कर पाती उन्हे इस समाज में बेऔलाद कहा जाता है ..और उन्हे लगता भी है की उनके साथ ही ऐसा क्योँ हुआ जो वो माँ नहीं बन पाई ..
और दूसरी ओर जो स्त्री माँ बन जाती है पीड़ा सहने के बाद उसको बच्चे के जन्म के बाद भी तकलीफों का सामना करना पड़ता है दिन रात जग कर माँ उसका पालन पोषण करती है इसमे भी उसको तकलीफ होती है लेकिन फिर भी वो इस तकलीफ में भी सुख का अनुभव करती है ..
बच्चा धीरे धीरे बड़ा होता जाता है और माँ उसके लिए नए नए सपने बुनने लगती है .. की मैं अपने बच्चेके लिए ये करुँगी या फिर वो करुँगी ..लाखो सपने सालो तक बुनती है माँ ..और क्या सभी माताओ के बुने हुए और देखे गय सपने पूरे होते है जवाब नहीं ही होगा क्योंकि माँ तो १०० में एक या दो ही कुमाता हो सकती है लेकिन कपूत की संख्या का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है और माँ का कुमाता होना उसकी मजबूरी होती है नही तो माँ कभी भी कुमाता न हो ..और माँ के द्वारा देखे गय सपने अक्सर टूट ही जाते है टूटे भी ऐसे है की उनका आता पता तक नहीं चलता है ....और उस समय एक माँ शायद यही सोचती होगी की मैं बे-औलाद होती तो शायद बढ़िया ही होता कम से कम सुकून तो होता की मैं अकेली हु और अकेली ही रहूंगी लेकिन ये अकेलापन और ये तिरिस्कार औलाद होने के बाद बर्दास्त करना मुश्किल होता है ...और माँ अक्सर अकेले में बैठ कर यही सोचती है की न जाने कितने सपने हम रात भर उसको चुप करा कर देखा करते थे न जाने कितनी खुशिया उस समय महसूस होती थी जब गर्भ में रह कर वो अटखेलिया किया करता था लेकिन क्या मालूम था की आज वो बड़ा होकर इस तरह की हरकते भी करेगा ....आज उसने मुझे ही मेरे घर से निकाल दिया .. न जाने कितनी बार मैं खुद भूखी रह कर उसको खाना पहले खिला देती थी न जाने कितनी राते खुद जाग कर उसको सुला देती थी लेकिन आज भी रात में जाग रही हु और आज भी भूखी हु लेकिन उस भूखे रहने में उस अनिद्रा में सुख था उससे ज्यादा आज दुःख है ..
और दूसरी ओर उस असहाय और रोटी , भूखी माँ को खाना देने के बाद वो बे-औलाद स्त्री यही सोचती है की आज अच्छा हुआ मेरे कोई संतान नहीं है औलाद होने के बाद जो सुख मिलता है उससे ज्यादा दुःख तब होता है जब वो साथ नहीं देते जिस समय हमे उनकी सबसे ज्यादा जरुरत होती है / क्या इसका मतलब था की भगवान मुझे हमेशा खुशदेखना चाहता था क्या .../ क्या औलाद होने के बाद मैं खुश होती और जब उस तरह ही जिस तरह पौधे को सीचने के बाद जब वो पेड़ और वृक्ष बनकर फल और छाव देने की बारी आती तभी मुझे किनारे कर देता ..और वो दुःख ज्यादा असहनीय हो जाता .. न जाने कहा रखा जाता मुझे कभी सडको के किनारे कभी वृद्धाश्रम में नहीं मैं बे औलाद ही ठीक हु/
..
