Tuesday, April 20, 2021

_चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा की आठवीं शक्ति

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🔮 *_चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा की आठवीं शक्ति माता महागौरी की उपासना की जाएगी। इनका रंग पूर्णतः गोरा होने के कारण इन्हें महागौरी कहा जाता है। इस दिन कन्या पूजन करने का भी विधान है। लेकिन इस कोरोना महामारी बहुत तेजी से फैल रहा है। इसलिए घर पर मौजूद ही कन्याओं को भोजन कराएं।_*

🤷🏻‍♀️ *_ऐसा है महागौरी का स्वरूप_*

*_शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि महागौरी को शिवा भी कहा जाता है। इनके हाथ में दुर्गा शक्ति का प्रतीक त्रिशूल है तो दूसरे हाथ में भगवान शिव का प्रतीक डमरू है। अपने सांसारिक रूप में महागौरी उज्ज्वल, कोमल, श्वेत वर्णी तथा श्वेत वस्त्रधारी और चतुर्भुजा हैं। इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू है तो तीसरा हाथ वरमुद्रा में हैं और चौथा हाथ एक गृहस्थ महिला की शक्ति को दर्शाता हुआ है। महागौरी को गायन और संगीत बहुत पसंद है। ये सफेद वृषभ यानी बैल पर सवार रहती हैं। इनके समस्त आभूषण आदि भी श्वेत हैं। महागौरी की उपासना से पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं।_*

🚩 *_मां महागौरी पूजा शुभ मुहूर्त_*

➡️ *_अष्टमी तिथि प्रारंभ- 20 अप्रैल 2021 को आधी रात 12 बजकर 2 मिनट से_*
🎱 *_अष्टमी तिथि समाप्त- 21 अप्रैल 2021 को आधीरात 12 बजकर 44 मिनट तक_*

💮 *_अष्टमी तिथि शुभ मुहूर्त_*

👸🏻 *_ब्रह्म मुहूर्त- 20 अप्रैल सुबह 4 बजकर 11 मिनट से सुबह 4 बजकर 55 मिनट तक_*
🌟 *_अभिजित मुहूर्त- 20 अप्रैल सुबह 11 बजकर 42 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक_*
🐃 *_गोधूलि मुहूर्त- 20 अप्रैल शाम 6 बजकर 22 मिनट से शाम बजकर 6 बजकर 46 मिनट तक_*
🔯 *_विजय मुहूर्त- 20 अप्रैल दोपहर 2 बजकर 17 मिनट से शाम 3 बजकर 8 मिनट तक_*
💧 *_अमृत काल- 21 अप्रैल मध्यरात्रि 1 बजकर 17 मिनट से सुबह 02 बजकर 58 मिनट तक_*

🙏🏼 *_मां महागौरी की पूजा विधि_*

*_अष्टमी के दिन सबसे पहले स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में लकड़ी की चौक पर महागौरी की प्रतिमा स्थापित करें। मां के आगे दीपक जलाएं और फल, फूल अर्पित करें। मां की आरती के बाद कन्या पूजन करें।_*

*_आज महाअष्टमी के दिन देवी दुर्गा के महागौरी  के निमित्त उपवास किया जाता है, लेकिन धर्मशास्त्र का इतिहास चतुर्थ भाग के पृष्ठ- 67 पर चर्चा में ये उल्लेख भी मिलता है कि पुत्रवान व्रती इस दिन उपवास नहीं करता। साथ ही वह नवमी तिथि को पारण न करके अष्टमी को ही व्रत का पारण कर लेता है।_*

👸🏻 *_महागौरी का बीजमंत्र_*

*_सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके._*
*_शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते_*

⚛️ *_नवरात्रि के अष्टमी के दिन कन्या पूजन करने की विधि_*

*_महाअष्टमी के दिन देवी मां की पूजा के साथ ही कुमारियों  को भोजन कराया जाता है।  स्कंदपुराण में कुमारियों के बारे में बताया गया है  की  2 वर्ष की कन्या को कुमारिका कहते हैं, 3 वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति कहते हैं। इसी प्रकार क्रमश: कल्याणी, रोहिणी, काली, चंडिका, शांभवी, दुर्गा, सुभद्रा आदि वर्गीकरण भी किये गये हैं। अष्टमी के दिन कुमारी भोजन में पूड़ी , चने और मीठा हलुआ खिलने की परम्परा है । कुमारियों को यथेष्ट भोजन कराने के बाद   कुछ दक्षिणा देकर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए। महाष्टमी में दान की वस्तुओं में कमर और उससे ऊपर धारण किये जाने योग्य चीज़ें ही दान करनी चाहिए । बाकी आपके ऊपर निर्भर है।_*