चार दिन की चांदनी और फिर अँधेरी रात इसका मतलब लगाना ही मुस्किल है क्योंकि जब असल में माँ और पिता को अपनी संतान की सबसे ज्यादा जरुरत होती है उस वक्त ही संतान उससे किनारा कर लेती है तो उस समय कष्ट तो होगा ही .. जब पिता और माता क़र्ज़ लेकर उसे अच्छी शिक्षा दिलाते है और बड़ा आदमी बनाते है और वो बड़ा साहब बनने के बाद अपने साथ काम करने वाले लोगो से अपने माता पिता को नहीं मिलाता है क्योँ क्योंकि उसे शर्म आती है उनके रहन सहन और सोचने के तरीके पर क्या उस समय कष्ट नहीं होता है उन माँ बाप को ? क्या नहीं करते है माँ बाप अपने बच्चो की खुशी के लिए उनकी खुशी और उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए वक्त पडने पर अपने आप को गिरवी तक रखने की सोच लेते है और वही संतान या बच्चा बड़े होने पर ये कहे की आप ने किया ही क्या है मेरे लिए तब ? और ये कहे की ये तो आपका फ़र्ज़ था पैदा किया था तो ये तो करना ही था ...इस तरह के अल्फाजो से माँ बाप का दिल इतना छलनी होता है उनके मन से यही आवाज़ निकलती है की क्या इस दिन के लिए ही इतना बड़ा किया था अगर हमारा ये फ़र्ज़ था तो तुम्हारा कोई फ़र्ज़ नहीं बनता है रातो रात जागकर सुलाया है तुम्हे अपनी तकलीफों को भुला कर तुम्हारी तकलीफों को महसूस किया और दूर किया क्या ये मेरा फ़र्ज़ था क्या मैं खुद भूखी रह कर तुम्हे खाना दिया क्या ये मेरा फ़र्ज़ था .. हा शायद ये ही मेरा फ़र्ज़ था क्योंकि इस दुनिया में माँ और पिता की ममता ही एक ऐसी चीज़ होती है जो बदले की भावना से काम नहीं करती है की मैं ऐसा करूँगा तो ऐसा होगा ..
और फिर एक माँ दुखी होकर फिर यही सोचती है की मैं निसंतान होती तो ज्यादा अच्छा रहता अपना सब कुछ बेचकर आज बच्चो को दिया और बच्चे आज हमे फ़र्ज़ का पाठ पड़ा रहे है हे ...
ये एक सच्ची घटना है की एक मजबूर आदमी गाव से शहर आता है पैसा कमाने के लिए रात दिन मेहनत करता है और पैसे जोड़ता है पता है क्योँ गाव में उसकी पत्नी माँ बनाने वाली है मेरी एक दिन यु ही उस इन्सान से मुलाकात होती है और उस दिन वो रिक्शा चला रहा था मैने रिक्शा तय किया और चलने को कहा और उसके बताय गय दाम पर तैयार भी हो गया लेकिन चलते चलते उसने मुझेसे कहा की बाबु मैं कल गाव जा रहा हु घर में लड़का हुआ है मैने कहा अच्छा बड़ी खुशी की बात है फिर उसने कहा की ये मेरा पाचवां बच्चा है तो मुझे हसी के साथ आश्चर्य भी हुआ की ये रिक्शा वाला कितने पैसे काम लेगा जो 5 - 5 बच्चो का पालन पोषण कर लेगा न ही उन्हे सही शिक्षा मिलेगी नहीं ही सही तरीके का रहन सहन .और 5व बच्चा होने के बाद भी उसके चेहरे पर उतनी ही खुशी जैसे इसका ये पहला बच्चा हो .. तभी वो रिक्शा वाला बोला बाबु जी जानते है की ये मेरा पहला बच्चा है जो एक हफ्ते तक आराम से है नहीं तो सभी बच्चे मारे हुए ही पैदा हुए है अब मैं पहले से ज्यादा आश्चर्य चकित था उसका दुःख साफ नज़र आ रह था मुझे ! तभी उसने कहा की साहब ये पाचवां बच्चा है और भगवन ने इसे सही सलामत दिया है और कल मैं गाव जा रहा हु अगर आप अपनी मर्ज़ी से किराय के अलावा कुछ और दे दे तो मेहरबानी होगी मैं एक दुकान में नौकरी करता हु और कल से दुकान में काम करने के बाद रिक्शा भी चला रहा हु की कुछ ज्यादा पैसे जोड़ लू .. अपने बच्चे के लिए मैने उसकी मजबूरी समझी और किराय के अलवा कुछ और पैसे दिया .. और उसके बाद यही सोचता रहा की इन्सान क्या नहीं करता है अपनी औलाद की खुशियों के लिए लेकिन वही औलाद क्या नहीं करती अपने माता पिता की खुशियों के लिए ये एक सवाल भी और जवाब भी ..
फिर मैने सोचा की उस माँ का क्या हाल होता होगा जो 9 महीने तक यही सोचती रहती थी की अब मैं एक बच्चे को जन्म दूंगी और उसका बच्चा मृत पैदा होता था वो भी एक बार नहीं बार बार ..खैर आखिर में भगवान ने उसे औलाद दी अब वो खुश है लेकिन एक सवाल फिर यहाँ उठता है पूछता है की अगर बड़ा होकर अपने माता पिता को घर से बेघर कर दे अपनी खुशियों के लिए उन्हे दुःख दे उन माँ बाप पर क्या बीतेगी जिन्होने इतनी जतन से उसे पाया और पाला पोसा था सोचिये ..क्या उस माँ का दुःख उन चार बच्चो के न होने पर हुआ होगा जो दुःख और कष्ट आज वही बच्चा उन्हे दे रहा है वो बड़ा है ...की उन बच्चो के न रहने पर जो दुःख उसे मिलता था वो बड़ा था .. शायद ये दुःख ज्यादा बड़ा होगा की न होते तो संतोष तो हो जाता लेकिन होने के बाद कोई ये कहे की य आपका फ़र्ज़ था अपने किया ही क्या मेरे लिए तब ज्यादा दुःख होता है /
इस समय वो बे-औलाद स्त्री यही सोचती है की मैं ज्यादा खुश हु सुखी हु उन माताओं से जो बच्चो को जन्म देने के बाद से लेकर उनके व्यस्क होने तक उनकी सारी तकलीफों और जरूरतों का ध्यान रखती है .और बच्चो के व्यस्क होने पर वही बच्चा ये कहे की माँ तुम्हे तो अक्ल ही नहीं है तुम जमाने के साथ चलती ही नहीं तो इसे में जो दुःख उन्हे मिलता है उस दुःख से मैं दूर ही रहना चाहती हु अपना घर होते हुए भी जब सडको और वर्धा आश्रम में रात बितानी पडे इसी माताओं से अच्छी हु मैं बे औलाद ...अपने घर में तो हु ..संतान के होते ही भी दर दर खाने के लिए भटकती माँ उन माताओं से अच्छी बेऔलाद अपने घर में भूखी अच्छी हु ...
हा उनको सुख मिला जो किसी ने उनको माँ कहा ...
हा उनको सुख मिला जब उन्होने बच्चे को जन्म देते समय पीड़ा सही ...
हा उनको सुख मिला जब जब वो भूखी रह कर पहले अपने बच्चे को खाना देती थी ..
लेकिन जब वास्तव में उन्हे सुख मिलना चाहिए था तब उन्हे दुःख मिला अपनों के होते हुए भी आज वो अकेली है सब के होते ही भी आज वो बेसहारा है .. क्यों