      
   
*_सम्पूर्ण -------🖌_*
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Posted By KanpurpatrikaTuesday, April 20, 2021

Thursday, April 15, 2021

नवरात्री के चतुर्थ दिवस आदि शक्ति माँ दुर्गा के कूष्मांडा स्वरूप की उपासना विधि एवं समृद्धि पाने के उपाय

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*🍁नवरात्री के चतुर्थ दिवस आदि शक्ति माँ दुर्गा के कूष्मांडा स्वरूप की उपासना विधि एवं समृद्धि पाने के उपाय*🚩
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*सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।*🍀
*दधानाहस्तपद्याभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु में॥*🌻

*🏆माँ श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप कूष्मांडा हैं। अपनी मन्द हंसी से अपने उदर से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारंण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण से भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। जब सृष्टि नहीं थी और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब इन्होंने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। यह सृष्टि की आदिस्वरूपा हैं और आदिशक्ति भी। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। कुष्मांडा देवी के शरीर की चमक भी सूर्य के समान ही है कोई और देवी देवता इनके तेज और प्रभाव की बराबरी नहीं कर सकतें। माता कुष्मांडा तेज की देवी है इन्ही के तेज और प्रभाव से दसों दिशाओं को प्रकाश मिलता है। कहते हैं की सारे ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में जो तेज है वो देवी कुष्मांडा की देन है।*🌞

श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं। इनकी आराधना से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है। माँ कुष्माण्डा सदैव अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखती है। इनकी पूजा आराधना से हृदय को शांति एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती हैं। इस दिन भक्त का मन ‘अनाहत’ चक्र में स्थित होता है, अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और शांत मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा करनी चाहिए। संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है।

माँ कुष्मांडा पूजा विधि
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जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को ‘अनाहत’ में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए।

Posted By KanpurpatrikaThursday, April 15, 2021

सिद्धकुंजिकास्तोत्रम

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----:सिद्धकुंजिकास्तोत्रम:----
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स्वयं बाबा भोलेनाथ ने इस भूलोक में ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए एक महाकुंजिका स्तोत्र की रचना अपने मुख से की थी। जो भक्त इस मंत्र को नित्य उनका ध्यान करके पढ़ेगा, उसे इस संसार में धन-धान्य, समृद्धि, सुख-शांति और निर्भय जीवन व्यतीत करने के समस्त साधन प्राप्त होंगे। यह एक गुप्त मंत्र है। इसके पाठ से भक्त के ऊपर किया हुआ समस्त व्यभिचार कर्म स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं | इसके पाठ से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि उद्देश्यों की भी पूर्ति होती है। इसके पाठ से सम्पूर्ण दुर्गा शप्तशती के पाठ का फल प्राप्त होता है | यह मंत्र कुछ इस तरह हैः---

शिव उवाच--
शृणु देवी प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम |
येन मन्त्रप्रभावेण चंडीजापः शुभो भवेत || १ ||
न कवचं नार्गालास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम |
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम || २ ||
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत | 
अति गुह्यतरं देवी देवानापि दुर्लभम || ३||
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वती |
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम |
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम || ४ ||

अथ मन्त्रः --

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चमुण्डायै विच्चे।। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।

नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी ।
नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ।।
नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे ।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै, ह्रींकारी प्रतिपालिका।। ३ ||
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तु ते ।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ।।
धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरू ।।
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नम: ।।
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरू कुरू स्वाहा ।।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।।म्लां म्लीं, म्लूं मूल विस्तीर्ण कुन्जिकाए नमो नमः
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरूष्व मे ।।
इदं तु कुंजिका स्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे |
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वती ||
यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ।।...