और दूसरी और आज मैं दुखी होती हु जब ये सोचती की क्या मुझे कभी कोई माँ नहीं कहेगा ..
हा मैं दुखी होती हु जब मैं ये सोचती हु की क्या मैं हमेशा बे औलाद रहूंगी ...
हा मैं दुखी होती हु जब मैं ये देखती हु दूसरी माताओं को दुलार करते हुए ..
हा मैं तब दुखी होती थी जब मैं अकेले खाना खाती थी ..
लेकिन तब ज्यादा सुखी और अपने को खुश महसूस करती हु जब बेसहारा माताओं को देखती हु तब लगता है की नहीं है तो कम से कम असर तो नहीं है आज मैं बे औलाद हु तो खुश तो हु ...

मैं स्त्री हु मैं माँ नहीं तो क्या
मैं अकेली हु लेकिन खुश हु तो क्या
मैं दुखी हु इस बात से से की कोई आया ही नहीं ..
लेकिन मैं खुश हु इस बात से की कोई आकार गया तो नहीं
मैं प्यासी हु तो मुझे एहसास नहीं की प्यास क्या है ..
लेकिन पानी पीने के बाद की प्यास से मैं व्याकुल तो नहीं

आशीष त्रिपाठी

Posted By KanpurpatrikaMonday, July 25, 2011

Friday, July 8, 2011

आज मैं भी वही हु और आप भी वही है

Filled under:


आज विचार भी वही है और दिमाग भी वही है
आज दोस्त भी वही है और दुश्मन भी वही है
तरीका भी वही है पर तरकीब कुछ नई है
आज इन्सान भी वही है और भगवान भी वही है
बस मान्यता कही है पर विश्वाश कही है
आज बच्चे भी वही है और बचपना भी वही है
लेकिन खेल कुछ और है और खिलौना कोई और है
आज संसकृति भी वही है और संस्कार भी वही है
बस सोच नई है और पीड़ी नई है
आज दाल भी वही है और रोटी भी वही है
बस स्वाद कही है और मिलावट कही है
पेट्रोल भी वही है और डीज़ल भी वही है
बस दाम कही है पर गाड़िया कई है
आज डाक्टर भी वही है और दुआ भी वही है
बस दवा कुछ नई है और मर्ज़ नए है
आज मैं भी वही हु और आप भी वही है
बस तालिया कही और मंच कही है
आज विचार भी वही है और दिमाग भी वही है

Posted By KanpurpatrikaFriday, July 08, 2011

Tuesday, May 10, 2011

खबरों से खबर तक

खबरों से खबर तक .....
एक पत्रकार जो खबरों को लिखता है मुद्दों को उठता है लोगो के सामने सच्चिया लता है अनजानेपहलुओ से लोगो को रूबरू करवाता है लेकिन क्या कभी ऐसा भी हो सकता है की छिपी हुई खबरों को जनता के सामने लाने वाला पत्रकार ही खुद एक दिन छिपी हुई खबर बन जाय और आम इन्सान से भी बदतर स्थित में जा कर रोती रोटी के लिए मोताज़ हो जाय ॥
देश के नाम चीन अखबारों में प्रमुख पदों में रहे , एक पत्रकार को जरुरत है अपनी मदद के लिए कुछ हाथो की जो उसका साथ दे सके क्या आप देंगे साथ ॥ उस कलम के सिपाही का जिसका अपने ही साथ छोड़ गय हो ...
नाम:-इन्द्र भूषण रस्तोगी
योग्यता हासिल:-वास्तु ,वैदिक ज्योतिष से पीएच।डी ,/,/ पत्रकारिता के सभी संभावित बड़े पदों पर ( ‘पायनिअर दैनिक’ ‘ट्रिब्यून’ ‘समाचार’ न्यूज" "अमर उजाला " "दैनिक भाष्कर " )