मनीष तिवारी बाबा

Posted By KanpurpatrikaThursday, April 15, 2021

Wednesday, April 14, 2021

नवरात्रि के तृतीय दिवस माँ चंद्रघंटा की उपासना विधि

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नवरात्रि के तृतीय दिवस माँ चंद्रघंटा की उपासना विधि एवं फल
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पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन माँ के चंद्रघंटा विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है।

माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।

मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सद्यः फलदायी है। माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है।

माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं।


Posted By KanpurpatrikaWednesday, April 14, 2021

Tuesday, April 13, 2021

▬▭▬▭✠👣✠▭▬▭▬▭▬🔮 *_चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन

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🔮 *_चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन है | चैत्र नवरात्रि का हर दिन मां दुर्गा के शक्तियों के विभिन्न नौ रूपों में से एक रूप की आराधना की जाती है। चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जायेगी|_*

*_सफेद वस्त्र धारण किये हुए मां ब्रह्मचारिणी के दो हाथों में से दाहिने हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल है | मां ब्रह्मचारिणी के नाम में ब्रह्म शब्द का अर्थ है– तपस्या, यानी ब्रह्मचारिणी का अर्थ है- तप का आचरण करने वाली।  मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति के अंदर जप-तप की शक्ति बढ़ती है | मां ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को संदेश देती हैं कि परिश्रम से ही सफलता प्राप्त की जा सकती है | _*

🤷🏻‍♀️ *_मां बह्मचारिणी नाम पड़ने का कारण_*

*_कहते हैं नारद जी के उपदेश से मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की थी | इसलिए इन्हें तपश्चारिणी भी कहा जाता है | मां ब्रह्मचारिणी कई हजार वर्षों तक जमीन पर गिरे बेलपत्रों को खाकर भगवान शंकर की आराधना करती रहीं और बाद में उन्होंने पत्तों को खाना भी छोड़ दिया, जिससे उनका एक नाम अपर्णा भी पड़ा | लिहाजा देवी मां हमें हर स्थिति में परिश्रम करने की और कभी भी हार न मानने की प्रेरणा देती हैं और अपने भक्तों को भी लक्ष्य पर डटे रहने में मदद करती हैं।_*

✡️ *_मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि_*

*_मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को आपने कलश में आमंत्रित किया है। उन्हें पंचामृत स्नान दूध, दही, घृत, मेवे और शहद से स्नान कराएं। इसके बाद इन पर फूल, अक्षत, रोली, चंदन का भोग लगाएं। इसके बाद पान, सुपारी और कुछ दक्षिणा रखकर पंडित को दान करें। इसके बाद अपने हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करते हुए बार-बार मंत्र का उच्चारण करें। इसके बाद मां ब्रह्मचारिणी को सिर्फ लाल रंग का ही फूल चढ़ाए साथ ही कमल से बना हुआ ही माला पहनाएं। मां को चीनी का भोग लगाएं। ऐसा करने से मां जल्द ही प्रसन्न होती है। इसके बाद भगवान शिव जी की पूजा करें और फिर ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत आदि हाथ में लेकर “ऊं ब्रह्मणे नम:” कहते हुए इसे भूमि पर रखें।_*

👉🏼 *_इन मंत्रों का जाप दिलाएंगे जीत_*

*_अगर आप भी किसी कार्य में अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो आज के दिन आपको देवी ब्रह्मचारिणी के इस मंत्र का जाप जरूर करना चाहिए।  देवी ब्रह्मचारिणी का मंत्र इस प्रकार है - 'ऊं ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।'  आज के दिन आपको इस मंत्र का कम से कम एक माला, यानी 108 बार जाप करना चाहिए। इससे विभिन्न कार्यों में आपकी जीत सुनिश्चित होगी।_*

👸🏻 *_ब्रह्मचारिणी देवी का मंत्र_*

*_देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करते समय हाथों में एक लाल फूल लेकर देवी का ध्यान करें और हाथ जोड़ते हुए प्रार्थना करते हुए मंत्र का उच्चारण करें।_*

🗣️ *_श्लोक_*

*_दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु|देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||_*

🧘🏻‍♀️ *_ध्यान मंत्र_*

*_वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।_*
*_जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥_*
*_गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।_*
*_धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥_*
*_परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।_*
*_पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥_*

Posted By KanpurpatrikaTuesday, April 13, 2021