जोश और जूनून से भरे पत्रकारिता में कुछ अलग करने की चाहत और उनकी लेखनी उनका हथियार थी उनकी सटीक और विषयो और समाज को समझ ने उन्हे जल्द ही संघर्ष भरे जीवन से निकला और उन्हे देश के नामचीन अखबारों में काम करने का मौका मिला और उन्होंने दिए गय हर मौके को सार्थक करते हुए नित नए आयाम गड़ते हुए अपनी मंजिल की ओर बडते रहे पत्रकरिता के साथ साथ उन्होने ज्योतिष और वास्तु में भी अच्छी पकड बना ली थी .. और उनके इन्ही ज्ञान और लेखनी के बदौलत वो दैनिक जागरण से होते हुए अमर उजाला और उसके बाद दैनिक भास्कर के लिए काम करने लगे दैनिक भास्कर में रहते हुए उन्होने कई पदों पर काम किया ,

1976 में पत्रकार का कैरिअर अपनाने वाले श्री रस्तोगी ने कानपुर में दैनिक जागरण के अंग्रेजी अखबार से करिअर शुरू किया. फिर ‘पायनिअर दैनिक’ से होते हुए ‘समाचार’ न्यूज एजेंसी में चले गए. यहाँ से काम करते-करते वे ‘ट्रिब्यून’ में काम करने लगे. यहाँ से ‘पंजाब केसरी’ में अस्सिटेंट एडिटर के पद पर तैनात हुए.फिर वे
अमर उजाला में बरेली एडिशन के चीफ बनाए गए.भास्कर के शुरूआती दिनों की बात है जब वे अमर उजाला की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर दैनिक भाष्कर के भोपाल
एडिशन के प्रमुख संपादक बनाए गए. तब के दैनिक भाष्कर के सुधार और उत्थान में आपकी महती भूमिका थी.

-- अभी जिंदगी बढ़िया चाल ही रही थी की श्री रस्तोगी को लकवे का अटैक पड़ गया .. और काफी दिनों तक काम से विरत रहने के बाद ग्रुप ने इन्हे हर संभव मदद भी की और सही होने के बाद इन्हे ज्यादा काम के बोझ से अलग करने के लिए ग्वालियर एडिशन जहा काम का बोझ काम था का काम सौपा गया जिससे की श्री रस्तोगी पूरी तरह ठीक होने के बाद इन्हे फिर से जिम्मेदरिया दे दी जाएँगी लेकिन लकवे का असर इतना था की इनको ग्वालियर एडिशन से भी हटा दिया गया .. और साथ ही भास्कर ग्रुप से भी अलविदा कह दिया गया लेकिन साथ ही ये बात अच्छी थी की भास्कर ग्रुप ने इनकी जगह इनकी बेटी को नौकरी पर रख लिया और इनका जीविका के लिए भास्कर ग्रुप की ओर से जितना भी धन मिला वो इनकी पत्नी एन ले लिया और साथ ही कुछ दिनों बाद पत्नी भी भास्कर ग्रुप में जुड़ गय लेकिन वक्त कभी वक्त पर कभी बे वक्त ऐसा समय लेकर आता है की आदमी टूट जाता है .. और ऐसा ही नहीं श्री इन्द्र भूषण रस्तोगी जी के साथ इनसे नौकरी और पैसा मिलने के बाद इन्हे बेसहारो की तरह छोड़ दिया गया ..
खैर कहते है की गर आप के अन्दर हुनर है तो सब कुछ है और अपनी कमजोर शरीर और मज़बूत कलम के सहारे इन्होने फिर से कई पत्र पत्रिकाओ में काम किया लेकिन आज की भागती दौड़ती जिंदगी और अपने से अपनों के षड़यंत्र ने इन्हे कही भी टिकने नहीं दिया ..और श्री इन्द्र भूषण रस्तोगी वापस कानपुर आ गय .. और अपने पुराने माकन में रहने लगे ..
जहा भागती दौड़ती जिंदगी में धीरे धीरे ये पिछड़ते चले गय और नॉएडा में सोनाली और अनुराधा की कहानी की तरह ही श्री रस्तोगी एक गुमानम इन्सान की तरह जिंदगी बिताने को मजबूर हो गय ..
धीरे धीरे उनका घर उनके लिए काळ कोठारी बनता गया सफाई के आभाव में आज भी उस कमरे में शायद ही कोई बैठने को राज़ी हो बदबू और सीलन जैसे कमरे की तरह जैसे उनके ऊपर भी हावी हो ...छत की ओर निहारते हुए रस्तोगी जी शुन्य में खो जाते है लेकिन वो छत भी कब उनका साथ छोड़ दे कहा नहीं जा सकता उनका आवास की दुर्दसा किसी भी प्रकार के उनके व्यकितव पर नहीं फब्ती है ..रस्तोगी जी को जानने वाले जानते है की अपने पत्रकारिता के समय में रस्तोगी जी कैसे बने ठाने रहते थे और उनका व्यकित्व ही उनकी पहेचान था लेकिन आज उनकी कपड़ो की हालात और कमरे की हालात देख कर कोई ये नहीं कह सकता की ये वही रस्तोगी जी है ..
लेकिन रस्तोगी जी बस एक और अदद मौके की तलाश में है जिससे की एक बार फिर फिर वो अपनी कलम की ताकत के बल पर खडे हो सके .. उनके साथ के सह कर्मचारी आज उनसे मिलो दूर चले गय है नॉएडा में घटी घटना में सब ने ये कहा वहा की जिंदगी तो है ही ऐसी लेकिन कानपुर में भी ऐसी स्थित हो सकती है पता नहीं था अपनों से अपनों की दुरी लगातर हर शहर में बडती जा रही है ..शायद अगर कुछ दिन और इसी तरह रस्तोगी जी गुमनामो की जिंदगी जीते रहते तो उनका भी यही हाल होता जैसा की सोनाली और अनुराधा का हुआ ?..
कभी अपनों को और अपनों से छोटे और अजनबियों को भी चाय नास्ता करवाना उनकी आदत सी थी लेकिन आज उन्हे इस बात का मलाल है की अपनी आदत होने के बाबजूद भी आज वो चाय तक पिलाने में अश्मर्थ है .. लेकिन उन्होने अपने जीवन में कभी भी हार नहीं मानी..., हा ये जरुर है की वो कहते है की ये मेरी किये गय कर्मो का परिणाम है जो मैं इस स्थित में हु आज मेरे अपने इस स्थित में नहीं है की मेरी मादामदद करे क्योंकि मैने भी कभी उनका साथ छोड़ दिया था उर जिनका साथ मैने दिया आज उन्होने मेरा साथ छोड़ दिया .. आज मेरे साथ कोई नहीं है न मेरा परिवार न मेरे मित्र और न ही पत्रकारिता के मेरे साथी ...
आज भी उनको लगता है की मेरी द्वारा तैयार की गय योजनाये और खबरे पूरी न हो सकी मैं अपना पूरा काम नहीं निपटा सका .. आधी जिंदगी ही भगवान ने शायद मेरे को दी थी ...
राकेश मिश्रा जिन्होने ही श्री इन्द्र भूषण रस्तोगी जी को ढूंढ़ निकाला है का सभी से यही निवेदन है की कानपुर और देश के पत्रकारों और संपादकों से अनुरोध है की उनकी आज की स्थिति के लिए उनका संवेदनशून्य रहना मानवता के साथ नाइंसाफी होगा. आशा करता हूँ की कानपुर का मालदार प्रेस क्लब स्वयं या फिर जिलाधिकारी के विवेकाधीन कोष सहित विभिन्न मदों से इस वरिष्ठ संपादक के मान-सम्मान और प्राणों की रक्षा में आगे बढ़कर सहयोग करेगा. उनके मालिकान रह चुके पून्जीपतिओं से भी उनकी इस दशा में सहयोग की आशा करता हूँ..
श्री इन्द्र भूषण रस्तोगी
रस्तोगी के आवास का पता है:
59/20 बिरहाना रोड कानपुर-208001

Posted By KanpurpatrikaTuesday, May 10, 2011